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सोलह सोमवार व्रत कथा | Somvar Vrat Katha In Hindi

पुराणों में देवाधिदेव महादेव शिव शंकर को हजारों नाम से परिभाषित किया गया है। कहीं ये सिर्फ बेलपत्र, भांग और धतूरे से खुश हो जाने वाले भोले बाबा हैं तो कहीं, समुद्र से निकले अथाह विष को पीने वाले नीलकंठ, सृष्टि के प्रलय के समय ये प्रलयंकर का रूप लेते हैं और जब प्रसन्न होकर नाचते हैं तो संसार इन्हें नटराज के नाम से जानता है। चूँकि इनके ध्यान मात्र से भक्तों के सारे कष्ट और विपत्तियों का निवारण हो जाता है, अत: सोमवार को महादेव का दिन माना गया है तथा इस दिन भगवान शिव के नाम का उपवास रख शिव की पूजा की जाती है, जिसका विशेष लाभ भक्तों को प्राप्त होता है । पौराणिक ग्रंथों में सोमवार के व्रत के महात्मय के बारे में बताते हुए लिखा गया है कि लगातार सोलह सोमवार का व्रत रखने से भक्तों के जीवन के सारे कष्ट ही दूर नहीं होते बल्कि उन्हें मनवांछित फल प्राप्त होते है।

सोलह सोमवार व्रत कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार भगवान भोलेनाथ माता पार्वती के साथ धरती लोक के  भ्रमण के लिए निकले । भ्रमण करते हुए भोलेनाथ और माँ पार्वती अमरावती नगर के ऊपर से गुजर रहे थे तो उन्हें वहां एक विशाल और सुंदर मंदिर दिखाई पड़ा । माता पार्वती के मन में उस मंदिर के बार में जानने की जिज्ञासा ने जन्म ले लिया अत: उन्होंने महादेव से मंदिर के बारे में पूछा | तब महादेव ने बताया कि यह नगर अमरावती है तथा यहां का राजा हमारा प्रिय भक्त है, जिसने इस विशाल शिवमंदिर का निर्माण करवाया है। माता पार्वती के कहने पर शिव – पार्वती ने कुछ समय के लिए इस मंदिर को अपना निवास स्थान बना लिया ।

एक दिन मां पार्वती ने चौसर खेलने की इच्छा व्यक्त की ।  मां पार्वती की इच्छा पूर्ति हेतु  भगवान शिव माता पार्वती के साथ चौसर खेलने बैठ गए। जैसे ही खेल शुरू ही हुआ, वहां मंदिर का पुजारी आ गया। वहां पुजारी को देख माता पार्वती ने इस खेल में किसकी जीत होंगी का प्रश्न मंदिर के पुजारी के सामने रख दिया ।

मां पार्वती ने दिया पुजारी को कोढ़ी होने का श्राप

ब्राह्मण ने उत्तर में महादेव का नाम लिया, इस बात से माँ पार्वती ब्राह्मण से रुष्ट हो गईं तथा पुन: चौसर खेलने में व्यस्त हो गयीं । इस खेल में महोदव हार गए । माता पार्वती ने ब्राह्मण को झूठ बोलने के अपराध में दंड देते हुए उसे कोढ़ी हो जाने का श्राप दिया तथा उस मंदिर से हमेशा के लिए कैलाश लौट गए, परन्तु माँ पार्वती के श्राप के चलते मंदिर का पुजारी कोढ़ी हो गया तथा दर दर की ठोकरें खाने लगा।

पुजारी के कोढ़ी हो जाने पर सभी उससे दूर रहने लगे । जब राजा को पुजारी के कोढ़ी हो जाने की खबर मिली तो उन्हें भी यहीं लगा कि जरुर पुजारी ने कोई घोर पाप किया होगा तभी उसे इस प्रकार की सजा भुगतनी पड़ रही है व राजा ने कोढ़ी ब्राह्मण को मंदिर से बाहर करवा अन्य किसी पुजारी को वहां नियुक्त कर दिया । कोढ़ी ब्राह्मण मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ ही भिक्षा मांगने लगा।

