सकारात्मक बदलावों के लिए व्यग्र एक कवि : श्रीनिवास श्रीकान्त

एक सचेत और सम्वेदना से भरा कवि अपने देशकाल और आसपास से निरन्तर प्रभावित रहता है। उसकी कविता में ये प्रभाव सहज ही पहचाने जा सकते हैं। उत्तराखण्ड के काव्य रचनाकार कपिलेश भोज ऐसे ही एक कवि हैं, जिनकी कृतियों में उनकी कुमाऊँनी भू-संस्कृति की छाप तद्वत मौजूद है। मूलतः वह एक जनधर्मी कवि हैं और बदलाव के लिए अपनी भाषिक संरचनाओं में सामाजिक और सकारात्मक बदलावों के लिए व्यग्र दिखाई देते हैं। अपने पर्वतीय भूगोल और पहाड़ के ग्रामांचलों के लोक जीवन से उनकी प्रतिबद्धता स्थायी है, जो निर्गमन के बावजूद उनके ज़हन में जिन्दा है- कहीं स्मृतियों के रूप में तो कहीं सघन रिश्तों के रूप में। रानीखेत, अल्मोड़ा, नैनीताल और हिमालय के अन्तरिम क्षेत्र उन्हें जुम्बिश में ले आते हैं और वे उन चित्रों की लघुता और महनीयता को अपनी क्षमता के अनुरूप ही रेखांकित करते हैं।

‘यह जो वक्‍त है’ (2010) के बाद ‘ताकि वसन्त में खिल सकें फूल’ (2013) उनका दूसरा कविता-संग्रह है। संकलन की कविताएँ अपनी तफ़सीलों में कुमाऊँ अंचल के जन-जीवन के सम्बन्ध में न केवल उपयोगी जानकारी मुहय्या करती हैं, बल्कि वहाँ की विशिष्ट और कठोर पहचान को पाठक के मन में उकेरती हैं। रिश्ते किस तरह छूटते हैं और आदमी के वर्तमान में वे किस तरह उसके हृदय व मन-मस्तिष्क में अपनी एक अलग ताब रखते हैं, प्रस्तुत संग्रह की कुछेक कविताएँ इसे पूरी शिद्दत के साथ बयान करती हैं। देहात के अंचल की सौम्यता और स्नेहिल छाँव के लिए सहज आतुर नजर आती हैं ये कविताएँ।

‘इजा तू रहना सदा मेरे साथ’ स्नेह के बुनियादी रिश्तों का एक भावपरक चित्रण और विवरण है। इस कविता में लोक तत्व का समावेश प्रामाणिक बिम्ब संयोजन के जरिए सघन व सार रूप में निर्मित किया गया है। मसलन- ‘लम्फू के पीले उजाले में/एक ओर बढ़ती जाती थी/अंगारों की तपन/दूसरी ओर/उसकी यादों के गोलों से/खुलते चले जाते थे/धागों पर धागे….’ कपिलेश के कवि ने यहाँ भाववाचक (एबस्ट्रेक्ट) ढंग से अपनी ठेठ देहाती श्रमशील माँ का चित्र इसी तरह के बिम्ब समन्वय से तद्वत रचा है। खास बात यह है कि माता के इस संस्मरण में स्मृति का भाव कहीं भी बौद्धिक क्षोभ अथवा नकारात्मक गृह विरह (नॉस्टेल्जिया) का भाव पैदा नहीं करता। जीवन की सीमाओं में वह एक अनश्वर छवि का नितान्त भावपरक ढंग से सहज ही सृजन कर जाता है।

माँ की एक और नायाब छवि उपेक्षित नहीं की जा सकती। यहाँ वह है पहाड़ की एक कामगार किसान माँ। एक बानगी- ‘पत्थरों और तुषार के तीखेपन को रौंदती/ भतिना और खौड़िया के जंगलों में/ धँसती चली जाती थी वह/और फिर/लकड़ियों या बाँज के पतेलों का गट्ठर लिए/लौटती थी तब/धूप में नहा रहे होते थे जब/नदी-पहाड़-पत्ते-खेत और घर…..’

