अर्थ जगत

डॉलर के फेर में फंसी गयी दुनिया

आजकल पूरी दुनिया में डॉलर बटोरने की होड़ सी मची हुई है। विदेशी निवेशक शेयर बेचकर डॉलर खरीद रहे हैं। दुनिया भर के केंद्रीय बैंक डॉलर को आकर्षित करने की नई नई तरकीबें ढूंढ रहे हैं। दिलचस्प तो यह है कि डॉलर के मुकाबले अपनी मुद्रा को कमजोर होता देख कोई भी केंद्रीय बैंक अपने डॉलर रिजर्व के जरिए मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। उसे आशंका है कि डॉलर के फेर में उसका विदेशी मुद्रा भंडार यदि चुक गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे।

सरकार आयात का बिल कैसे चुकाएगी, विदेशी कर्ज का ब्याज कहां से देगी, मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कैसे कर पाएगी। ये सब डॉलर में ही चुकाने पड़ते हैं। डॉलर के प्रति वैश्विक मोह में यह बढ़ोतरी तब हो रही है जबकि डॉलर का स्वामी अमेरिका मंदी की गिरफ्त में फंसता जा रहा है। डॉलर की आग में घी डाल रहा है यूरो। ग्रीस संकट का हल निकलता दिखता है तो इटली और फ्रांस की समस्या सामने आने लगती है। यूरो और यूरोजोन के कमजोर होने का मतलब है डॉलर के वर्चस्व में वृद्धि। अमेरिका भी वैश्विक बाजार से डॉलर में कर्ज लेगा और यूरोप भी। बाकी देश भी डॉलर में ही आयात बिल का भुगतान करेंगे। इससे डॉलर की मांग बढऩी स्वाभाविक है।

जरा सोचिए कि महंगाई से जूझती हमारी सरकार पर कितनी आफत होगी क्योंकि थोक मूल्य सूचकांक का आधा से अधिक हिस्सा आयात पर निर्भर है, डॉलर से जुड़ा है। चूंकि अगस्त महीने से अभी तक डॉलर के मुकाबले रुपया १५-१६ फीसदी तक कमजोर हुआ है, आयात बिल में इसी अनुपात में बढ़ोतरी भी  हुई है। आरबीआई की पेशानी पर भी बल पड़ रहे हैं। उसका आकलन था कि अब ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की जरूरत नहीं पड़ेगी। पर डॉलर के प्रति निवेशकों की दरियादिली और कमजोर पड़ते रुपए ने महंगाई का पूरा गणित ही बिगाड़ दिया है।

मौद्रिक प्रणाली में नकदी की किल्लत बढऩे से बैंक त्राहि त्राहि कर रहे हैं। आरबीआई यदि सिस्टम में नकदी का प्रवाह बढ़ाए तो रुपया और कमजोर होगा। ब्याज दरों में बढ़ोतरी से अर्थव्यवस्था की रफ्तार यंू ही सुस्त पड़ रही है। समस्या की जड़ विदेश में है, वहीं की अर्थव्यवस्था में है। इसका निदान भी वैश्विक ही होगा। सवाल यह है कि जब तक डॉलर का मसला सुलझता नहीं है तब तक हम क्या करें?

सबसे पहले तो हमें डॉलर संग्रह से बचना चाहिए। डॉलर की मजबूती की वजह से सोना कुछ कमजोर हुआ है। वहां निवेश किया जा सकता है। रिएल एस्टेट में निवेश को थोड़े समय के लिए टाल देना चाहिए क्योंकि रुपए की कमजोरी के कारण एनआरआई भारतीय रिएल एस्टेट में अपना निवेश बढ़ा रहे हैं और मकान की कीमतें गैर वास्तविक स्तर पर पहुंच गई हैं।

शेेयर बाजार में पैसा लगाने का मोह त्यागना चाहिए। इसकी जगह सिप किया जा सकता है। कार, टीवी, मोबाइल वगैरह की खरीद को टाला जा सकता है क्योंकि ये महंगे हो गए हैं। महंगाई में बढ़ोतरी के कारण घरेलू बजट को संतुलित करते हुए डिपोजिट पर मिलने वाले उच्च ब्याज का फायदा उठाना चाहिए।

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Title: all world turn caught the dollar

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