भवन का मुख्य द्वार भी लाता है जीवन में अपार खुशियां


जब हम किसी बंगले, आॅफिस काॅम्लेक्स या हाउसिंग सोसायटी में प्रवेश करते हैं तब मुख्यद्वार के आसपास का वातावरण हमारे मन पर एक विशेष प्रकार का प्रभाव अंकित कर देता है जो हमारे चित्त पर भवन के भीतरी संरचना एवं वातावरण के काल्पनिक चित्र की रचना करता है। वास्तुशास्त्र में किसी घर या आॅफिस के मुख्यद्वार तथा उसके आसपास के क्षेत्र का विशेष महत्व है। यहां आगंतुक को सुखद-विनम्र और स्वागत के भाव से मुक्त पर्यावरण प्राप्त होना चाहिए।

प्राचीन ऐतिहासिक भवनों में मुख्यद्वार के निर्माण पर विशेष ध्यान दिया जाता था, साथ ही भवन के अनुकूल ही उसका नामकरण किया जाता था, जैसे सिंहद्वार, होलीगेट, सूर्यतोरण या बुलंद दरवाजा आदि। प्राचीन किलों में तो मुख्यद्वार की मजबूती उसमें रहने वाली सेना की शक्ति की प्रतीक होती थी। आज भी ऐसी मान्यता कई सिद्ध मंदिरों में प्रचलित है कि मुख्यद्वार की पूजा-अर्चना के बिना प्रवेश करने वाले दर्शनार्थी की प्रार्थना देवताओं द्वारा स्वीकार नहीं होती।

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मुख्यद्वार कहां स्थित हो:
मुख्यद्वार बाहरी दीवारों के न तो एकदम केंद्र में और न ही बिल्कुल एक कोने में होना चाहिए। प्लाट के चारों और बनी दीवारें सीधी और आपस में समकोणीय होनी चाहिए। दक्षिण तथा पश्चिम दिशा की दीवार पूर्व और उत्तर की अपेक्षा अधिक मोटी होनी चाहिए। साथ ही, दक्षिण और पश्चिम की दीवार शेष दो दीवारों से कम-से-कम तीन इंच अधिक ऊंची होनी चाहिए। यदि यह अंतर इक्कीस इंच हो तो अति उत्तम है। दक्षिण की ओर की दीवार अपारदर्शी होनी चाहिए, इसमें झरोखे या खिड़की आदि बनाना वर्जित है। पूर्व और उत्तर की दीवारें केवल दो फुट ऊंची होनी चाहिए। इस पर मजबूत लोहे की ग्रिल या लोहे के कांटेदार तारों की बाढ़ लगा देनी चाहिए। मुख्यद्वार उत्तर या पूर्व की दीवार पर उत्तम माना गया है। मुख्यद्वार का उत्तर या पूर्व की दीवार पर होना शुभफलदायी माना जाता है। जबकि पश्चिम में मध्यम और दक्षिण में पूरी तरह से वर्जित है। लेकिन किसी घर की मुखिया यदि महिला हो तो माना गया है कि दक्षिण में मुख्यद्वार उसके लिए उत्तम फलदायी सिद्ध होता है।

दिशाओं का महत्व:
मुख्यद्वार में केवल एक पल्ला होना श्रेष्ठ है। वह खुलते समय अंदर की ओर दक्षिणावर्त (क्लार्क वाइज) खुलना चाहिए। यदि बहुत बड़ा मुख्यद्वार बनाना आवश्यक हो तो दोनों पल्ले बराबर होने चाहिए तथा कुल कब्जों की संख्या सम होनी चाहिए। छोटे वाहन के आवागमन के समय केवल दक्षिणावर्त द्वार ही खोलें और अति आवश्यक हो तभी वामावर्त (एंटी क्लाॅक वाइज) द्वार खोलें। रात्रि के समय मुख्यद्वार पूरी तरह प्रकाशित होना चाहिए। मुख्यद्वार के सामने किसी भी प्रकार की बाधा जैसे पेड़ या बिजली का खंभा जो स्वतंत्र आवागमन को बाधित करता हो अनिष्ट का सूचक है। इस प्रकार के मुख्यद्वार दुर्घटनाओं को आमंत्रित करते हैं।

प्रवेशद्वार का मार्ग:
मुख्यद्वार से भवन तक जाने वाला रास्ता सीधा होना चाहिए, घुमावदार या टेढ़ा-मेढ़ा नहीं। यदि इस रास्ते को मोड़ देना आवश्यक हो तो प्रवेशद्वार के बाद आने वाला पहला मोड़ यदि दाहिनी ओर है तो शुभ फलदायी माना जाता है। मुख्यद्वार और भवन का प्रवेशद्वार एक सीध में हो तो अति उत्तम है। यह भवन और प्लाट के अगले भाग में स्थित होना चाहिए। पिछले भाग में स्थित मुख्यद्वार ऋणात्मक ऊर्जा उत्पन्न करता है जो त्याज्य है।

कभी-कभी बहुत बड़े पल्ले वाले मुख्यद्वार में पैदल प्रवेश करने वाले लोगों के लिए एक छोटा द्वार बना दिया जाता है। यह छोटा द्वार दक्षिणावर्त द्वार के उत्तरी या पूर्वी भाग में स्थित होना चाहिए तथा यह द्वार भी दक्षिणावर्त ही खुलना चाहिए। इसमें कब्जे भी सम होने चाहिए। इस द्वार का प्रयोग घर का मुखिया अथवा आॅफिस का बाॅस कदापि न करें। उसके आवागमन के समय मुख्यद्वार का पूरी तरह नहीं खुलना अशुभ फलदायी हो सकता है।

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आसपास का क्षेत्र:
उत्तरी और पूर्वी दिशा में बने मुख्यद्वार के खंभे अनावश्यक रूप से भारी नहीं होने चाहिए और न ही भारी पत्थरों या धातु के मेहराब बनाए जाने चाहिए क्योंकि प्लाट का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र हलका रहना चाहिए।

सामान्यतः मुख्यद्वार बंद ही रहना चाहिए, विशेषकर रात्रि के समय। इस कार्य में शिष्टाचार और सर्तकता का पूरा समन्वय होना चाहिए। मुख्यद्वार पर बना सुरक्षा कक्ष प्रवेशद्वार के बायीं और चारदीवारी के अंदर बना होना चाहिए। यह कक्ष आयातकार हो परंतु गोल या त्रिभुजाकार कदापि नहीं। इसकी छत शंकुकार या पिरामिड की आकृति में न होकर सपाट होनी चाहिए। मुख्यद्वार प्लाट के पूर्वोत्तर क्षेत्र में है तो लकड़ी या सिंथेटिक के रेडीमेड हलके कक्ष का प्रयोग होना चाहिए।

वाहनों की पार्किंग:
वाहन पार्किंग का क्षेत्र मुख्यद्वार के पास बनाया जा सकता है परंतु इससे आवागमन में बाधा नहीं आनी चाहिए। पार्किंग में गाड़ी इस प्रकार से लगी होनी चाहिए कि पार्किंग से गाड़ी निकालते समय बैग गियर डालने की आवश्यकता न पड़े। यात्रा के प्रारंभ में बैक गियर का प्रयोग यात्रा की सफलता पर प्रश्न चिन्ह लगा देता है। मुख्यद्वार पर स्पीड ब्रेकर यात्रा की कठिनाइयों को दर्शाते हैं।

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