पहाड़ी जीवन में श्रमजीवी औरतों का एक अहम मुकाम है। उनका जीवन वहाँ के समाज के लिए पूजनीय निधि (वर्शिपेबल ट्रस्ट) है। ‘कहती हैं पहाड़ की औरतें’ शीर्षक कविता में भोज के कवि ने कुछेक लफ्जों में ही गाँव की औरत का एक अनोखा चित्र खींचा है। बाईस असमान पंक्तियों की इस कविता में वह यथार्थ के पदस्थल (पैडस्टल) पर, अपनी त्रासदिक अवस्थिति के बावजूद, आत्म सम्मान के साथ खड़ी है। यह कोई मिथक नहीं, अकूट यथार्थ है। ये पहाड़ की वे औरतें हैं, जिन्होंने अपने समर्पित श्रम से ‘खेतों को दी है हरियाली’ और जिनका ‘खून-पसीना/लहराता है/धान, गेहूँ और जौ की बालियों में…..’ ‘खिला रही हैं, वे ‘खुशियों और हौसलों के फूल’। यह एक संघर्षशील, प्रगतिशील और जीवन में भरपूर निष्ठा रखने वाली स्त्री की छवि है।

‘क्या मनुष्य नहीं हूँ मैं ?’ कविता में पहाड़ की यही स्त्री अपनी दमित स्थिति का जिक्र करती हुई अपनी कुर्बानी के लिए न्याय की गुहार भी लगाती है। यथा- ‘हे पुरुष!/तुम्हारी अतृप्त इच्छाओं को/मौन रहकर पूरा करती/झिंझोड़ी जाती रहूँ बार-बार… बताओ मेरे सहचर/क्या मनुष्य नहीं हूँ मैं?’

अपने पहाड़ से कवि को बेपनाह मोहब्बत है। प्रस्तुत संकलन की एकाधिक कविताओं में पहाड़ी जीवन और प्रकृति के रंग शेड देखने को मिलेंगे, जिन्हें उसने भरपूर जिया है और कविता लिखते समय भी हूबहू महसूस किया है। ‘मेरी यादों का लखनाड़ी’ में कवि के अपने गाँव का जिक्र है जिससे सम्बन्धित स्मृतियों को उसने चुनिन्दा ढंग से सँजोया है। रचयिता की यह खूबी है कि वह अपने इलाके की सभी भौतिक विशेषताओं को टुकड़ों में सँजो कर अपने गाँव और उसके आसपास का एक सजीव चित्र बनाता है। विनियोजित करने पर ये टुकड़े सामान्य लगेंगे, लेकिन अपने संयोजन में वे आपको एक अनदेखी-अनजानी और सुन्दर-रमणीक स्थलीय गरिमा से साक्षात्कार कराते हैं। पूरी कविता की अभिव्यक्ति अभिधात्मक होते हुए भी वह अनजाने ही एक विलक्षण जगह की पहचान को स्थिर करती है-

‘भतिना के/ऊँचे शिखर/और/तीन ओर से/पहरेदारों-सी खड़ी/छोटी पहाड़ियों के आगोश में/दुबके पड़े/बौरा रौ घाटी के/हे मेरे प्यारे गाँव/लखनाड़ी!’

एक ग्रामीण का अपने स्थल को छोड़कर जाना कैसा अनुभव होगा, यह कविता इसका सरल चित्रण करती है। यथा, स्मृतियों में उभरता यह बिम्ब- ‘भले ही/बरसों पहले/तुमसे हो जाना पड़ा/मुझे दूर/बनकर रह जाना पड़ा/प्रवासी/मगर/अक्सर/उड़कर चला ही जाता है/मेरा मन-पाखी/तुम्हारी ओर…!’

‘मेरी यादों का नैनीताल’ में शहर का आवश्यक भूगोल और स्थानों के संदर्भ निजी प्रसंग से भरे हैं, फिर भी कविता के रूप में एक पर्वतीय पर्यटन स्थली के मोण्टाज का निर्माण करते हैं। इनमें ही कुछ पूर्व के जिए शहर की कुछेक नामाचीन शख्सीयतों का जिक्र भी मौजूद है लेकिन अत्यावश्यक जानकारी के अभाव में वे महज अपर्याप्त व्यक्ति चित्र ही नजर आते हैं। यानी चेहरे रचयिता के ज़हन में ही उभरे, वे सब मुख्तसर भी कोई संकेतात्मक पोर्टेªट नहीं बन पाए।

