नियामकों की लेट लतीफी


का वर्षा जब कृषि सुखाने। जब समय पर कोई काम नहीं हो तो उस काम के होने का क्या मतलब? आजकल हमारे वित्तीय संस्थानों को भी नियामकों से कुछ ऐसी ही शिकायत है। वित्तीय संस्थान बाजार की जरूरतों के मद्देनजर नए-नए तरह के वित्तीय उत्पाद लेकर आते हैं। इन उत्पादों को आप तक पहुंचाने से पहले उन्हें नियामक से अनुमति लेनी पड़ती है। आम तौर से बीमा नियामक इरडा किसी उत्पाद को संस्तुति देने में ३० दिन का समय लेता रहा है, पर अब यह अवधि बढ़ गई है। म्यूचुअल फंड नियामक सेबी भी किसी उत्पाद को संस्तुति देने में आमतौर से २१ दिन का समय लेता है। यदि इस निर्धारित अवधि के भीतर नियामक की ओर से संबंधित कंपनी को उस उत्पाद के बारे में कोई ऑब्जर्वेशन नहीं भेजा गया तो ऐसा मान लिया जाता है कि संस्तुति मिल गई। पर यह सब उतना आसान नहीं है जितना कि प्रतीत होता है।

आज जीवन बीमा पॉलिसी को संस्तुति देने में बीमा नियामक इरडा अमूमन १०५ दिन का समय ले रहा है। स्वास्थ्य बीमा के मामले में तो स्थिति और भी गंभीर है। हेल्थ पॉलिसी को अप्रूवल हासिल करने में तकरीबन एक साल का समय लग जा रहा है। पर सितंबर २००७ से पूर्व स्थिति इतनी खराब नहीं थी। यदि ३० दिनों के भीतर इरडा की ओर से संबंधित प्रोडक्ट के बारे में कोई आपत्ति पत्र प्राप्त नहीं होता था तो यह मान लिया जाता था कि उत्पाद को संस्तुति मिल गई और उस पॉलिसी को लांच कर दिया जाता था। अब आपत्ति उठाने की जगह उत्पाद के अध्ययन की बात कही जाती है और उसका कई चरणों में विश£ेषण मंगाया जाता है। सेबी भी इरडा से कुछ कम नहीं है। किसी म्यूचुअल फंड स्कीम को अनुमति दिए जाने की २१ दिनों की अवधि पूरा होते होते संबंधित कंपनी को एक पत्र डाल दिया जाता है जिसमें कभी कभी तो बेतुके ऑब्जर्वेशन होते हैं। कई बार तो फंड मैनेजर के अद्यतन बायोडाटा के लिए स्कीम को डिले कर दिया जाता है। परिणाम यह होता है कि बाजार की स्थिति को देखते हुए तैयार की गई स्कीम बाजार की स्थितियों में बदलाव की वजह से बेकार हो जाते हैं। कई बार म्यूचुअल फंड कंपनियां प्रोडक्ट को पहले लांच करने के लिए प्रतिद्वंद्वी कंपनियों के स्कीम को अटका भी देती हैं। यूटीआई म्यूचुअल फंड के गोल्ड ईटीएफ को अप्रूवल देने में सेबी को साल भर लग गए। सेबी द्वारा दिए गए कई ऑब्जर्वेवशन में से एक यह भी था कि सीएमडी के न होने की दशा में स्कीम कैसे लांच किया जा सकता है।

इरडा चेयरमैन जे हरिनारायण की दलील है कि बीमा उत्पादों की जटिलता बढ़ गई है, इसलिए उसे एपू्रव करने में समय लग रहा है। सच यह है कि सेबी और इरडा दोनों ही नियामकों के पास ऐसे वित्तीय पेशेवरों का अभाव है जो अर्थजगत की बदलती दुनिया के हिसाब से अपडेट हों। उनके लिए पेचीदा प्रोडक्ट को समझना मुश्किल होता है और जब तक वह समझ पाते हैं, प्रोडक्ट किसी काम का नहीं रह जाता। इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है आम निवेशकों को। उन्हें विश्व स्तरीय उत्पाद नहीं मिल पा रहे हैं। वित्त मंत्रालय ने निवेशकों की इस समस्या पर गौर करते हुए इरडा से कहा है कि वह विभिन्न उत्पादों के लिए एक व्यापक दिशानिर्देश जारी करे। यदि कोई उत्पाद उस दिशानिर्देश का अनुपालन करते हुए लांच किया जाए तो उसे इरडा से अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी। क्या सेबी के मामले में भी वित्त मंत्रालय ऐसा ही कदम उठाएगी?

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