ब्लैकएंड वाइट फिल्में जो आज भी आपका मन मोह लेंगी

आज से करीब सौ वर्ष पहले दादा साहेब फालके उर्फ (धुंडिराजगोविन्दफालके) ने 1912 में अपनी पहली ‘मूक’ फिल्म बनाई जिसका नाम था ‘हरिश्चंद्र’। यह भारत की पहली फीचर फिल्म थी। इस फिल्म को बनाने में दादा साहेब ने करीब 15 हजार रुपए खर्च किए जो उस जमाने में एक मोटी रकम मानी जाती थी। धीरे-धीरे वक्त बदलता गया और मुंबई की वो फिल्म नगरी संसार भर में आज बॉलीवुड के नाम से मशहूर हो गई। बॉलीवुड में वक्त के साथ-साथ जहां एक ओर फिल्मों का बजट बढ़ता गया वहीं फिल्मों के प्रॉडक्शन के तौर-तरीकों में भी काफी बदलाहट आई। आज कंप्यूटर के युग में जहां बेमिसाल वीएफएक्स्, शानदार थ्रीडी और 4डी सिनेमा चलन में हैं वहीं कुछ ब्लैंक एंड वाइट फिल्में ऐसी हैं जो आज भी दर्शकों का मन-मोह लेती हैं। ‘खुलासा’ में हम आज ऐसी ही 18 फिल्मों की चर्चा करेंगे, जो बीतते वक्त के साथ-साथ दर्शकों के दिलो-दिमाग पर आज भी अपना असर वैसे ही बनाए हुए हैं और कोई भी दर्शक इन फिल्मों को बार-बार देखने से अपने आप को नहीं रोक पाता।

1. महल (1949)

 

Poster of Mahal_movieसन् 1949 में आई ‘महल’ पुनर्जन्म की कहानी पर बनने वाली पहली भारतीय फिल्म थी, जो उस जमाने में सुपरहिट साबित हुई। फिल्म का निर्देशन कमाल अमरोही ने किया था। फिल्म में अशोक कुमार और मधुबाला मुख्य भूमिकाओं में नजर आए। फिल्म में (अशोक कुमार) एक ऐसे युवा वकील हरिशंकर के रूप में नजर आएं हैं जो अपने पिता द्वारा खरीदी एक हवेली में रहने आता है हवेली के बारे में एक कहानी है कि ये एक असफल प्रेमी जोड़े की हवेली है जिनकी मौत चालीस साल पहले हो गई है। फिल्म के नायक हरिशंकर को एक अनजान औरत (मधुबाला) का साया अपनी ओर आकर्षित करता है। जैसे-जैसे फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है अशोक कुमार और मधुबाला की खूबसूरत अदाकारी दर्शकों का मन मोह लेती है। फिल्म का सस्पेंश और थ्रिल अंत तक दर्शकों को बांधे रखता है। कहा तो ये तक जाता है कि बॉलीवुड में सस्पेंश थ्रिलर फिल्मों  की शुरुआत इसी फिल्म से हुई। बताया जाता है कि मशहूर निर्देशक बिमल राय इस फिल्म में मुख्य एडिटर के तौर पर काम कर रहे थे। ‘महल’ के निर्माण के दौरान वो इतना प्रभावित हुए कि पुर्नजन्म को लेकर उन्होंने 1958 में ‘मधुमति’ बनाई।

फिल्म में लता मंगेशकर द्वारा गाया ‘आएगा आने वाला’ गीत बहुत प्रसिद्ध हुआ। जिसके बाद लता मंगेशकर को बॉलीवुड में खूब सफलता मिली। बताया जाता है कि जब खेमचंद प्रकाश ने इस गीत की धुन बनाई तो दोनों निर्माताओं की गीत को लेकर राय अलग अलग थी। जहां एक ओर सावक वाचा को गीत की धुन पंसद नहीं आई थी वहीं दूसरी ओर अशोक कुमार को यह धुन बहुत पंसद आई थी। बहरहाल काफी हील हुज्जत के बाद गीत को फिल्म में ले लिया गया मगर गलती से गीत के रिकॉड पर गायिका का नाम कामिनी छप गया। कामिनी फिल्म में नायिका (मधुबाला) का नाम था। जब फिल्म रिलीज हुई तो यह गीत इतना मशहूर हुआ कि रेडियो पर श्रोताओं के ढेरों पत्र कामिनी के नाम से आने लगे। इसके बाद एचएमव्ही रेडियो पर जानकारी दी गई कि गीत की गायिका कामिनी नहीं लता मंगेशकर हैं। कहा जाता है कि इस गीत के बाद लता मंगेशकर बॉलीबुड में रातों-रात प्रसिद्ध हो गईं।

 

देखिए यूट्यूब पर पूरी फिल्म

 

 

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