बारह ज्योतिर्लिगों में प्रमुख है सोमनाथ मंदिर


बारह ज्योतिर्लिगों में सबसे प्रमुख व धार्मिक स्थल सोमनाथ है, जो भारत के पश्चिम में सौराष्ट्र (गुजरात) के समुद्र तट पर स्थित है। यहां सुबह और शाम अलग-अलग रूपों में सोमनाथ के भाव, भक्ति और श्रद्धापूर्वक दर्शन होते हैं। यहां ऐसा प्रतीत होता है मानो समुद्र अपनी गूंज और ऊंची-ऊंची लहरों के साथ शिव के चरण में वंदन कर रहा हो | समुद्र तट पर होने के कारण ग्रीष्म ऋतु में भी यहां मौसम शीतल रहता है तथा यहां पर्यटकों के कारण सदैव मेले जैसा माहौल रहता है। मंदिर के प्रांगण में सोमनाथ मंदिर के इतिहास का बड़ा ही सुंदर सचित्र वर्णन किया जाता है, जिसे साउंड एंड लाइट शो भी कहते है और इसका समय रात साढ़े सात से साढ़े आठ बजे तक का होता है |

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लोक कथाओ के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण भालुका तीर्थ पर विश्राम कर रहे थे। वहां पास में कोई शिकारी शिकार की तलाश में भटक रहा था |  शिकारी ने भगवान के पैर के तलुए में बने पद्मचिन्ह को हिरण की आंख जानकर धोखे में तीर भेद दिया और भगवान कृष्ण ने देह त्यागकर वैकुंठ के लिए गमन किया। चूँकि भगवान श्रीकृष्ण ने यही पर देह त्यागा था इसलिए इस क्षेत्र का और भी महत्व बढ़ गया है तथा इस स्थान पर बड़ा ही मनोहारी कृष्ण मंदिर बना हुआ है।

यहां कुछ समय पूर्व ही रेलवे स्टेशन बनकर तैयार हुआ है जिसके कारण अब मध्य प्रदेश से चलने वाली जबलपुर वेरावल एक्सप्रेस सीधे सोमनाथ तक आएगी । आगामी दिनों में मुंबई और पूना से भी यहां के लिए सीधी ट्रेन की सुविधा शुरू होने की संभावना है। विश्व प्रसिद्ध होने के बावजूद यह क्षेत्र अभी भी अविकसित है। मंदिर परिसर का भव्य निर्माण अभी चल रहा है, परन्तु नगर की सड़के टूटी-फूटी हैं, तथा बिजली, पानी और सफाई व्यवस्था बदहाल होने के बावजूद इसके यहां देश-विदेश के लाखों लोगों का तांता लगा रहता है |

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इस मंदिर की विशेषता यह भी है कि मंदिर का बार-बार खंडन और जीर्णोद्धार होता रहा मगर शिवलिंग यथावत रहा। सन 1026 में महमूद गजनी ने जो शिवलिंग खंडित किया, जो कि आधा ही खण्डित हुआ था | इसे दुबारा  प्रतिष्ठित किया गया |जिसके बाद 1300 में अलाउद्दीन की सेना ने तथा अन्य लोगो के द्वारा कई बार मंदिर और शिवलिंग खंडित किया गया।

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कहा जाता है कि आगरा के किले में रखे देवद्वार सोमनाथ मंदिर के ही हैं, जिन्हें महमूद गजनी सन 1026 में लूटपाट के दौरान ले गया था। राजा कुमार पाल द्वारा इसी स्थान पर अंतिम मंदिर बनवाया गया था।

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19 अप्रैल 1940 में सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री उच्छंगराय नवल शंकर ढेबर ने यहां उत्खनन कराया था। जिसके बाद भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने उत्खनन द्वारा प्राप्त ब्रह्माशिला पर शिव का ज्योतिर्लिग स्थापित किया है। 8 मई 1950 को सौराष्ट्र के पूर्व राजा दिग्विजय सिंह ने  मंदिर की आधार शिला रखी तथा 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर में ज्योतिर्लिग स्थापित किया। नवीन सोमनाथ मंदिर 1962 में पूर्ण निर्मित हो गया। 1970 में जामनगर की राजमाता ने अपने स्वर्गीय पति की स्मृति में उनके नाम से दिग्विजय द्वार बनवाया। इस द्वार के पास राजमार्ग है और पूर्व गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा है। सोमनाथ मंदिर निर्माण में पटेल का बड़ा योगदान रहा है ।

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मंदिर के दक्षिण में समुद्र के किनारे एक स्तंभ है, जिसके ऊपर एक तीर रखकर संकेत किया गया है कि सोमनाथ मंदिर और दक्षिण ध्रुव के बीच में पृथ्वी का कोई भूभाग नहीं है। माना जाता है कि मंदिर के पृष्ठ भाग में स्थित प्राचीन मंदिर पार्वती जी का मंदिर है। यह तीर्थ पितृगणों के श्राद्ध, नारायण बलि आदि कर्मो के लिए भी प्रसिद्ध है | चैत्र, भाद्र, कार्तिक माह में यहाँ श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ लगती है क्योंकि यहाँ श्राद्ध करने का विशेष महत्व माना जाता है।  इसके अलावा यहां तीन नदियों हिरण, कपिला और सरस्वती का महासंगम होता है यहाँ त्रिवेणी स्नान का विशेष महत्व है।

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वेरावल प्रभास क्षेत्र के मध्य में समुद्र के किनारे शशिभूषण मंदिर, भीड़भंजन गणपति, बाणेश्वर, चंद्रेश्वर-रत्नेश्वर, कपिलेश्वर, रोटलेश्वर, भालुका तीर्थ तथा भालकेश्वर, प्रागटेश्वर, पद्म कुंड, पांडव कूप, द्वारिकानाथ मंदिर, बालाजी मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर, रूदे्रश्वर मंदिर, सूर्य मंदिर, हिंगलाज गुफा, गीता मंदिर, बल्लभाचार्य महाप्रभु की 65वीं बैठक के अलावा कई अन्य प्रमुख मंदिर है। प्रभास खंड में विवरण है कि सोमनाथ मंदिर के समयकाल में यहाँ शिवजी के 135, विष्णु भगवान के 5, देवी के 25, सूर्यदेव के 16, गणेशजी के 5, नाग मंदिर 1, क्षेत्रपाल मंदिर 1 अन्य मंदिर तथा  कुंड 19 और नदियां 9 बताई जाती हैं। एक शिलालेख में लिखा है कि महमूद के हमले के बाद इक्कीस मंदिरों का निर्माण किया गया। संभवत: इसके पश्चात भी अनेक मंदिर बने होंगे।

श्रीकृष्ण की द्वारिका, सोमनाथ से करीब दो सौ किलोमीटर दूरी पर स्थित है, जहाँ पर  प्रतिदिन द्वारिकाधीश के दर्शन के लिए देश-विदेश से हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते है। यहां गोमती नदी है। इसके स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। ऐसा कहा जाता है कि इस नदी का जल सूर्योदय पर बढ़ता तथा  सूर्यास्त पर घटता है, जो सुबह सूरज निकलने से पहले मात्र एक डेढ़ फीट ही रह जाता है।

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