नेकियों का मौसम है माहे रमजान


माहे रमजान को नेकियों का मौसमे ‘बहार’ कहा गया है। जिस तरह मौसमे बहार में हर तरफ सब्ज़ ही सब्ज़ नजर आता है। हर तरफ रंग-बिरंगे फूल नजर आते हैं। इसी तरह रमजान में भी नेकियों पर बहार आई होती है। जो शख्स आम दिनों में इबादतों से दूर होता है, वह भी रमजान में इबादतगुजार बन जाता है। यह सब्र का महीना है और सब्र का बदला ज़न्नत है। यह महीना समाज के गरीब और जरूरतमंद बंदों के साथ हमदर्दी का महीना है। इस महीने में रोजादार को इफ्तार कराने वाले के गुनाह माफ हो जाते हैं। पैगम्बर मोहम्मद सल्ल. से उनके किसी सहाबी (साथी) ने पूछा- अगर हममें से किसी के पास इतनी गुंजाइश न हो तो वो क्या करे। तब मोहम्मद साहब ने कहा कि एक खजूर या पानी से भी इफ्तार कराया जा सकता है।

शाबान की उनतीस्वीं तारीख को रमजान शरीफ का चांद देखना यानी देखने की कोशिश करना और मत्ला पर ढूंढना वाजिब है, और रजब की उन्तीसवीं तारीख को शाबान की उन्तीस्वीं तारीख़ का हिसाब ठीक मालूम रहे। अगर शाबान की उनतीस्वीं तारीख़ को रमज़ान शरीफ़ का चांद देख लिया जाए तो सुबह को रोज़ा रखो और चांद नजर न आए और मत्ला साफ था तो सुबह को रोजा न रखो और अगर मत्ला पर बादल या गुबार था तो सुबह को दस ग्यारह बजे तक कुछ खाना पीना नहीं चाहिए। अगर उस वक़्त तक कहीं से चांद देखे जाने की खबर मोतबर तरीक़े से आ जाए तो रोजे की नीयत कर लो और नहीं, तो अब खाओ पियो लेकिन उन्तीस शाबान को चांद न होने की सूरत में सुबह के रोज़े की इसत रह नीयत करना कि चांद हो गया होगा तो रमजान का रोजाा नहीं तो नाफिल का हो जाएगा, मकरूह है।

अगर आस्मान साफ़ न हो जैसे बादल या धूल वगैरह हो तो रमजान शरीफ के चांद के लिए एक दीनदार, परहेजगार सच्चे आदमी की गवाही यकीन के काबिल है चाहे मर्द हो या औरत, आज़ाद हो या गुलाम, इसी तरह जिस आदमी का फ़ासिक होना ज़ाहिर नहीं और देखने में दीनदार परहेज़गार मालूम होता हो, उसकी गवाही भी यकीन के काबिल है।

यह महीना मुस्तहिक लोगों की मदद करने का महीना है। रमजान के तअल्लुक से हमें बेशुमार हदीसें मिलती हैं और हम पढ़ते और सुनते रहते हैं लेकिन क्या हम इस पर अमल भी करते हैं। ईमानदारी के साथ हम अपना जायजा लें कि क्या वाकई हम लोग मोहताजों और नादार लोगों की वैसी ही मदद करते हैं जैसी करनी चाहिए? सिर्फ सदकए फित्र देकर हम यह समझते हैं कि हमने अपना हक अदा कर दिया है।

जब अल्लाह की राह में देने की बात आती है तो हमारी जेबों से सिर्फ चंद रुपए निकलते हैं, लेकिन जब हम अपनी शॉपिंग के लिए बाजार जाते हैं वहाँ हजारों खर्च कर देते हैं। कोई जरूरतमंद अगर हमारे पास आता है तो उस वक्त हमको अपनी कई जरूरतें याद आ जाती हैं। यह लेना है, वह लेना है, घर में इस चीज की कमी है। अगर इस महीने में हम अपनी जरूरतों और ख्वाहिशों को कुछ कम कर लें और यही रकम जरूरतमंदों को दें तो यह हमारे लिए बेहत अज्र और सिले का बाइस होगा। क्योंकि इस महीने में की गई एक नेकी का अज्र कई गुना बढ़ाकर अल्लाह की तरफ से अता होता है।

मोहम्मद सल्ल ने फरमाया है जो शख्स नमाज के रोजे ईमान और एहतेसाब (अपने जायजे के साथ) रखे उसके सब पिछले गुनाह माफ कर दिए जाएँगे। रोजा हमें जब्ते नफ्स (खुद पर काबू रखने) की तरबियत देता है। हममें परहेजगारी पैदा करता है। लेकिन अब जैसे ही माहे रमजान आने वाला होता है, लोगों के जहन में तरह-तरह के चटपटे और मजेदार खाने का तसव्वुर आ जाता है।

रमज़ान शरीफ़ के रोज़ों का बहुत बड़ा सवाब है और बहुत सी फ़ज़ीलतें हदीस शरीफ़ में आई हैं जैसे-हुज़ूर रसूल करीम सलअम ने फ़रमाया है कि ‘‘जो आदमी सिर्फ़ ख़ुदा तआला की ख़ुशी के लिए रमज़ान शरीफ़ के रोज़े रखे तो उसके पिछले सब गुनाह मआफ़ हो जाएंगे।’’ दूसरी हदीस में हुजूर सलअम ने फरमाया कि रोजदार के मुंह की भभक अल्लाह तआला के नजदीक मुशक की खुशबू से भी ज्यादा अच्छी है। तीसरी हदीस में है कि अल्लाह तआला फ़रमाता है कि रोजा ख़ास मेरे लिए है और मैं खुद उसका बदला दूंगा।’’ इसी तरह और भी बहुत सी फ़जीलतें हदीसों में आई हैं।

हर मुसलमान अक़्ल रखने वाला बालिग मर्द, औरत पर फ़र्ज हैं। उनके फ़र्ज होने का न मानने वाला काफ़िर और बिना मजबूरी छोड़ने वाला बड़ा गुनहगार और फ़ासिक़ है।

अगरचे नाबालिग़ पर नमाज़, रोज़ा फ़र्ज़ नहीं लेकिन आदत डालने के लिए बालिग होने से पहले ही रोज़ा रखवाने और नमाज़ पढ़वाने का हुक्म है। हदीस शरीफ़ में आया है कि जब बच्चा सात साल का हो जाए तो नमाज़ का उसे हुक्म करो और जब दस साल का हो जाए तो उसे नमाज़ के लिए (अगर ज़रूरत हो तो) मारना भी चाहिए। इसी तरह जब रोज़ा रखने की ताकत हो जाए तो जितने रोज़े रख सकता हो उतने रोज़े रखवाने चाहिए।

रोजो से छूटः

1. सफर यानी मुसाफिर को सफर की हालत में रोज़ाा न रखना जाइज है। लेकिन अगर सफर में परेशानी न हो तो रोज़ा रखना ज्यादा अच्छा है।

2. मर्ज-यानी ऐसी बीमारी जिसमें रोजा रखने की ताकत न हो, या बीमारी के बढ़ जाने का डर हो

3. बहुत बूढ़ा होना

4. गर्भवती औरत को या गर्भ को रोजे से नुकसान पहुंचने का पक्का यकीन हो

5. दूध पिलाना- जबकि दूध पिलाने वाली को या बच्चे को रोजे से नुकसान पहुंचता हो,

6. रोजे से इतनी भूख या प्यास का ज़ोर हो कि जान निकल जाने का डर हो जाए और

7. हैज़ और निफास की हालतों में रोजा जाइज नहीं।

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