जीवन में आने वाली सभी परेशानियों का एक मात्र उपाय है दस महाविद्या


लंबे समय से चल रही ‍बीमारी, भूत-प्रेत, बुरी घटनाएं, गृहकलह, शनि का बुरा प्रभाव, बेरोजगारी, तनाव आदि प्रकार के मुसीबतों को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर परम सुख और शांति प्राप्ति के लिए दस महाविद्या में से किसी एक की नित्य पूजा अर्चना करनी चाहिए |

पुराणों के अनुसार जब माता सती ने दक्ष के यज्ञ में जाने की इच्छा ज़ाहिर की तो शिवजी ने वहां जाने से मना कर दिया | शिव जी के मुह से इनकार सुन कर माता ने क्रोधित होकर पहले काली शक्ति प्रकट की तथा उसके बाद दसों दिशाओं से दस शक्तियां प्रकट हुयी । क्रोध में सती ने शिव को अपना फैसला सुना दिया कि वो दक्ष यज्ञ में जरुर जाएगी | शिव जी ने माता सती की बात मान ली और दस दिशाओं से प्रकट हुयी देवियों के विषय में पूछा तो सती ने बताया कि ये मेरे ही दस रूप हैं तथा जो आपके सामने कृष्ण रंग की काली हैं, ऊपर नीले रंग की तारा, पश्चिम में छिन्नमस्ता, बाएं भुवनेश्वरी, पीठ के पीछे बगलामुखी, पूर्व-दक्षिण में धूमावती, दक्षिण-पश्चिम में त्रिपुर सुंदरी, पश्चिम-उत्तर में मातंगी तथा उत्तर-पूर्व में षोड़शी हैं और मैं खुद भैरवी रूप में अभयदान देने के लिए आपके सामने उपस्थित हूँ | यही दस महाविद्या अर्थात् दस शक्ति है।