अप्सराओं ने बताई सोलह सोमवार व्रत की विधि

वक़्त बीतता गया। एक दिन स्वर्गलोक की कुछ अप्साराएं उसी मंदिर में पूजा करने हेतु आई तथा वापस जाते समय उनकी निगाहें मंदिर के बाहर बैठे कोढ़ी ब्राह्मण पर पड़ी। उन्हें ब्राहमण पर दया आयी । जब अप्साराओं ने ब्राहमण से उसके इस हाल का कारण जानना चाहा तो ब्राह्मण ने सारा वृतांत सुना दिया। तब अप्सराओं ने पुजारी को बताया कि एक ऐसा व्रत है, जिसे रखने से तुम्हारे सारे रोग व कष्ट सदैव के लिए मिट जायेंगे तथा उन्होंने ब्राहमण को सोलह सोमवार तक विधिवत व्रत रखने की सलाह दी।

पुजारी ने जब व्रत की पूजन विधि जाननी चाही तो अप्सराओं ने बताया कि सूर्योदय से पूर्व  उठकर स्नानादि करके नए या साफ वस्त्र धारण कर गेहूं का आधा किलो आटा लेकर उसके तीन भाग बना लो तथा देशी घी का दीपक जलाकर, गुड़, नैवेद्य्, बेलपत्र, चंदन, अक्षत, फूल, जनेऊ का जोड़ा लेकर प्रदोष काल में महादेव की पूजा अर्चना करना शुरू कर देना ।

पूजा करने के बाद आटे के तीन भागों में से एक भाग महादेव को अर्पित कर दूसरे भाग को स्वयं ग्रहण करना तथा शेष बचे भाग को भगवान के प्रसाद के रूप में लोगों में बांट देना, यही क्रिया तुम्हे सोलह सोमवार तक करनी है तथा सत्रहवें सोमवार को आटे की बाटी बनाकर उसमें देसी घी और गुड़ मिलाकर चूरमा बनाना व भगवान शिव को भोग लगाकर सभी को प्रसाद के रूप में बांट देना। यदि सोलह सोमवार तक तुम सच्चे मन से व्रत रखते हो तो महादेव तुम्हारे सारे कष्टों को हर लेंगे और तुम पुन: पहले जैसे हो जाओगे । इसके बाद अप्सराएं स्वर्गलोक को चली गईं।

सोलह सोमवार के व्रत करने से मिली कोढ़ से मुक्ति

अप्सराओं के बताये विधि-विधान से कोढ़ी ब्राह्मण ने सोलह सोमवार तक भगवान शिव का   व्रत रखा तथा फलस्वरूप न सिर्फ उसे कोढ़ से मुक्ति मिली बल्कि उसे मंदिर में दोबारा पुजारी का पद भी मिल गया तथा वो वहां सुखपूर्वक जीवन जीने लगा ।

कुछ समय बाद एक बार फिर माता पार्वती और महादेव वहां से गुज़रे तो माँ पार्वती को उस पुजारी का ध्यान आया। पर जब माता ने पुजारी को देखा तो वह आश्चर्य में पड़ गईं तथा उन्होंने पुजारी से यह जानना चाहा कि मेरे श्राप के बावजूद तुम एकदम स्वस्थ और निरोगी कैसे हो गए ? तब पुजारी ने माँ पार्वती को सोलह सोमवार के व्रत की कथा का महात्मय बताते हुए अपने साथ हुयी सम्पूर्ण बात को बता दिया ।

