Home Articles posted by संजय जोशी

Author: संजय जोशी के सभी लेख

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इश्क़ की कोई उम्र नहीं होती

2007 में इजरायल, अमरीका और फ्रांस के सहयोग से बनी कथा फ़िल्म बैंडज़ विज़िट संगीत से उपजे प्रेम की एक ऐसी कहानी है जो हर धड़कते हुए दिल में कभी न कभी जरूर उमड़ती है. यह अलग बात है कि प्रेम कहानियों को फार्मूले की तरह अपनानेवाले हमारे अपने फिल्म उद्योग में ऐसी कहानी पर […]
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कंचे और पोस्टकार्ड

2015 में रिलीज़ हुई रिदम जानवे द्वरा निर्देशित फ़िल्म ‘कंचे और पोस्टकार्ड’ बच्चों के नाम पर बनाई जाने वाली सर्वथा उपयुक्त फ़िल्म है. रिदम की फ़िल्म अपने ननिहाल में छुट्टियां मनाने आये 10 साल के विपिन के इर्द गिर्द घूमती है जिसे कंचों से खेलना बहुत पसंद है लेकिन विपिन के मनहूस मामा और उसे […]
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अम्मा अरियन : एक सफल प्रयोग की कहानी

आज जब हम इंटरनेट पर जॉन अब्राहम के नाम से खोज शुरू करते हैं तो सबसे पहले 1972 में पैदा हुए केरल के बौलीवुडी अभिनेता जॉन अब्राहम के बारे में जानकारी मिलती है. थोड़ी सी मशक्कत के बाद थोड़े पुराने जॉन अब्राहम के बारे में भी पता चलता है जो 1987 में मात्र 49 साल […]
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सिनेमा के आस्वाद को अंतिम दर्शक तक पहुँचाने की कसरतें 

पहले  पहल जब सिनेमा बनना  शुरू हुआ तो उसके दिखाने के तरीके भी गढ़े जा रहे थे.1932 में दुनिया का पहला फिल्म फेस्टिवल इटली के वेनिस शहर में आयोजित हुआ। सिनेमा को अकेले अपने लैपटॉप या डेस्कटॉप में घर में गूंजती कई आवाजों के बीच देखना , सिनेमा को एक सही हाल में पर्याप्त अँधेरे और अच्छे प्रोजक्शन के जरिये  देखना और सिनेमा को […]
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कुतर्की समय में कुछ तार्किक बातें

यह 2011 साल का सितम्बर महीना था जब जबलपुर से निकलने वाली प्रतिष्ठित हिंदी साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ ने दो दिन की सिनेमा कार्यशाला ‘प्रतिरोध का सिनेमा अभियान’ के साथ मिलकर आयोजित की थी. प्रतिरोध का सिनेमा की तरफ से मैंने और दस्तावेज़ी फ़िल्मकार संजय काक ने पांच सत्रों की कार्यशाला लगभग 100 प्रतिभागियों के साथ […]
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रोहितवेमुला के बहाने नागेश्वर राव स्टार की कहानी

रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद दलित मुद्दे और दलित आबादी एक बार फिर से बहस के केंद्र में आ गयी. हैदराबाद सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी के एस एन कम्युनिकेशन स्कूल द्वारा निर्मित डिप्लोमा फ़िल्म ‘आई एम नागेश्वर राव स्टार’ को देखना अनुभव और यथार्थ के एकदम नए धरातल पर हमें ले जाता है. यहाँ यह भी […]
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मुद्दे ही सेलीब्रेटी होते हैं दस्तावेज़ी सिनेमा में

हिन्दुस्तान के इतने विशाल सिनेमा उद्योग द्वरा हर साल निर्मित की जा रही फीचर फिल्मों के बरक्स दस्तावेज़ी सिनेमा का संसार निर्माण की तुलना में बहुत छोटा है या यह कहना कि दोनों माध्यमों की तुलना ही बेकार है एकदम सटीक बात होगी. लेकिन फिर भी कुछ बात है जिसकी वजह से नया भारतीय दस्तावेज़ी […]
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बाबूलाल भुइयां की कुरबानी के मायने

1980 के दशक में कई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ी फ़िल्मों का निर्माण हुआ. मंजीरा दत्ता निर्मित ‘बाबूलाल लाल भुइयां की क़ुरबानी’ इनमे से एक है. 1987 में निर्मित यह फ़िल्म धनबाद के मैलगोरा नामक कसबे में बाबूलाल नामक एक अति गरीब के अपने स्वाभिमान के खातिर शहीद हो जाने की कहानी है. बाबूलाल भुइयां की कहानी आज […]
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 सिनेमा का मजा

आखिरकार 1895 में पेरिस के लुमिये भाइयों द्वारा आविष्कृत सिनेमा का माध्यम मूलत दृश्यों और ध्वनियों के मेल का ऐसा धोखा है जो अँधेरे में दिखाए जाने के बाद हर किसी को अपने सम्मोहन में कैद कर लेता है. इसी वजह से जब शुरू –शुरू में लोगों ने परदे पर चलती हुई रेलगाड़ी  देखी तो […]
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कोंडली में नया सिनेमा

 पूर्वी दिल्ली और नॉएडा के बीच हिंडन नहर के नाले के साथ –साथ बसी बस्ती कोंडली में बीती 26 जनवरी की तेजधूप वाली दुपहर को राजनीतिक रूप से सक्रिय एक समूह ने‘सोच बदलो –समाज बदलो’ की थीम पर एक बैठक का आयोजन किया. एक सोची समझी रणनीति के बतौर इस बैठक में सिनेमा के जरिये […]