  1. माँ के दस रूपों में से काली माँ का शक्तिपीठ कोलकाता के कालीघाट पर स्थित है तथा मध्यप्रदेश के उज्जैन में भैरवगढ़ में गढ़कालिका मंदिर को भी काली माँ के  शक्तिपीठ में शामिल किया गया है | महाकाली का जाग्रत मंदिर जो चमत्कारिक रूप से मनोकामना पूर्ण करता है गुजरात में पावागढ़ की पहाड़ी पर स्थित  है | हकीक की माला से नौ माला ‘क्रीं ह्नीं ह्नुं दक्षिणे कालिके स्वाहा:।’  मन्त्र का जाप करने से आपके सारे कष्ट माँ अवश्य हर लेंगी |
  1. माँ का दूसरा रूप तांत्रिकों की प्रमुख देवी तारा का है, जिनकी सबसे पहले महर्षि वशिष्ठ ने आराधना की थी। भगवती तारा के तीन स्वरूप तारा, एकजटा और नील सरस्वती हैं । पुराणिक कथाओ के अनुसार पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में देवी सती के नेत्र गिरे थे, इसलिए इस जगह को नयन तारा व तारापीठ भी कहा जाता है ।जबकि एक कथानुसार राजा दक्ष की दूसरी पुत्री देवी तारा थीं। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से लगभग 13 किमी की दूरी पर स्थित शोघी में तारा देवी का अन्य मंदिर है । हिन्दू धर्म की देवी ‘तारा’ का बौद्ध धर्म में भी काफी महत्‍व है । नीले कांच की माला से बारह माला प्रतिदिन ‘ऊँ ह्नीं स्त्रीं हुम फट’ मंत्र का जाप करने से माँ की कृपा अवश्य मिलती है |
  1. चार भुजा, तीन नेत्र वाली षोडशी माहेश्वरी शक्ति की विग्रह वाली देवी है, जिन्हें ललिता, राज राजेश्वरी और ‍त्रिपुर सुंदरी के नाम से भी जाना जाता है। षोडश कलाओ से परिपूर्ण होने के कारण इन्हें षोडशी भी कहा जाता है। पुराणों के अनुसार त्रिपुरा में जहाँ माँ सती के धारण किए हुए वस्त्र गिरे थे, यह शक्तिपीठ वहां स्थित है । उदयपुर शहर से तीन किलोमीटर दूर इस शक्तिपीठ में सती के दक्षिण ‘पाद’ का निपात हुआ था, इस पीठ को ‘कूर्भपीठ’ के नाम से भी जाना जाता है | ‘ऐ ह्नीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:’ मंत्र का जाप करने से माँ को शीघ्र प्रसन्न किया जा सकता है |
  1. भक्तों को अभय एवं सिद्धियां प्रदान करने वाली भुवनेश्वरी को आदिशक्ति और मूल प्रकृति का मूल कहे जाने वाली माँ भुवनेश्वरी को शताक्षी तथा शाकम्भरी के नाम से भी जाना जाता है । निसंतान जोड़े पुत्र प्राप्ती के लिए माँ के इस रूप की आराधना करते हैं। स्फटिक की माला से ग्यारह माला प्रतिदिन ‘ह्नीं भुवनेश्वरीयै ह्नीं नम:’ मंत्र का जाप करने से भुवनेश्वरी माता की कृपा बरसने लगती है।
  1. झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 79 किलोमीटर की दूरी पर दामोदर नदी के किनारे मां छिन्नमस्तिके मंदिर है | सिर कटा हुआ, कबंध से बहती रक्त की तीन धाराएं, तीन नेत्रधारी माँ का ये रूप मदन और रति पर आसीन है। गले में हड्डियों की माला व कंधे पर यज्ञोपवीत (sacred thread) धारण करने वाली माँ शांत भाव से इनकी उपासना करने वाले उपासक को शांत स्वरूप में तथा उग्र रूप में उपासना करने वाले को उग्र रूप में दर्शन देती हैं । पलास और बेलपत्रों से छिन्नमस्ता महाविद्या की सिद्धि करने से लेखन बुद्धि में ज्ञान बढ़ता है। रूद्राक्ष माला से दस माला प्रतिदिन ‘श्रीं ह्नीं ऎं वज्र वैरोचानियै ह्नीं फट स्वाहा’ मंत्र का जाप करने से देवी को प्रसन्न किया जा सकता है |
  2. बंदीछोड़ माता के नाम से जाने जाने वाली त्रिपुर भैरवी की उपासना से सभी बंधन दूर हो जाते हैं। देवी की आराधना से जीवन में काम, सौभाग्य और शारीरिक सुख के साथ आरोग्य सिद्धि प्राप्त की जाती है। मनोवांछित वर या कन्या से विवाह हेतु भी माँ की उपासना की जाती है। माँ का भक्त कभी भी दुखी नहीं रहता है। मुंगे की माला से पंद्रह माला ”ह्नीं भैरवी क्लौं ह्नीं स्वाहा: का जाप करना चाहिए |
  3. माँ धूमावती का कोई स्वामी न होने के कारण इन्हें विधवा माता माना जाता है। इनकी साधना से आत्मबल में विकास होने के कारण जीवन में निडरता और निश्चंतता का भाव आ जाता है। ऋग्वेद में इन्हें ‘सुतरा’ नाम से पुकारा गया है अर्थात जो सुखपूर्वक तारने योग्य हो। धूमावती महाविद्या के लिए अतिआवश्यक है कि व्यक्ति सात्विकता और संयम और सत्यनिष्ठा के नियम का पालन करने वाला हो तथा लोभ-लालच से दूर, शराब और मांस तक को छूए नहीं।
  4. युद्ध में विजय व शत्रुओं के नाश के लिए माँ माबगलामुखी की साधना की जाती है। बगला मुखी के देश में तीन ही स्थान है, जो दतिया(मध्यप्रदेश), कांगड़ा (हिमाचल) तथा नलखेड़ा जिला शाजापुर (मध्यप्रदेश) में हैं । महाभारत के युद्ध के पूर्व कृष्ण और अर्जुन ने माता बगलामुखी की पूजा की थी। बगलामुखी का मंत्र: हल्दी या पीले कांच की माला से आठ माला ‘ऊँ ह्नीं बगुलामुखी देव्यै ह्नीं ओम नम:’ या ‘ह्मीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलम बुद्धिं विनाशय ह्मीं ॐ स्वाहा।’ मंत्र के जाप से आपको सभी शत्रुओ से मिल जाएगी
  5. असुरों को मोहित करने वाली और साधकों को अभिष्ट फल देने वाली शक्ति का नाम मातंगी है। इनकी पूजा गृहस्थ जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए की जाती हैं। चन्द्रमा को मस्तक पर धारण करने वाली माँ मातंगी श्याम वर्ण की हैं। मातंगी माता के मंत्र: का जाप स्फटिक की माला से बारह माला ‘ऊँ ह्नीं ऐ भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा:’ मंत्र से किया जाता है |
  6. दरिद्रता, संकट, गृहकलह और अशांति से मुक्ति के लिए माँ कमला रानी की अर्चना की जाती है । समृद्धि, धन, नारी, पुत्रादि की प्राप्ति के लिए इनकी साधना की जाती है। जिस पर माँ अपनी दया दृष्टि डाल दे वो व्यक्ति साक्षात कुबेर के समान धनी और समान हो जाता है। माँ की उपासना के लिए कमलगट्टे की माला से रोजाना दस माला ‘हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा:।’ मंत्र का जाप करे |

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