माता पार्वती ने भी जाना सोमवार व्रत का महात्मय

जब माता पार्वती को सोलह सोमवार के व्रत का महात्मय पता चला तो वो प्रसन्न हुईं तथा उन्होंने पुजारी से व्रत की विधि को जान खुद भी इस व्रत को रखने का प्रण लिया। जिस वक़्त यह घटना हुयी उस वक़्त, शिव-पुत्र कार्तिकेय अपने माता पिता से नाराज होकर घर से दूर चले गए थे, जिसके चलते माता पार्वती को कार्तिकेय की चिंता सता रही थी । सोलह सोमवार का व्रत रखते हुए मां पार्वती ने महादेव से कार्तिकेय के लौटने की मनोकामना की तथा जैसे ही व्रत समाप्त हुआ उसके तीसरे दिन कार्तिकेय वापस आ गए । कार्तिकेय ने भी अपनी माता पार्वती से जानना चाहा कि ऐसा कौन सा उपाय है जो उनके करने से मेरा हृदय परिवर्तित हो गया, तो मां पार्वती ने कार्तिकेय को सोलह सोमवार के व्रत की महानता के बारे में बताया।

कार्तिकेय ने भी किया सोलह सोमवार का विधिवत व्रत

शिव-पुत्र कार्तिकेय का ब्रह्मदत्त नामक एक प्यारा दोस्त था, जिसे किसी कारण से परदेस जाना पड़ा। अपने दोस्त के चले जाने से कार्तिकेय काफी दुखी थे अत: ब्रह्मदत्त की वापसी की मनोकामना के साथ कार्तिकेय ने विधिपूवर्क सोलह सोमवार के व्रत रखे । जिसके फलस्वरूप ब्रह्मदत्त का मन परिवर्तित हो गया और वह वापस लौट आया। इसी तरह जब ब्रह्मदत्त ने इस बारे में जानना चाहा तो कार्तिकेय ने ब्रह्मदत्त को सोलह सोमवार की कथा तथा व्रत के बारे में बताया | ब्रह्मदत्त ने भी यह व्रत करने का निर्णय लिया।

ब्रह्मदत्त ने किया सोमवार का व्रत

ब्रह्मदत्त ने भी सोलह सोमवार का व्रत विधिविधान पूर्वक सम्पन्न किया तथा इसके पश्चात वो विदेश यात्रा पर निकल गया | विदेश यात्रा के दौरान वो एक नगर में पहुंचा, जहाँ राजा हषवर्धन ने एक मुनादी के तहत प्रतिज्ञा की हुयी थी कि जिस भी व्यक्ति के गले में हथिनी माला डालेगी वह उससे अपनी बेटी राजकुमारी गुंजन का विवाह करेंगे।

मुनादी सुन ब्रह्मदत्त भी उत्सुकतावश राजा के महल में पहुंच गया, जहाँ स्वयंवर हो रहा था। वहां कई देशों के राजा और राजकुमार पहले से ही बैठे हुए थे और एक मादा हाथी सूंड में जयमाला लिए घूम रही थी। हथिनी ने जब ब्रह्मदत्त को देखा तो उसने वहां मौजूद सभी राजकुमार व राजाओं को छोड़ जयमाला ब्रह्मदत्त के गले में डाल दी, जिसके फलस्वरूप राजा हर्षवर्धन ने अपनी बेटी गूंजन का विवाह ब्रहमदत्त के साथ संपन्न करवा दिया।

एक दिन गूंजन ने जानना चाहा कि हथिनी ने वहां मौजूद सभी राजकुमार को छोड़कर ब्रह्मदत्त को क्यों माला पहनायी, आखिर इसका कारण क्या है ? तो ब्रह्मदत्त ने सोलह सोमवार व्रत की महिमा का वर्णन गूंजन के सामने कर दिया । सोलह सोमवार व्रत की महिमा सुन गुंजन ने भी व्रत करने का निश्चय किया तथा विधिपूर्वक सोलह सोमवार के व्रत संपन्न किये, जिसके फलस्वरूप उसे एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम इस दम्पति ने गोपाल रख दिया ।

