‘सफ़र में आदमी’ : सुभाष नीरव की लघुकथाओं का गौर-तलब संग्रह

बीसवीं शताब्दी के नवें दशक को हिन्दी लघुकथा का उत्कर्षकाल कहा जाता है। उन दिनों शताधिक लघुकथाकार  सक्रिय थे और जैसा कि ऎसी स्थितियों में प्रायः होता है, उस भीड़ में कुछ ऎसे रचनाकार भी थे जो विधा के लिए बोझ थे…सतही रचनाएं लिख रहे थे, लेकिन एक बड़ी संख्या गंभीर रचनाकारों की भी थी, जो पूरी तरह लघुकथा के लिए समर्पित थे और लघुकथा को बेहतर बनाने और बेहतर दिशा देने की जी-जान से कोशिश कर रहे थे। उनके इस प्रयास और समर्पण ने ही दूसरी विधाओं के समानातंर इस विधा को स्थापना प्रदान की थी। उससे पहले आलोचक लघुकथा विधा को महत्व देते ही नहीं थे। उन रचनाकारों में से कुछेक रचनाकार आज भी सक्रिय हैं. इनमें कुछ वे रचनाकार हैं जो अन्य विधाओं में अपने सक्रिय योगदान के साथ उतनी ही गंभीरता से लघुकथाएं भी लिख रहे थे और आज भी लिख रहे हैं। सुभाष नीरव उनमें से एक प्रमुख नाम है।

कविता, कहानी, समीक्षा, संस्मरण, बाल-साहित्य  आदि विभिन्न विधाओं में निरंतर सृजन करते हुए भी लघुकथा के प्रति नीरव का समर्पण श्लाघनीय है। निरतंर श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर की यात्रा करते हुए उनके कथाकार ने इस विधा में अपना जो उल्लेखनीय योगदान दिया, वह स्पृहणीय है। उनकी लघुकथाओं में बहुआयामी जीवन व्याख्यायित हुआ है। सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि विषमताओं, विद्रूपताओं और विडम्बनाओं को उदघाटित करती उनकी लघुकथाएं, उनकी लेखकीय अनुभवजन्यता को प्रमाणित करती हैं। उनके पास सूक्ष्म पर्यवेक्षण दृष्टि, विषयानुकूल भाषा और आकर्षक शब्द-संयोजन है और यही कारण है कि उनकी सभी लघुकथाएं अलंघ्य सीमांकन परिधि में अपने को परिभाषित करने में पूरी तरह समर्थ हैं। उनका यह कौशल सहज-संभाव्य है, प्रत्यारोपित नहीं। यह सहज संभाव्यता रचना को विशिष्ट बनाती है और वही विशिष्टता उन्हें अपने समकालीनों में एक कद्दावर लघुकथाकार के रूप में स्थापित करती है। उनके सद्यः प्रकाशित लघुकथा संग्रह – ‘सफ़र में आदमी’ के माध्यम से उनकी लघुकथाओं की पड़ताल आवश्यक है।

सुभाष नीरव का लघुकथाकार तेजी से बदलती जीवन स्थितियों पर पैनी दृष्टि रखते हुए अपने रचनाकार को अपडेट करते हुए अपने रचना-संसार को विस्तार देता रहा है। उनकी रचनाओं में भटकाव और दोहराव का अभाव और चरित्रों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण उन्हें दूसरों से अलग करता है। उनकी अधिकांश लघुकथाएं मध्य और निम्न मध्यवर्गीय जीवन को विश्लेषित करती हैं, लेकिन कुछेक में आभिजात्य और निम्नवर्गीय जीवन भी चित्रित हुआ है।

मध्य  और निम्न मध्यवर्गीय समाज आज भी सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और अंधविश्वासों की जकड़न में उतना ही जकड़ा हुआ है, जितना वह सैकड़ों वर्ष पहले था. दहेज दानव जैसी सामाजिक कुरुतियों ने पहले की अपेक्षा आज कहीं अधिक मारक स्थिति उत्पन्न कर दी है। नीरव ने ’कत्ल होता सपना’ और ’नालायक’ लघुकथाओं में इस विषय को गंभीरता से अभिव्यक्त किया है। ’कमरा’ और ’कबाड़’ एक साथ दो सामाजिक पक्षों – आर्थिक और वृद्ध जीवन पर प्रकाश डालती हैं। ’तिड़के घड़े’ भी आज अर्थहीन और उपेक्षित हो चुके वृद्ध माता-पिता का अत्यंत विचारणीय आख्यान है। नीरव का लेखक मन घूम-घूमकर वृद्धों के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करने से अपने रोक नहीं पाता। उनकी बड़ी कहानियों की तरह कई लघुकथाओं की विषयवस्तु भी वृद्धों के जीवन पर आधारित है, लेकिन ’तिड़के घड़े’ जैसी भावाभिव्यक्ति, भाषा का तिलस्म और शैली की अभिव्यजंकता अन्य लघुकथाओं से भिन्न है और यह भिन्नता इस लघुकथा को न केवल उनकी अन्य लघुकथाओं से श्रेष्ठ सिद्ध करती है, अपितु मेरा मनना है कि यह लघुकथा इस विषय को केन्द्र में रखकर लिखी गई हिन्दी लघुकथाओं में सर्वश्रेष्ठ लघुकथा है।

