धर्म कर्म

सावन माह शिव व शिवलिंग का महत्व

आखिर क्यों सावन माह में शिव, सोमवार और शिवलिंग का महत्व बढ़ जाता है ? दरअसल भगवान शिव को सावन मास, सोमवार तथा शिवलिंग ये तीनों अतिप्रिय है। जुलाई या अगस्त के महीने से सावन मास आरम्भ होता है, जिसके चलते इन महीना में अनेक महत्वपूर्ण त्योहार जैसे — ‘हरियाली तीज’, ‘रक्षा बन्धन’, ‘नाग पंचमी’  इत्यादि मनाए जाते हैं ।

सावन के महीने में भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व है तथा इस माह के प्रथम सोमवार से ही सोमवारी व्रत प्रारम्भ हो जाते है, जिसके चलते स्त्री, पुरुष तथा विशेषतौर से कुंवारी युवतियां भगवान शिव जी को प्रसन्न करने के लिए सावन मास में आने वाले सभी सोमवार के दिन व्रत रखते है।

इस पूरे मास श्रद्धालु शिवजी के नियमित व्रत व प्रतिदिन उनकी विशेष पूजा आराधना करते हैं। इस माह में शिवजी की पूजा में गंगाजल के उपयोग का विशेष स्थान है। साथ ही आराधना करते समय शिव ही नहीं बल्कि उनके पूरे परिवार यानी कि शिवलिंग, माता पार्वती, कार्तिकेयजी, गणेशजी और उनके वाहन नन्दी की भी पूजा करनी चाहिए।

क्यों करते है शिवलिंग की पूजा ?

अज्ञानतावश लोग लिंग का अर्थ शिश्न या योनि के रूप में करते है, जबकि संस्कृत में तीन लिंग पुरुषलिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग होते है, अर्थात लिंग शब्द का अर्थ प्रतीक के रूप में किया जाता है। लिंग पुरुष,स्त्री या नपुंसकता का प्रतीक है, ठीक इसी प्रकार से शिवलिंग में लिंग शब्द शिवत्व का प्रतीक है।

इस बारे में न्याय दर्शन में भी कहा गया है कि

इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिंगमिति -न्याय० अ ० १ । आ ० १ । सू ० १ ०

 

अर्थात जिसमे (इच्छा) राग, (द्वेष) वैर, (प्रयत्न) पुरुषार्थ, सुख, दुःख आदि जानने का  गुण विदयमान हो, वह जीवात्मा है और ये सभी राग-द्वेष आदि जीवात्मा के लिंग अर्थात कर्म व गुण ही तो है ।

स्कन्दपुराण के अनुसार आकाश स्वयं लिंग ही है, जिसका  पृष्ठ या आधार पृथ्वी है । ब्रह्माण्ड का हर पदार्थ अनन्त शून्य से उत्पन्न हो अंततः उसी में लय हो जाता है, इसी कारण इसे लिंग कहा जाता है और यहीं वजह है कि सदियों से शिवलिंग की पूजा अनवरत अविरल रूप से मनुष्य करता आ रहा है । यदि एक पंक्ति में कहा जाए तो शिव ही शिवलिंग है और शिवलिंग ही शिव हैं।

सोमवार और शिव जी का सम्बन्ध

चन्द्रमा ग्रह सोमवार के दिन का प्रतिनिधित्व करता है तथा चन्द्रमा को मन का कारक भी माना जाता है अर्थात चंद्रमा मनसो जात: । मन के नियंत्रण और नियमण में चंद्रमा का महत्वपूर्ण योगदान माना गया है तथा चन्द्रमा भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान है। भगवान शिव स्वयं साधक व भक्त के चंद्रमा अर्थात मन को नियंत्रित करने का कार्य करते हैं, अत: भक्त के मन को वश में कर एकाग्रचित कर भगवान शिव ही उसे अज्ञानता के भाव सागर से बाहर निकालते है।

सोमवार की महत्ता

महादेव की कृपा से उनके भक्त त्रिविध ताप यानी कि आध्यात्मिक(जो आत्मिक देह में अविद्या,राग, द्वेष, मुर्खता), आधिभौतिक (शत्रु या व्याघ्र से दुःख) तथा आधिदैविक (अतिवृष्टि, अतिशीत, अति उष्णता आदि से मन और इन्द्रियों को दुःख पहुंचना ) से शीघ्र ही मुक्ति पा जाते है। इसी वजह से सोमवार का दिन शिवजी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है।

क्यों है शिव जी को सावन मास प्रिय ?

चूँकि सावन मास में सबसे अधिक वर्षा होती है जो कि शिव जी के गर्म शरीर को ठंडक प्रदान करती है। महादेव ने इस मास की महिमा बताते हुए कहा है कि मेरे तीनों नेत्रों में सूर्य दाहिने, बांये चन्द्र और अग्नि मध्य नेत्र है। जब सूर्य कर्क राशि में गोचर करता है, तब सावन माह की शुरुआत होती है। चूँकि सूर्य  गर्म है तथा उष्मा उत्पन करता है जबकि चंद्रमा इसके विपरीत ठंडा है तथा शीतलता प्रदान करता है। इसलिए सूर्य के कर्क राशि में आने से खूब बरसात होती है, जिसके चलते लोक कल्याण के लिए विष को पीने वाले भोले को ठंडक व सुकून मिलता है। प्रजनन की दृष्टि से भी यह मास बहुत ही अनुकूल होता है, यहीं वजह है कि शिव जी को सावन अतिप्रिय हैं।