इसी तरह के व्यक्तिगत शख्सियतों के सन्दर्भ ‘कहो, कैसे हो, रानीखेत?’ और ‘यह है बौरा रौ घाटी’ में भी हैं। जहाँ तक रानीखेत और बौरा रौ घाटी की शब्द चित्रीयता का सवाल है, इन्हें यथातथ्य ही कहा जा सकता है, मगर शख्सियतों का सूचीबद्ध विवरण कविता को कुछ हद तक हलका बना देता है। फिर भी जो व्यक्ति चित्र कवि ने ‘तुम भी क्या आदमी थे यार गिर्दा!’ और ‘हे चिर धावक, हे चिर यात्री!’ में उकेरे हैं, वे निश्चय ही गिर्दा और शेखर पाठक का एक सुथरा-सा स्नेप-शॉट तो छोड़ ही जाते हैं।

सुदूर अतीत-स्मृतियों में ‘चौबटिया के पथ पर’ एक परिपूर्ण कविता है, जिसे कवि ने शब्द संयम के साथ लिखा है। रचना की बनावट और बुनावट भी अपने लक्षित समय को सरल रेखात्मक ढंग से सरंजाम देती है। यही नहीं, इसमें जीवनी के कुछ सामान्यतः रुचिकर अंश भी हैं, जो कविता में शामिल होकर जीवन के अहम कोनों को प्रकाशित करते हैं। यहाँ समय के अन्तराल भी अपनी रैखिक प्रतीति नहीं देते। ‘लगने लगता है कि जैसे यह 2009 नहीं बल्कि 1965-66 है…. ‘बर्फ, कोहरे और धूप के बीच अपने परिवार जनों के साथ उन्हीं पगडण्डियों पर कुलाँचें भरता एक बच्चा’। असली जिन्दगी में भी स्मृतियों के प्रभाव में काल अक्सर वर्ततान में गुजरे हुए काल की मरीचिका में रूपान्तरित हो जाता है- कवि ने ऐसी देशिक (स्पेसियल) अनुभूति को सांकेतिक ढंग से रेखांकित किया है। कवि अपनी स्मार्त कविताओं में अपने परिचितों का जिक्र करना भी नहीं भूलता। रानीखेत के चौबटिया में घूमते हुए वह भौगोलिक बिन्दुओं को भी परिगणन शैली में याद करना नहीं भूलता- यहाँ नन्दाघुण्टी, त्रिशूल, नन्दादेवी के ये सुझावी बिन्दु प्रकृति का एक खूबसूरत फ्रेम तैयार करते हैं। इन शिखरों को क्षेत्र से बाहर के लोग भी जानते हैं, अतः रचना में इनका जिक्र ही पर्याप्त दिखाई देता है।

संकलन की ‘आकाश बादलों से ढका है’ और ‘कम हो गया एक वोटर’ सामाजिक त्रासदियों पर रोशनी प्रसारित करती कविताएँ हैं। एक तरफ तो वे घटनाएँ हैं, संघर्षमय अस्तित्व की दास्तानें और वारदातें और दूसरी तरफ वे पिछड़े हुए देहाती परिवारों के सन्ताप को भी बयान करती हैं। वह सारा दोष प्रकृति के ऋतु-विपर्यय को देता है, जिसकी वजह से उसके जीने के ‘सारे काम काज’ जड़ हो चुके हैं, तिस पर परिवार का आर्थिक दुर्बलता के कारण असहनीय बोझ भी। एक भारतीय औसत परिवार में उसके दुख-दर्द का इजहार सम्वेदनामय है। यथा-

‘पाँच बेटियों का बाप/रतन सिंह/कँपकँपाता शरीर लिए/आकाश की ओर टकटकी लगा/पुकार रहा है-/बादलों को हटा/अब तो/कल सवेरे प्रकट होओे/हे सूर्य भगवान!/ताकि निकल सकूँ मैं/काम पर/क्योंकि/आटा बचा है/बस/आज रात के लिए ही…’

यहाँ सहसा प्रेमचन्द के ‘गोदान’ और पर्ल एस बक के ‘गुड अर्थ’ की याद हो आती है।

‘कम हो गया एक वोटर’ में शराब ही समाज की त्रासदी का कारण है, जिसे कवि ने अति मद्यपता से त्रस्त गणेश के बाबू के जरिए प्रदर्शित किया है। इस दृष्टि से यहाँ कविता महज कार्यात्मक और वृत्तिमूलक ही नहीं, वह व्यंजना से भी परिपूर्ण और सहज मानवीय करुणा से भरी है। पात्र की अकाल मृत्यु को रचयिता ने एक वोटर के कम होने का व्यंग्य निर्मित करके हमारे ढीले-ढाले और स्वार्थकेन्द्रित प्रजातंत्र पर तन्ज की है। यह कवि‍ता अपने फार्मेट में एक त्रासदिक कहानी भी है, जिसे कम शब्दों में ही कामयाबी के साथ सम्प्रेषित किया गया है।