गुंजन ने अपने पुत्र को बताई सोमवार व्रत की महिमा

जब गोपाल बड़ा हो गया तो गुंजन ने उसे सोलह सोमवार के व्रत की महिमा बतलाते हुए  इसकी विधि का विस्तारपूवर्क वर्णन किया, जिसके बाद गोपाल ने भी सोमवार का व्रत करने का संकल्प लिया। सोलह वर्ष की आयु में गोपाल के मन में राज्य पाने की इच्छा बलवति होने लगी अत: राज्य पाने की इच्छा के साथ उसने विधिपूवर्क सोलह सोमवार के व्रत किए। व्रत संपन्न होने के बाद गोपाल पास के एक नगर में घूमने गया तथा वहां के राजा को गोपाल बहुत पंसद आ गया, जिसके चलते उसने अपनी पुत्री राजकुमारी मंगला का विवाह गोपाल के साथ करवा दिया ।

अब गोपाल खुशीपूर्वक उसी राजा के महल में रहने लगा । कुछ समय पश्चात राजा का स्वर्गवास हो गया तथा गोपाल नगर के नए राजा बने | राजा बनने के पश्चात भी गोपाल पूर्ण श्रद्धा भक्ति के साथ विधिवत सोलह सोमवार का व्रत करता रहा। एक बार की बात है | व्रत के समापन पर सत्रहवे सोमवार को गोपाल ने अपनी पत्नी मंगला से कहा कि वह व्रत की सारी सामग्री ले समीप वाले शिव मंदिर में आ जाये, परन्तु मंगला ने अहंकारवश पति की आज्ञा का उल्लंघन करते हुए पूजा की सामग्री को सेवकों के द्वारा मंदिर में भिजवा दिया ।

गोपाल ने मंदिर में भगवान शिव की पूजा करनी शुरू की तभी आकाशवाणी हुई कि तुम्हारी पत्नी ने सोलह सोमवार के व्रत का अनादर किया है अत: तुम तत्काल ही अपनी पत्नी को महल से निकाल दो वरना तुम्हारा सारा वैभव और राजपाट नष्ट हो गया जाएगा। इस प्रकार की आकाशवाणी सुन उसका मन बहुत भयभीत हुआ तथा अपनी पत्नी के द्वारा किये गये  कर्म पर उसे बहुत पछतावा हुआ । पर गोपाल ने सैनिकों को आज्ञा दी कि तत्काल मंगला को महल से निकाल दें।

शिव कोप की भागी बनी रानी मंगला

रानी मंगला महलों के सुखों से वंचित हो दर-दर की ठोकरें खा रही थी । भूख और प्यास से बेहाल मंगला एक नगर से दूसरे नगर में भटक रही थी कि तभी उसे अचानक एक बुढि़या नजर आई, जो कि सूत कातकर बाजार में बचेने का काम करती थी | परन्तु आज सूत की गठरी का अत्यधिक वजन होने के कारण वह गठरी नहीं उठा पा रही थी, जब बुढ़िया ने मंगला को देखा तो उसने कहा कि यदि तुम मेरा सूत का गट्ठर उठाकर बाजार तक ले जा कर सूत बेचने में मेरी मदद करोगी तो मैं तुम्हें इसके बदले में धन दूंगी।

मंगला ने बुढ़िया की बात मान ली, परन्तु जैसे ही उसने सूत की गठरी को उठाने का प्रयास किया तो उसी समय जोर से आंधी-तूफान चलने लगा तथा सूत की गठरी खुल गई व सारा सूत आंधी में उड़ गया। रानी निराश हो दूसरे नगर की ओर चल पड़ी | रास्ते में उसे एक तेली मिला जिसने तरस खाकर रानी को अपने घर में रहने की जगह दी। रानी के साथ साथ तेली को भी भगवान भोलेनाथ के कोप को भोगना पड़ा । तेली के घर में रखे तेल से भरे मटके अपने आप फूटने लगे। तेली को समझते देर नहीं लगी कि यह स्त्री उसके घर के लिए शुभ नहीं है अत: उसने भी रानी मंगला को अपने घर से निकाल दिया |