शिव पूजन के लिए सामग्री

शिव जी की पूजा में मुख्य रूप से गंगाजल, जल, दूध, दही,  घी, शहद,चीनी, पंचामृत, कलावा, जनेऊ, वस्त्र, चन्दन, रोली, चावल, बिल्वपत्र, दूर्वा, फूल,फल, विजिया, आक, धूतूरा, कमल−गट्टा, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, पंचमेवा, धूप, दीप तथा नैवेद्य का इस्तेमाल किया जाता है।

सोमवारी व्रत नियम तथा महत्व

  • शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव स्वयं ही जल हैं तथा इस व्रत में फलाहार या पारण का कोई विशेष नियम नहीं है। फिर भी दिन−रात में केवल एक ही बार खाना फलदायक माना जाता है।
  • सोमवार के व्रत में शिव−पार्वती के अतिरिक्त गणेश तथा नंदी की पूजा जरुर करनी चाहिए।
  • शिव मंदिर में इस दिन सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ जमा हो जाती है तथा बम-बम भोले, हर हर महादेव के जयकारों से मंदिर गुंजायमान हो जाता हैं।
  • सावन मास में शिव जी को बेल पत्र ( बिल्वपत्र ) चढ़ाने से जाने-अनजाने में किये गए पापों का नाश हो जाता है।
  • ऐसी मान्यता है कि अखण्ड बेलपत्र चढाने से सभी  बुरे कर्मों से मुक्ति व सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते है |
  • यदि सावन माह में शिवालय यानी कि शिव मंदिर का अभाव है तो पार्थिव शिवलिंग अर्थात मिट्टी से बने शिवलिंग को स्थापित कर उसकी विधिवत पूजा करने का विशेष महत्व है।
  • अत: प्रतिदिन या प्रत्येक सोमवार के दिन शिव पूजा या पार्थिव शिवलिंग की पूजा जरुर करनी चाहिए। इतना ही नहीं यथासम्भव रुद्राभिषेक पूजन का भी इस माह में विशेष महत्व है, जिसे करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है तथा व्रत के दौरान सावन माहात्म्य या शिव महापुराण की कथा सुनने का भी विशेष महत्व है।
  • इतना ही नहीं, मान्यता यह भी है कि पवित्र गंगा नदी से सीधे जल लेकर जलाभिषेक करने से भी शिव जी शीघ्र प्रसन्न हो भक्तों की मनोकामना पूर्ण करते हैं। यहीं कारण है कि श्रद्धालु कावड़िए के रूप में गंगा नदी से या किसी अन्य पवित्र नदी से जल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाते हैं।
  • मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी ने भी भगवान शिव जी को कांवड चढ़ाई थी।
  • इतना ही नहीं, सावन मास में ही भगवान शिव जी इस पृथ्वी पर अवतरित हो अपनी ससुराल गए थे,जहाँ उनका स्वागत र्घ्य और जलाभिषेक से किया गया था।
  • मान्यतानुसार शिवजी प्रत्येक वर्ष सावन माह में अपनी ससुराल आते हैं। समुद्र मंथन भी इसी माह में किया गया था, जिसको करते समय विष निकला था तथा उस विष को पीकर अपने कंठ में धारण कर सृष्टि की रक्षा की, इस विष के कारण ही शिव जी का कंठ नीला हो गया था, जिसके चलते शिव जी को ‘नीलकंठ” के नाम से जाना जाता हैं।
  • शिवजी के विषपान के प्रभाव को कम करने के लिए देवी-देवताओं ने जल अर्पित किया, तभी से शिवलिंग पर जल चढ़ाने का खास महत्व माना गया है तथा श्रावण मास में भोलेनाथ को जल चढ़ाने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

शिव पूजन से लाभ

  • सोमवार के व्रत सावन महीना के प्रथम सोमवार से शुरू होते है, जिसके चलते प्रत्येक सोमवार को शिवजी, पार्वती जी तथा गणेश जी की पूजा आवश्यक रूप से करनी चाहिए ।
  • मान्यता है कि सावन में शिवजी की आराधना व सच्चे भाव से सोमवार व्रत रखने से करने से शिव जी शीघ्र अतिशीघ्र प्रसंन्न हो जाते है तथा भक्तों को  मनोकामनाएं पूरी करते है ।
  • शिवजी की पूजा करने तथा व्रत रखने से पुत्र की इच्छा करने वाले को पुत्र, विद्यार्थी को विद्या, धनार्थी को धन, मोक्ष चाहने वालो को मोक्ष तथा कुंवारी कन्या को मनवांछित पति की प्राप्ति होती है।
  • मान्यतानुसार यदि इस पूरे महीने कुंवारी कन्या व्रत रखती हैं तो उन्हें मनपसंद जीवनसाथी मिलता है। इस विषय में एक कथा प्रचलित है जो शिव-पार्वती से जुड़ी हुयी है। जब सती के पिता दक्ष ने उनके पति भगवान शिव जी का अपमान किया तो सती ने आत्मदाह कर लिया ।
  • सती ने पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया तथा शिव को अपना बनाने के लिए सावन मास के सभी सोमवार का व्रत रखा, जिसके फलस्वरूप  उन्हें पति रूप में भगवान शिव की प्राप्ति हुई थी ।
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Title: shivling importance in hindi sawan month 2018 | In Category: धर्म कर्म  ( dharm karam )

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