शास्त्रीय संगीत के पितामह थे पंडित रविशंकर


भारतीय शास्त्रीय संगीत के पितामह पंडित रविशंकर का जन्म 7 अप्रैल, 1920 को वाराणसी में हुआ। 1992 में उन्हें भारत के सबसे बड़े सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। पंडित रविशंकर ने नृत्य के जरिए कला जगत में प्रवेश किया था।

पंडित रविशंकर ने एक सितार वादक के रूप में  ख्याति अर्जित की। रवि शंकर और सितार मानो एक-दूसरे के लिए ही बने हों। वह इस सदी के सबसे महान संगीतज्ञों में गिने जाते थे।

उनका आरंभिक जीवन काशी के पुनीत घाटों पर ही बीता। पंडित रविशंकर का बचपन बहुत ही सुखद रहा। उनके पिता प्रतिष्ठित बैरिस्टर थे और राजघराने में उच्च पद पर कार्यरत थे। रविशंकर जब केवल दस वर्ष के थे तभी संगीत के प्रति उनका लगाव शुरू हुआ। पंडित रविशंकर ने बचपन में कला जगत में प्रवेश एक नर्तक के रूप में किया। उन्होंने अपने बड़े भाई उदय शंकर के साथ कई नृत्य कार्यक्रम किये। पं. रवि शंकर की आरंभिक संगीत शिक्षा घर पर ही हुई। उस समय के प्रसिद्ध संगीतकार और गुरु उस्ताद अलाउद्दीन खां को इन्होंने अपना गुरु बनाया। यहीं से आपकी संगीत यात्रा विधिवत की।

अलाउद्दीन खां जैसे अनुभवी गुरु की आँखों ने रविशंकर के भीतर छिपे संगीत प्रेम को पहचान लिया था। उन्होंने रविशंकर को विधिवत अपना शिष्य बनाया। वह लंबे समय तक तबला वादक उस्ताद अल्ला रक्खा खाँ, किशन महाराज और सरोद वादक उस्ताद अली अकबर खान के साथ जुड़े रहे। अठारह वर्ष की उम्र में उन्होंने नृत्य छोड़कर सितार सीखना शुरू किया।

पंडित रविशंकर संगीत की परम्परागत भारतीय शैली के अनुयायी थे। उनकी अंगुलियाँ जब भी सितार पर गतिशील होती थी, सारा वातावरण झंकृत हो उठता था। अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर भारतीय संगीत को ससम्मान प्रतिष्ठित करने में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा। उन्होंने कई नई-पुरानी संगीत रचनाओं को भी अपनी विशिष्ट शैली से सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान की।1944 में औपचारिक शिक्षा समाप्त करने के बाद वह मुंबई चले गए।

बीटल बैंड के प्रमुख हैरिसन ने 1966 के दशक में पंडित रविशंकर के साथ 6 सप्ताह तक अध्ययन किया था, और हैरिसन पंडित रविशंकर से बहुत प्रभावित हुए थे। बीटल बैंड के बाद के वर्षों में पंडित रविशंकर ने बैंड के साथ सितार बजाया था।

पंडित रविशंकर ने अपने लंबे संगीत जीवन में कई फिल्मों के लिए भी संगीत निर्देशन किया जिसमें प्रख्यात फिल्मकार सत्यजीत राय की फिल्म और गुलजार द्वारा निर्देशित ‘मीरा’ भी शामिल है। रिचर्ड एटिनबरा की पिफल्म ‘गांधी’ में भी आपका ही सुरीला संगीत था। आपने कई पाश्चात्य फिल्मों में भी संगीत दिया। सहृदय रवि शंकर ने वर्ष 1971 में ‘बांग्लादेश मुक्ति संग्राम’ के समय वहां से भारत आ गए लाखों शरणार्थियों की मदद के लिए कार्यक्रम करके धन एकत्र किया था।

हिन्दुस्तानी संगीत को रविशंकर ने रागों के मामले में भी बड़ा समृद्ध बनाया। यों तो उन्होंने परमेश्वरी, कामेश्वरी, गंगेश्वरी, जोगेश्वरी, वैरागी तोड़ी, कौशिकतोड़ी, मोहनकौंस, रसिया, मनमंजरी, पंचम आदि अनेक नये राग बनाए हैं, पर वैरागी और नटभैरव रागों का उनका सृजन सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुआ। शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो, जब रेडियो पर कोई न कोई कलाकार इनके बनाए इन दो रागों का न गाता-बजाता हो। प्रारम्भ में पंडित जी ने अमेरिका के प्रसिद्ध वायलिन वादक येहुदी मेन्युहिन के साथ जुगलबन्दियों में भी विश्व-भर का दौरा किया। तबला के महान् उस्ताद अल्ला रक्खा ने भी पंडित जी के साथ जुगलबन्दी कीं। वास्तव में इस प्रकार की जुगलबन्दियों में ही उन्होंने भारतीय वाद्य संगीत को एक नया आयाम दिया। पंडित जी ने अपनी लम्बी संगीत-यात्रा में अपने और अपने सम्बन्ध् में कुछ महत्त्वपूर्ण पुस्तकें भी लिखी हैं। ‘माई म्यूजिक माई लाइफ’ के अतिरिक्त उनकी ‘रागमाला’ नामक पुस्तक विदेश के एक सुप्रसिद्ध प्रकाशक ने प्रकाशित की है।

पंडित रवि शंकर को विभिन्न विश्वविद्यालयों से डाक्टरेट की 14 मानद उपाध्यिां मिलीं। संयुक्त राष्ट्र संघ के अंतर्गत संगीतज्ञों की एक संस्था के सदस्य रहे। रवि शंकर को तीन ग्रेमी पुरस्कार मिले। रेमन मैग्सेसे पुरस्कार, पद्म भूषण, पद्म विभूषण तथा भारत का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न भी मिला।  रवि शंकर अनेक दशकों से अपनी प्रतिभा दर्शाते रहे। 1982 के दिल्ली एशियाड  के ‘स्वागत गीत’ को उन्होंने कई स्वर प्रदान किये थे। पंडित रविशंकर का 92 वर्ष की उम्र 11 दिसम्बर, 2012 को निधन हो गया।

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