रानी अपनी किस्मत को कोसने लगी | बदहाल रानी का प्यास से बुरा हाल हो रहा था । रास्ते में चलते चलते उसे थोड़ी ही दूरी पर एक नदी दिखाई दी। खाना तो भाग्य में नहीं है क्यों न पानी पीकर ही पेट की क्षुधा को शांत किया जाए, ऐसा सोचते हुए रानी ने नदी से पानी पीने की कोशिश की | मंगला के स्पर्श मात्र से नदी सूख गयी । नदी का जल एकदम से सूख जाने से रानी विस्मय से भर गई, उसकी समझ नहीं आ रहा था कि उसके साथ ऐसा किस दैवीय प्रकोप के कारण हो रहा है, जिसके कारण उसके साथ ऐसी घटनाएं घट रही हैं।

दुखी मन के साथ रानी मंगला अन्य स्थान की ओर प्रस्थान करने लगी तथा चलते चलते वो  एक घने जंगल में पहुंच गईं, जहाँ एक सुंदर तालाब था । भूख - प्यास से बेहाल रानी ने तालाब में जल पीना चाहा तो तालाब के जल में अचानक ही बहुत से कीड़े उत्पन्न हो गए। परन्तु रानी भूख और प्यास से इस कदर बेहाल हो चुकी थी कि उन्होंने कीड़ों से भरे पानी को पीकर प्यास को शांत किया।

हालाँकि कीड़ों भरे जल के सेवन से रानी मंगला का मन अतिव्याकुल हो गया था अत: उन्होंने एक पेड़ के नीचे विश्राम करने का मन बनाया। रानी मंगला एक पेड़ के नीचे बैठ गयी | उनके पेड़ के नीचे बैठते ही पेड़ के सारे पत्ते सूखकर बिखरने लगे । रानी मंगला ने पास ही स्थित दूसरे पेड़ की विश्राम के लिए चुना तो वहां भी यहीं हुआ। वहीँ से कुछ दूरी पर रानी मंगला को कुछ ग्वाले अपनी गायें चराते हुए दिखायी दिए ।

ग्वालों ने यह सारा मामला देखा तो वे हैरानी से रानी के पास गए और उन्होंने इस सारे मामले की जानकारी ली। ग्वालों को भी कुछ समझ नहीं आया अत: वो समीप के एक मंदिर में रानी को ले गए, जहाँ का पुजारी विद्यान तथा शिवभक्त था । पुजारी ने रानी को देखा तो वो समझ गया कि यह किसी बड़े घर की स्त्री है तथा किसी दुर्योग के चलते उसका यह हाल हुआ है ।

मंदिर के पुजारी ने रानी मंगला को मंदिर में स्थान देने के ईश्वर की इच्छा के चलते जल्द ही सब सामान्य होने का आश्वासन दिया । रानी मंदिर में रहने लगी परन्तु दुर्भाग्य ने यहाँ भी रानी का साथ नहीं छोड़ा | जब भी रानी खाना बनाने की कोशिश करती तो उनका भोजन ठीक से नहीं बन पाता जैसे कभी रोटी या सब्जी जल जाती या फिर कभी आटे में ही कीड़े पड़ जाते। पुजारी ने जब इस तरह की विस्मयकारी घटनाओं को होते देखा तो वो समझ गया कि रानी से जाने-अनजाने कोई अपराध हुआ है, जिसका प्रकोप वो झेल रही है | अत: पुजारी ने रानी से इस बारे में जानने का प्रयास किया ।

