डेरिवेटिव्स से प्रबंधन


इक्विटी और डेट इंस्ट्रूमेंट्स के अलावा फंड मैनेजर किसी फंड के प्रबंधन के लिए डेरिवेटिव्स का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इन इंस्ट्रूमेंट्स का इस्तेमाल निवेश पोर्टफोलियो को हेज करने के लिए किया जाता है। हेजिंग वो तरीका है जिससे जोखिम को कम या समाप्त करने का प्रयास किया जाता है। डेरिवेटिव्स वैसे उत्पाद होते हैं जिनका मूल्य किसी इंस्ट्रूमेंट्स में अंतर्निहित होता है।

इनका होता है इस्तेमाल सबसे ज्यादा इस्तेमाल में लाया जाने वाला डेरिवेटिव्स फ्यूचर्स और ऑप्शंस है।

फ्यूचर्स: एक फ्यूचर्स यानी वायदा सौदा फंड मैनेजर को वो सहूलियत प्रदान करता है कि वो एक प्रतिभूति या इंडेक्स को, किसी निश्चित भाव पर, भविष्य की तिथि में डिलिवरी (प्राप्त करने) के लिए खरीद सा बेच सके।

ऑप्शंस: एक ऑप्शन फंड मैनेजर को वो विकल्प प्रदान करता है कि वो किसी प्रतिभूति या इंडेक्स को पहले से तय किसी भाव पर खरीद या बेच सके।

स्वैप: स्वैप के जरिए फिक्स दरों के डेट को फ्लोटिंग दरों में बदला जा सकता है। इंटेरेस्ट रेट स्वैप का इस्तेमाल ब्याज दर के जोखिम को समाप्त करने के लिए किया जाता है।

निवेशक को जानकारी

डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल फंड मैनजर द्वारा इसलिए भी किया जा सकता है कि वो पोर्टफोलियो को पुन: संतुलित कर सकें या उसकी हेजिंग कर सके। सेबी के नियम साफ बताते हैं कि फंड को अपने ऑफर डॉक्यूमेंट में या फिर एडेनडम (परिशिष्ट) में यह बताना होगा कि वो स्कीम के प्रबंधन के लिए डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल करेगा। साथ ही म्यूचुअल फंड को इन डेरिवेटिव्स के इस्तेमाल, उनके प्रतिफल और स्कीम के जोखिम के बारे में भी समझाना होगा।

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