यात्रा निजी, योगदान सामाजिक : अर्जुन सिंह


मनुष्य एक जिज्ञासु प्राणी है | यह जिज्ञासा ही है, जो मनुष्य को अतीत से वर्तमान और भविष्य की ओर अग्रसर करती है | अतीत से ही मनुष्य अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए विभिन्न तरीकों को अपनाता रहा है, जिनमें एक महत्वपूर्ण तरीका यात्राएं भी रही है। यात्राएं मनुष्य सभ्यता व संस्कृति के विकास की घोतक रही हैं| पूरे विश्‍व में आज हम जिन विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों से मुखातिब हैं,  वे सभी समय व स्थान विशेष पर पनपी हैं, लेकिन इनका विकास आपसी मेलमिलाप से ही सम्भव हुआ है और आगे भी होता रहेगा।

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इतिहास में यात्राओं का अहम् किरदार रहा है, हालाँकि इन यात्राओं के उद्देश्य भिन्न-भिन्न रहे हैं। फिर भी यात्राओं की ऐतिहासिक महत्‍व को नकारा नहीं जा सकता है। इतिहास में अनेकों ऐतिहासिक यात्राएं हुई हैं, जिन्हें लिखित रूप में दर्ज किया गया है और  जो तात्कालिक समय विशेष की सभ्यता, संस्कृति व आवाम से हमें अवगत कराती हैं | इतिहासकार भी यात्रावृतांत को इतिहास के महत्वपूर्ण स्त्रोत के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार यात्राएं हमें किसी स्थान विशेष की संस्कृति, सभ्यता, समाज, राजनीति, भाषा तथा आवाम के दृष्टिकोण को न केवल समझने का अवसर देती है, बल्कि पूर्वाग्रहों, मान्यताओं तथा धारणाओं पर जमी काई को हटाने का काम भी करती हैं। अतः यात्राओं के लिखित वृतांत न केवल हमें अतीत में झाँकने के अवसर देते हैं, बल्कि हमें अतीत से वर्तमान के सफर का आकलन करने का अवसर भी          देते हैं |

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इसी कड़ी में यात्रा वृतांत की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए युवा साहित्यकार दिनेश कर्नाटक ने दक्षिण भारत की यात्रा के अनुभवों को ‘दक्षिण भारत में सोलह दिन’ नामक पुस्तक में संकलित किया है। पुस्तक की शुरुआत दक्षिण भारत के पिछले अनुभवों से होती है, जब लेखक ऑटोमोबाइल कम्पनी की नौकरी के दौरान एक माह के प्रशिक्षण कार्यक्रम के सिलसिले में मदुरै रुकते हैं। वहीँ सप्ताहांत के दौरान कन्याकुमारी तथा कोडाईकोनाल जाना होता है। उस दौरान लेखक को दक्षिण की हरियाली, वहाँ का जन-जीवन और शांत माहौल काफी प्रभावित करता है। प्रशिक्षण के दौरान समय अभाव के चलते दक्षिण को अच्छे से न देख पाने की कसक दिल में रह जाती है |

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दक्षिण भारत को देखने की चाह और दिल में बैठी कसक को मिटाने की हसरत से 16 दिसम्बर, 2007 को तीन दोस्तों की दक्षिण यात्रा शुरू होती है। सोलह दिनों की यात्रा दक्षिण भारत के कुछ चुनिंदा शहरों- चेन्नई, काँचीपुरम,  महाबलीपुरम, पाँडिचेरी,  चिदम्बरम,  तंजौर, तिरुच्ची,  कन्याकुमारी,  शुचीन्द्रम,  नेडुमगाड,  तिरूअनंतपुरम, कोच्चि,  मैसूर तथा बैंगलूर की गयी। इन शहरों की यात्रा को  तेरह खंडों ( चेन्नई में तेज बारिश के बीच, हजार मंदिरों वाला शहर, कला, संस्कृति और शिल्प की नगरी, अरविन्दो की भावभूमि में, जहाँ से नटराज देश-विदेश में गए थे, वह अजीब शख्स, जहाँ तीन सुमंद्र मिलते हैं, पहचान का सवाल, विवधता में सुन्दरता है, भाषाओँ के सवाल, पहला चर्च और किशोर-रफ़ी का वह मुरीद, कालीकट होते हुए मैसूर, इसमें कौनसी बड़ी बात है ?) में संकलित किया गया है |

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यात्रा के दौरान नई जगह, नए परिवेश, अनजान लोग, भाषा की समस्या के बावजूद लेखक ने जो भी देखा, सुना और अनुभव किया, उन सबको बिना लागलपेट के बेबाक अंदाज से पुस्तक में दर्ज किया है। उनका कहना है कि कोई भी मुसाफ़िर राह में मिले व्यक्तियों के बारे में, स्थानीय समाज के बारे में और उनके व्यवहार के बारे में कोई पक्की धारणा नहीं बना सकता। वह जो कुछ देखता है, जिस रूप में देखता है, उसे दर्ज किए बिना रह भी नहीं सकता। लेखक ने पुस्तक के साथ भी यही काम किया है। उनकी लेखनी में कहीं भी छिपाव-दुराव नहीं है।

