क्यों माना जाता है शनिदेव को सभी ग्रहों में सर्वश्रेष्ठ, जानिए शनिदेव की कथा


वैसे तो ज्योतिष में सूर्य को सभी ग्रहों का राजा माना जाता है। किसी व्यक्ति की कुंण्डली में अगर सिर्फ सूर्य ग्रह की अच्छी स्थिति है तो उसका जीवन राजाओं जैसा हो सकता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार नवग्रह परिवार में जहाँ सूर्य को राजा का स्थान प्राप्त है तो शनिदेव को भृत्य का। फिर भी शनि स्तोत्र के एक मंत्र में सूर्यपुत्र शनिदेव को महाबली और ग्रहों का राजा बताया गया है – ‘सौरिग्र्रहराजो’ महाबल:।’

शनिदेव ने की थी भगवान शिव की तपस्या

अब आप सोच रहे होंगे ऐसा कैसे ? ऐसा बिलकुल सम्भव है, जिस पर शिव जी की महिमा बरसने लगे उसके लिए सब कुछ सम्भव है। यदि  प्राचीन ग्रंथों को पढ़ा जाए तो पता चलता है कि शनिदेव ने भगवान शिव की कठिन भक्ति व तपस्या कर नवग्रहों में सर्वश्रेष्ठ स्थान की प्राप्त की थी ।

क्यों रखते हैं शनि सूर्य से शत्रुता

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार सूर्यदेव गर्भाधान हेतु अपनी पत्नी छाया के पास गए, चूँकि सूर्य देव के प्रचंड तेज को कोई सीमा नही है अत: जब वो छाया के पास पहुंचे तो छाया उनके तेज़ से घबरा गयी और उन्होंने उस समय आंखें बंद कर ली थीं।  वक़्त बीता और छाया ने शनिदेव को जन्म दिया । परन्तु जब शनि पैदा हुए तो उनका श्याम वर्ण (काले रंग) था, जिसे देख सूर्य ने शनि को अपना पुत्र मानने से न सिर्फ इनकार किया, बल्कि अपनी पत्नी छाया पर भी गलत आरोप लगाये। माना जाता है कि यही कारण है जिसके चलते शनि अपने पिता सूर्य से शत्रुता रखते हैं।

ऐसे मिला नवग्रह में सर्वश्रेष्ठ स्थान

शनिदेव ने वर्षों तक भगवान शिव की घोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने शनिदेव को दर्शन दिए और वरदान मांगने के लिए कहा। तब शनिदेव ने भगवान शिव से कहा कि युगों-युगों से मेरी मां को मेरे पिता सूर्य द्वारा बहुत अपमानित व प्रताड़ित होना पड़ा है अत: मेरी माँ की इच्छा है कि वो अपने पिता से भी ज्यादा शक्तिशाली व पूज्य बने। उनकी इच्छा सुन भगवान शिवजी ने उन्हें वरदान दिया कि नवग्रहों में सर्वश्रेष्ठ स्थान उनका होगा, साथ ही साथ पृथ्वीलोक के न्यायाधीश व दंडाधिकारी भी आप ही होंगे । इतनी ही नहीं सिर्फ मानव ही नहीं देवता, असुर, सिद्ध, विद्याधर और नाग भी तुम्हारे नाम से थर थर कापेंगे पौराणिक ग्रंथों के अनुसार शनिदेव कश्यप गोत्रीय हैं व उनका जन्म सौराष्ट्र में हुआ था ।

 

 

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