कपिलेश भोज के कवि ने तथाकथित भोग्य आजादी के बुर्जुआ वातावरण के खिलाफ लड़ी जा रही क्रान्ति का समर्थन किया है। कहीं स्पष्ट शब्दों में तो कहीं संकेतात्मक ढंग से। हमारे जैसे समाजवादी प्रजातंत्र पर उन्‍होंने कुछेक कविताओं में मारक व्यंजना भी की है। ‘होगा विकास एक दिन’ व्यंग्य की शक्ल में उसका एक जोरदार और सार्थक प्रतिवाद है। वर्तमान समय में परिधिजन्य और पिछड़े हुए क्षेत्रों में जड़ता की स्थिति है, उस पर इस कविता में एक जोरदार ढंग से अपनी बात की है। चर्चित कविता में कपिलेश ने व्यंग्योक्ति के जरिए अपने लक्ष्य का बेधन किया है। मसलन-

‘…पाँच साल में न सही/अगले पाँच साल में/या/उसके अगले पाँच साल में/धीरे-धीरे ही सही/होगा/जरूर होगा/होकर ही रहेगा/तुम्हारा विकास/आखिर/एक न एक दिन…..’

मनसूबों और अहम कार्यों का निरन्तर स्थगन ही हमारे जैसे समाजवादी और वर्गीय प्रजातंत्र का शासन करने का तौर तरीका है, जिसे इस कविता में एक खण्डनात्मक और व्यंग्योक्त पैमाने पर पूरा किया गया है।

उपर्युक्त के सन्दर्भ में कवि यह भी चाहता है कि सिर्फ कविता में ही न जलती रहे क्रान्ति की मशाल। ऐसी मशाल का जिक्र करते हुए एक कविता में यह स्पष्ट कहा गया है कि-

‘बरसों से/वे/बड़े ही ओजस्वी स्वर में/सुनाते आ रहे हैं/अपनी वे कविताएँ/जिनमें की गई है गुहार/मशाल जलाने की…’ पर ‘वाहवाही लूटने के बावजूद/कहीं नहीं जली/उनके आसपास/एक भी मशाल/और/जो कुछ मशालें/जली हुई हैं दूर-दराज/ उनसे नहीं है/उनका कोई वास्ता।‘  (जो सिर्फ कविता में जलाते हैं मशाल)

कवि ने यह चाहा है कि क्रान्ति न महज शब्दों में ही जीती रहे, वह उसके फ्रेमवर्क से बाहर आए, जन चेतना की भूमि पर उतर कर सक्रिय रूप से अपनी भूमिका अदा करे। हेमचन्द्र पाण्डेय की स्मृति में लिखी गई ‘आखिर कब तक ?’, ‘कभी-कभी ऐसा ही कुछ सोचते हैं विमल दा’, ‘दोस्त फेलिक्स ग्रीन!’, ‘आओ पिघला दे’ बर्फ, ताकि वसन्त में खिल सकें  फूल’ प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से क्रान्ति के उभार का समर्थन करती हुई कविताएँ हैं।

परिचर्चित कविताओं के अतिरि‍क्‍त ‘मण्डीहाउस से लौटते हुए’, ‘भाऊ यह मेला नहीं है’, ‘कविता का साथ’, ‘महाकवि की जयन्ती’, ‘समीक्षक का कमाल’, ‘बनाई गई है यह जो दुनिया’, ‘हमारे लिए’,  ‘अलविदा शेफालिका…..’ समकालीन जीवन के एकाधिक मुद्दों व आशयों को स्पर्श करती हुई कुछेक अधोरेखांकित करने योग्य कविताएँ हैं।

पुस्तकः ताकि वसन्त में खिल सकें फूल (कविता-संग्रह)

कविः     कपिलेश भोज

प्रकाशकः अंतिका प्रकाशन, सी-56 /यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-II, गाजियाबाद (उ.प्र.)-201005

मूल्य:    230 रुपये



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