कला में निवेश की कला


कई दशकों तक अच्छी कलाकृतियों की बात शुरू होते ही अंतरराष्ट्रीय कलाकारों की बात शुरू हो जाती थी। लेकिन पिछली शताब्दी के आखिरी दशक में स्थितियां बदलीं और भारतीय कलाकारों को भी वैश्विक कला पटल पर पहचाना जाने लगा। ऐसे में भारतीय कला बाजार में तेजी का रुख आ गया। इस शताब्दी के पहले दशक में भारतीय कला बाजार में कलाकृतियों की कीमत में अभूतपूर्व तेजी देखने को मिली, खास तौर पर 2000 से 2007 के बीच। तेजी से आर्ट गैलरियों की संख्या बढऩे लगी, कलाकृतियों की नीलामी में उनकी कीमतों के नित-नए रिकॉर्ड बनने लगे और कलाकृतियों में निवेश करना जैसे फैशन सा बन गया। लेकिन इस सबको कहीं न कहीं तो रुकना ही था। भारतीय कला बाजार में साल 2008-09 में मंदी आ गई।

हालांकि, पिछले कुछ समय से इसमें फिर से रिकवरी आने लगी है। साल 2009-10 के आसपास, भारतीय कला बाजार का आकार बढ़ कर 2-3 अरब डॉलर का हो गया। लेकिन भारतीय कलाकृतियां अभी भी उन ऊंचाइयों के आसपास भी नहीं फटक पाई हैं। हाल ही में किए गए एक शोध में पता चलता है कि भारतीय कलाकृतियों की कीमत पश्चिमी कलाकृतियों की कीमत के दसवें-पंद्रहवें हिस्से के आसपास ही पहुंच पाती है। मौजूदा स्थितियों में भारतीय कला बाजार, वैश्विक कला बाजार का महज 5-6 फीसदी है। इसका सीधा मतलब यह है कि भारतीय कला बाजार के सामने संभावनाओं का खुला आकाश है और साथ ही उन निवेशकों के सामने भी जो कला में निवेश करने में रुचि रखते हैं।

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