लेखक के कहे अनुसार,  ‘वर्षों तक एक ही जगह में रहने से व्यक्ति में यांत्रिकता आ जाती है। एक भयानक तरह की ऊब व उदासी घेरने लगती है। इससे निराशा पैदा होती है। हम खुद को कई तरह के बन्धनों से बांधे रहते हैं । यात्रा न सिर्फ इन गांठों को खोलने का हमें मौका देती है, बल्कि उनको समझने का नजरिया भी देती है।‘ अतः यात्राएं हमारे लिए आवश्यक हो जाती हैं। वे हमें नया सीखने व समझने का अवसर देती हैं, पर इस आधुनिक समाज में जहाँ बुनियादी जरूरतों के लाले पड़ रहे हैं, वहां तो यात्रा महज सपना बनकर ही रह जाती है। हर साल ढेरों वादों को रदृी में फेंकने पर मजबूर होना पड़ता है |

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ऐसे में जून की तपती गर्मी में शीतल पेय का काम करती हैं- ‘दक्षिण भारत में सोलह दिन’ जैसी कृतियाँ।

लेखक ने दक्षिण भारत की सुन्दरता को अपने लेखन के जादू भरे अंदाज से उकेरा है। कभी लेखक अतीत के सागर में तैरने लगता है, तो कभी वर्तमान में उड़ान भरने लगता है। पुस्तक केवल प्राकृतिक सौदंर्य व स्मारकों का ही चित्रण मात्र नहीं है। चिंतनशील और संवेदनशील लेखक ने भाषा,  संस्कृति,  परम्परा व विकास जैसे विभिन्न मसलों पर चिन्तन,  विमर्श व सवाल करने के अवसर दिए हैं। विवधता में एकता को परिलक्षित करती पुस्तक दक्षिण भारत को लेकर देश के अन्य कोनों में बनी धारणाओं व पूर्वाग्रहों से कालिख हटाने का काम करती है। पुस्तक में शामिल किए गए रंगीन यात्रा चित्र दक्षिण भारत के सौंदर्य की एक झलक प्रस्तुत कर रहे हैं। रंगीन चित्रों के कारण पुस्तक के साथ-साथ गुजरते हुए महसूस होता है कि हम दक्षिण भारत में यात्रा कर रहे हैं या यूँ कहूँ कि किसी फिल्म के भांति दृश्य आँखों के आगे चलते रहते हैं।

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इन सब के अतिरिक्त पुस्तक की सहज भाषा शैली व विवरण स्कूली शिक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में अध्यनरत बच्चों व अध्यापन से जुड़े शिक्षकों के लिए दक्षिण भारत को समझने के बेहतर अवसर उपलब्ध करवाती है। हालाँकि दिमाग में यह सवाल आ सकता है कि जब इन्टरनेट पर तमाम जानकारियां उपलब्ध हैं, तो फिर इस पुस्तक को क्यों पढ़ें? इसके संदर्भ में कहा जा सकता है कि‍  इंटरनेट पर जानकारियां तो उपलब्ध हो सकती हैं, लेकिन एक संवेदनशील व चिंतनशील लेखक का दृष्टिकोण नहीं मिलेगा तथा विविध विषयों पर एक साथ संकलित अनुभव नहीं मिलेंगे। आवम के दृष्टिकोण का भी अभाव बना रहता है। सबसे गंभीर चिंता का विषय वे क्षेत्र जहाँ इन्टरनेट जैसी तमाम सुविधाओं उपलब्ध नहीं हैं, उन स्थानों के लिए यह पुस्तक एक बेहतरीन विकल्प है। हालाँकि हर पुस्तक में जोड़ने-घटाने के सम्भावना बनी रहती है, पाठक का मंतव्य भिन्न-भिन्न होता है, फिर भी हम यह कह सकते हैं कि दिनेश कर्नाटक का प्रयास सराहनीय व अनुकरणीय है।

 

अंत में ‘यात्रा पूर्णतया निजी है, लेकिन योगदान सामाजिक है।’

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पुस्‍तक : दक्षि‍ण भारत में सोलह दि‍न (यात्रा वृत्‍तांत)

लेखक : दि‍नेश कर्नाटक

मूल्‍य (अजि‍ल्‍द) : 120 रुपये

(सजि‍ल्‍द) : 300 रुपये

प्रकाशक: लेखक मंच प्रकाशन

433, नीति‍खंड-3, इंदि‍रापुरम

गाजि‍याबाद -201014

उत्‍तर प्रदेश

मोबाइल-9871344533

ईमेल- anuraglekhak@gmail.com


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