रानी मंगला ने पुजारी को सब बताना शुरू किया, साथ ही साथ पति के आदेश के बावजूद शिव मंदिर ना जाकर सेवकों को भेज देने वाली बात भी रानी ने पुजारी को बता दी । पुजारी को अब सारा मामला समझ आ चूका था कि रानी मंगला की इस दुर्गति का क्या कारण है | अत: पुजारी ने रानी मंगला से कहा कि तुम कोई चिंता मत करो, कल सोमवार है और तुम कल से भगवान शिव का नाम लेकर सोलह सोमवार का व्रत करना शुरू कर दो और भगवान शिव का एक नाम भोलेनाथ भी है अत: शीघ्र ही वो तुम्हारे द्वारा किए गए अपराध को क्षमा कर तुम्हारे दोषों को भूल जाएंगे।

रानी मंगला ने किया विधिवत सोलह सोमवार का व्रत

पुजारी की बातों को मानते हुए रानी मंगला ने अगले ही दिन यानी कि सोमवार से विधिवत सोलह सोमवार का व्रत करना शुरू कर दिया। इस दौरान रानी मंगला सोमवार को विधिवत व्रत करके पूजा अर्चना करती तथा व्रतकथा सुनती थी| रानी मंगला ने सत्रहवे सोमवार को शिव की पूजा अर्चना करके विधि पूवर्क व्रत का समापन किया।

सोमवार व्रत का समापन करते ही राजा गोपाल को अपनी पत्नी मंगला की याद सताने लगी अत: राजा ने तुरंत अपने सैनिकों को आदेश दिया की चारों ओर रानी मंगला की तलाश शुरू कर दी जाए तथा सम्मानपूर्वक उन्हें वापस महल में लाया जाए। आखिर राज्य के सैनिकों ने  रानी को खोज लिया और उनसे वापस महल में चलने की प्रार्थना की। परन्तु मंदिर के पुजारी ने सैनिकों को वापस लौट जाने के लिए कहा तथा निर्देश दिए कि रानी मंगला मंदिर से नहीं जाएंगी। सैनिक निराश मन से वहां से लौट गए और उन्होंने जाकर राजा गोपाल को सारी कहानी बता दी ।

जब राजा गोपाल को इस बात कि जानकारी हुयी तो उन्होंने खुद मंदिर जाने का निश्चय किया। मंदिर पहुंचकर राजा ने मंदिर के पुजारी से रानी के इस हाल के लिए क्षमा मांगी तथा रानी को वापस भेजने का निवेदन किया | पुजारी ने बताया कि रानी के साथ जो भी घटित हुआ वह सब महादेव के कोप के कारण हुआ, इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है अत: रानी के साथ जाकर सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करो।

सोलह सोमवार व्रत से मंगला के जीवन में वापस आए सुख

रानी मंगला और राजा गोपाल के महल पहुंचने पर महल में खुशियां की लहर दौड़ पड़ी | पूरे नगर को सजाया गया। राजा गोपाल ने ख़ुशी से ब्राह्मणों को वस्त्र, अन्न और धन धान्य आदि का दान दिया। रानी और राजा दोनों सोलह सोमवार का व्रत करते हुए महल में आनंदपूर्वक रहने लगे । उनके जीवन में भगवान शिव की अनुकम्पा से सुखों की बरसात होने लगी ।

सोलह सोमवार का व्रत रखने तथा भगवान महादेव की पूजा अर्चना करने से मात्र से मानव की सभी मनोकामनाओं की पूर्ति हो जाती हैं व जीवन में किसी प्रकार का कोई दुख या कष्ट  नहीं रहता । स्त्री हो या पुरुष, जो भी एकाग्र मन से सोलह सोमवार की व्रत कथा पढ़ते हैं या सुनते हैं, उन्हें अपने पापों से मुक्ति मिलती है तथा मरणोपरांत मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।

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Title: solah somwar vrat katha in hindi in Hindi  | In Category: धर्म कर्म dharm karam

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