अपना करीबी रिश्‍तेदार मुर्गा


मुर्गा एक ऐसा पक्षी है जो हमारी संस्‍कृति में रचा-बसा हुआ है। ऐसे साक्ष्‍य मिलते हैं कि मुर्गे की उत्‍पत्ति भारत भूमि पर हुई और यहां से ही पूरी दुनिया में मुर्गे को इंसान ले गया। यह भी माना जाता है कि आज मुर्गे की जितनी भी नस्‍लें सारे जहां में हैं वे सब लाल जंगली मुर्गे गैलस गैलस की वंशज हैं। यह दीगर बात है कि आज लाल जंगली मुर्गा खत्‍म होने के कगार पर हैं।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि मुर्गे और मानव जीवन में काफी समानताएं हैं। मानव और मुर्गे के जीनोम में से 50 फीसदी जीन आपस में मेल खाते हैं। दरअसल उन जीनों की डीएनए पर जमावट में फर्क ही उनको स्‍तनधारी और पक्षी में स्‍थापित करते हैं।
मानव जीनोम के बाद मुर्गा पहला पक्षी है जिसके जीनोम का खुलासा किया जा सका है। मुर्गे के जीनोम के खुलासे से जीव जगत में और खासकर इंसान और अन्‍य जंतुओं से अनुवांशिकी रिश्‍तों के राज खुलने की संभावनाएं हैं। नेशनल ह्यूमन जीनोम रिसर्च इंस्‍टीट्यूट के डायरेक्‍टर फ्रांसिस एस कोलिन का कहना है कि जुतओं में जीने के तुलनात्‍मक अध्‍ययन से हम मानव के जीन की रचना और कार्य को समझकर मानव के बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य की रणनीतियां तैयार कर पाएंगे।
मुर्गे के जीनोम के खुलासे से जंतुओं में अनुवांशिकी कडि़या और वंशवेल को समझने में मदद मिल सकेगी। इसी क्रम में पफर मछली के जीनोम भी पढ़ लिए गए हैं। यह देखने में आया है कि मछलियों में भी इन जीन के प्रतिरूप पाए जाते हैं।
मुर्गे के जीनोम के अध्‍ययन से यह बात सामने आई है कि कैरेटीन नामक प्रोटीन का जीन चमड़ी के पर, पंजे आदि को बनाने में अहम भूमिका अदा करते हैं। इंसानों में यही केरेटीन बालों को बनाता है। वैसे मुर्गे में दूध के प्रोटीन को बनाने वाले, दांत बनाने वाले जीन मौजूद नहीं है। एक मजेदार बात यह है कि मुर्गे में गंध क्षमता कम होती है इसी प्रकार से पक्षियों को स्‍वाद का भी भान नहीं होता है। जीनों की खोज से कई बीमारियों ओर उनके उपचार के रास्‍ते खुल सकते हैं।
मुर्गे में जो जीन अंडे के खोल के निर्धारण के लिए होता है वहीं इसका प्रतिरूप स्‍तनधारी में हड्डियों में कैल्सिफि‍केशन के लिए होता है। पक्षियों के अलावा यह जीन औरों में नहीं देखा गया है। एक और दिलचस्‍प बात यह है कि मानव में वे जीन मौजूद नहीं है जो अंडे में अलब्‍यूमिन बनाने के लिए होता है। यानी वे जीन केवल मुर्गे में ही मौजूद हैं। मुर्गे में इंटरल्‍यूकिन-26 भी होता है जो कि प्रतिरोधक क्षमता के लिए जिम्‍मेदार जीन होता है। यह जीन मानव में देखा गया है।
मुर्गे को पालतू बनाने के कारणों में से प्रमुख है इनकी दिलचस्‍प लड़ाई। ऐसा माना जाता है कि मुर्गा काफी साहसी होता है। और इस साहसी गुण के कारण ही इसको पालतू बनाया गया। आचार्य भाव प्रकाश द्वारा लिखी आयुर्वेदिक पुस्‍तक में बताया गया है कि इंसान में बहादुरी के कोई 20 लक्षणों की यदि फेहरिस्‍त बनाई जाए तो उसमें से चार गुण उसने मुर्गे से पाए हैं। ईसा के जन्‍म के पहले मुर्गे को नीली घाटी में नहीं देखा गया था। तब न तो मिस्र के दरबार में ही इसका कभी जिक्र हुआ और न ही इस सुन्‍दर पक्षी पर किसी चित्रकार ने कोई बढि़या चित्र बनाया है। इजिप्‍टवासियों ने भी ऐसा कोई पक्षी नहीं देखा था जो एक बार में काफी अंडे देता हो। जब मुर्गे को पालतू बनाया गया तो इसके बारे में काफी कुछ लिखा गया। एक ऐसा पक्षी जिसके माथे पर चटक लाल रंगी कलगी और शरीर खूबसूरत लाल-काले हरे किंतु चमकदार पंखों से ढका हुआ जब चलता है तो उसकी शान में उसको रास्‍ता दे दे तो हर कोई अपना काम छोड़कर उसकी बांग की ओर ध्‍यान दे। जब वह मिस्र के राज दरबार में पहली दफा पहुंचा तो उसे देखने वालों की खासी भीड़ जुटी। ऐसा माना जाता है कि लाल जंगली मुर्गे को सबसे पहले मोहन जोदड़ो और हड़प्‍पा में 2500-2100 ईसा पूर्व पालतू बनाया। इस दौर के बनाए चित्रों में मुर्गा दिखाई देता है। और अनेक मिट्टी के खिलौनों में भी नर और मादा मुर्गे को दिखाया गया है।

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