महान लेखक-उपन्यासकार धर्मवीर भारती


हिन्दी के यशस्वी लेखक सम्पादक डॉ‍. धर्मवीर भारती का जन्म 25 दिसम्बर सन् 1926 में तत्कालीन यूनाइटेड प्राविन्स की राजधानी जनपद इलाहाबाद में हुआ था। डॉ‍. भारती की शिक्षा-दीक्षा और काव्य संस्कारों की प्रथम संरचना प्रयाग में हुई। उनके व्यक्तित्व और उनकी प्रारंभिक रचनाओं पर पंडित माखनलाल चतुर्वेदी के उच्छल और मानसिक स्वच्छंद काव्य संस्कारों का काफी प्रभाव है।

‘गुनाहों का देवता’, ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ और अंधायुग जैसी पुस्तकों के साथ हिंदी साहित्य में ताजगी की बहार लाने वाले लोकप्रिय लेखक डॉ‍. धर्मवीर भारती मुफलिसी के दौर में किताबी खजाने ढूंढते रहते थे।

उन्होंने काफी कम उम्र में बहुत कुछ पढ़ लिया था। उनकी आदत स्कूल से सीधे पुस्तकालय जाने की थी। ‘डा. भारती का बचपन गरीबी में बीता था। मुफलिसी इतनी थी कि वह किसी पुस्तकालय का सदस्य नहीं बन सकते थे। लेकिन उनकी लगन देखकर इलाहाबाद के एक लाइब्रेरियन ने उन्हें अपने विश्वास पर पुस्तकें पांच दिन के लिए देना शुरू किया। इसके बाद तो उन्हें जैसे किताबी खजाना ही मिल गया।

पहले-पहले तो उन्होंने अंग्रेजी के नामी लेखकों के अनुवाद और फिर उनकी मूल कृतियां पढ़ीं लेकिन बाद में उनकी दिलचस्पी श्रीमद्भाग्वत, गीता, उपनिषद और पुराणों में पैदा हुई। उनकी लेखनी की नींव सही मायनों में इन्हीं ग्रंथों ने डाली।

गौरतलब है कि टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की ओर से उन्हें पत्रिका के प्रधान सम्पादक का पद स्वीकार करने का प्रस्ताव मिला था। लेकिन समूह के एक सदस्य ने यह शर्त रखी कि डॉ‍.  भारती संपादक बने रहने के दौरान निजी लेखन नहीं कर सकेंगे। इस पर डॉ‍.  भारती ने पेशकश साफ तौर पर ठुकरा दी। डॉ‍.  भारती मानते थे कि किसी भी लेखक को उसके निजी रचनात्मक लेखन से दूर नहीं रखा जाना चाहिए। बाद में जब समूह की ओर से आश्वासन दिलाया गया कि उन पर कोई बंधन नहीं होगा, तब वह संपादक बनने को राजी हुए।’ गौरतलब है कि डॉ‍.  भारती 1960 से 1987 के बीच धर्मयुग के प्रधान संपादक रहे। डॉ‍. भारती ने धर्मयुग के मामले में यह साफ कर दिया था कि वह यह आश्वासन नहीं दे सकते कि साहित्यिक पत्रिका में वह जो बदलाव लाएंगे, वह पाठकों को स्वीकार होगा। उन्होंने कहा कि हो सकता है कि पत्रिका की पाठक संख्या कम हो जाए। असल में ऐसा हुआ भी लेकिन बाद में पत्रिका काफी लोकप्रिय हुई।

धर्मयुग में प्रधान संपादक रहने के दौरान डॉ‍.  भारती ने 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध की रिपोर्ताज भी की।

डॉ‍. भारती की पुस्तक ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ लघुकथाओं को पाठकों के बीच रखने की एक अलहदा शैली का नमूना मानी जाती है। अंधयुग भी डॉ‍.  भारती की सर्वाधिक चर्चित कृतियों में से एक है। इसे इब्राहिम अल्काजी, एम.के.रैना, रतन थियम और अरविंद गौर जैसे दिग्गज रंगकर्मी नाटक के रूप में पेश कर चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने ‘मुर्दों का गांव’, ‘स्वर्ग और पृथ्वी’, ‘चांद और टूटे हुए लोग’ और ‘बंद गली का आखिरी मकान’ जैसी पुस्तकें भी लिखीं।

डॉ‍. भारती पद्मश्री, राजेंद्र प्रसाद शिखर सम्मान, भारत भारती सम्मान, महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से नवाजे गए थे। चार सितम्बर 1997 को उनका निधन हुआ।

 

 

टूटा हुआ पहिया

मैं

रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ

लेकिन मुझे फेंको मत !

 

क्या जाने कब

इस दुरूह चक्रव्यूह में

अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ

कोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर घिर जाय !

 

अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी

बड़े-बड़े महारथी

अकेली निहत्थी आवाज को

अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें

तब मैं

रथ का टूटा हुआ पहिया

उसके हाथों में

ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ !

मैं रथ का टूटा पहिया हूँ

लेकिन मुझे फेंको मत

इतिहासों की सामूहिक गति

सहसा झूठी पड़ जाने पर

क्या जाने

सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले !

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