’दिहाड़ी’, ’वॉकर’, ’कड़वा अपवाद’, ’बीमार’, ’एक खुशी खोखली-सी’, आदि  लघुकथाएं आर्थिक विद्रूपता  को चित्रित करती हैं। ’सफ़र में आदमी’ मनुष्य की उस बेबसी पर प्रकाश डालती है, जहां वह दूसरों की स्थितियों पर नाक-भौं सिकोड़ता हुआ स्वयं उसी का हिस्सा बनने के लिए अभिशप्त हो जाता है. ’एक और कस्बा’, ’धर्म-विधर्म’ और ’इंसानी रंग’ धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता पर केन्द्रित लघुकथाएं हैं. ’इंसानी रंग’ अमरीक सिंह के माध्यम से चौरासी के सिख दंगों की याद ताजा कर देती है. साम्प्रदायिकता का एक ही रंग होता है जो कत्ल होने के बाद निकले इंसान के रक्त जैसा लाल होता है. नीरव ने अमरीक सिंह के शरणदाता शर्मा परिवार के मनोविज्ञान को बहुत ही बारीकी से पकड़ा है। ’धर्म-विधर्म’ समय के उस सच को उद्धाटित करती है, जो नयी पीढ़ी के अंतर्मन को आंदोलित कर रहा है। वैश्विक प्रभाव कहें या जीवन के अहम सवालों से दो-चार होने का परिणाम, नयी पीढ़ी से ही यह आशा की जा सकती है कि वह जाति विभेद को मिटाने में एक सकारात्मक भूमिका निभाएगी।

’अपने  घर जाओ अंकल’ बाल मनोविज्ञान को अभिव्यंजित करती एक लाजवाब लघुकथा है। शहर में कर्फ्यू है, लेकिन बच्चे क्या जानें कर्फ्यू! वे सुनसान सड़क पर खेलने के लिए उतर पड़ते हैं। पुलिसवाला उन्हें समझाता है और घर जाने के की सलाह देता है। वह कहता है, “कर्फ्यू में घर से बाहर निकलने वाले को बन्दूक से गोली मार दी जाती है, समझे!” एक बच्चा मासूमियत से  उससे कहता है, “तुम भी तो घर से बाहर सड़क पर घूम रहे हो…तुम्हें भी तो कोई गोली मार सकता है…तुम भी अपने घर जाओ न अंकल।”

’रंग-परिवर्तन’ और ’अपने  क्षेत्र का दर्द’ राजनैतिक क्षेत्र की लघुकथाएं हैं। ’रंग परिवर्तन’  एक धर्मांध नेता के भ्रष्ट चेहरे से पर्दा उतारती है। नीरव की अनेक लघुकथाओं में सरकारी कार्यालयों और कर्मचारियों की स्थितियों को चित्रित किया गया है। ’दिहाड़ी’, ’रफ-कॉपी’, ’चन्द्रनाथ की नियुक्ति’ और ’बीमारी’ ऎसी ही लघुकथाएं हैं।

’अकेला  चना’ व्यवस्था से टकराने के दुष्परिणाम पर प्रकाश डालती है, जहां बस टिकट चेक करने वालों के कारण लेट हो रही बस के एक यात्री की आपत्ति पर उसे बस से उतारकर टिकट होने के बावजूद उसे बिना टिकट घोषित कर जुर्माना लगाया जाता है। व्यवस्था के  इस क्रूर सच के माध्यम से नीरव ने बड़े क्रूर सचों की ओर संकेत किया है। उनकी कुछ लघुकथाओं की सामान्य-सी दिखने वाली घटनाएं असामान्य सच के विषय में सोचने को विवश करती हैं।

बाजारवाद  आज का कड़वा सच है। नीरव की ’मकड़ी’ लघुकथा उस सच को गहनता से रूपायित करती है। इस लघुकथा पर अपने आलेख – “समकालीन लघुकथा का जागरूक हस्ताक्षर’ में बलराम अग्रवाल का कथन महत्वपूर्ण है— “मकड़ी एक ऎसी संपूर्ण लघुकथा है, जिसकी तुलना में ’बाजार’ के हिंसक और मारक चरित्र को केन्द्र में रखकर लिखी गई कोई अन्य लघुकथा आसानी से टिक नहीं पाएगी।” (पृ. १००).

सुभाष नीरव अपनी कुछ लघुकथाओं में भाषा का एक ऐसा खूबसूरत प्रयोग करते हैं कि पाठक उसकी गिरफ़्त में आने से बच नहीं पाता। यह भाषागत प्रयोग लघुकथा को कमज़ोर नहीं, बल्कि और ऊँचाई दे जाता है।  ‘तिड़के घड़े’, ‘एक और कस्बा’ ‘मुस्कराहट’ ऐसी ही लघुकथाएं हैं।

उपरोक्त समीक्षित लघुकथाओं के अतिरिक्त नीरव की लघुकथाएं ’अच्छा तरीका’, ’चीत्कार’, ’फर्क़’, ’एक खुशी खोखली-सी’, ’अपना-अपना नशा’, ’मरना-जीना’, ’धूप’, ’कोठे की औलाद’ आदि लघुकथाएं भी उलेखनीय हैं। कहना उचित होगा कि नीरव ने एक सशक्त लघुकथाकार के रूप में अपनी एक अक्षय छवि निर्मित की है। हिन्दी लघुकथा साहित्य के लिए उनका योगदान प्रशंसनीय है।  इस विधा को उनसे बहुत अधिक अपेक्षाएं हैं।

सफ़र में आदमी (लघुकथा संग्रह),

लेखक : सुभाष नीरव,

प्रकाशक : नीरज बुक सेंटर, सी-३२,

आर्यनगर सोसाइटी,पटपड़गंज,

दिल्ली-११० ०९२, आवरण- राजकमल, पृष्ठ – ११२,

मूल्य – १५०/-

 

 



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