देर तक सोते रहने से भी होता है हैंगओवर !


आजकल की भागदौड़ भरी जिन्दगी में जब व्यक्ति के पास न ठीक से खाने का समय है न आराम करने का। ऐसे में वीकेंड ही लोगों के लिए एकमात्र विकल्प बचता है जब वो देर तक आराम कर सकता है या चैन की नींद ले सकता है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि ज्यादा देर तक सोते रहना भी आपकी सेहत के लिए अच्छा नहीं है। छुट्टी के दिन ज्यादा देर तक सोना न सिर्फ आपको और थका सकता है बल्कि आपको हैंगओवर जैसी फीलिंग भी करा सकता है आइए जानते हैं खुलासा में देर तक सोने से होने वाले नुकसान के बारे में।

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यदि पांच दिन भूखे रहने के बाद अचानक से एक दिन में ढेर सारा खाना खा लेने से हफ्ते भर के भोजन की जरूरत को पूरा नहीं किया जा सकता, ठीक इसी तरह वीकेंड यानि कि शनिवार-रविवार को अत्यधिक सोने से पांच दिनों की नींद की भरपाई कभी नहीं हो सकती | हालांकि अधिकांश लोगों का ऐसा नहीं मानना है परिणामस्वरूप वो वीकेंड पर दोपहर 11-12 बजे तक सोते रहते है या सोना पसंद करते हैं | मगर ये बात भी सोलह आना सच है कि दो दिनों में घंटों लंबी नींद लेने के बावजूद लोगो को तरोताजा महसूस नही होता, उल्टा थकान जस की तस रहती है |

ओवरस्लीपिंग यानी कि बहुत अधिक सोने के बाद शरीर ठीक वैसा ही महसूस करता है जैसे काफी मात्रा में शराब पीने के बाद कई घंटो तक हैंगओवर में रहता है,  यही कारण है कि वैज्ञानिक इसे स्लीपिंग ड्रंकेननेस के नाम से पुकारते हैं | जिस प्रकार अधिक शराब पीने से तंत्रिका तंत्र की कोशिकाएं डैमेज होने लगती जिसके कारण व्यक्ति थकान या सिरदर्द महसूस करता है,  ठीक वैसे ही ज्यादा सोने के बाद दिमाग का शरीर को नियंत्रित करने का तरीका गड़बडा जाता है और शरीर हैंगओवर की ही तरह महसूस करने लगता है |

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शरीर में सर्कैडियन रिदम या बायोलॉजिकल क्लॉक (जैविक घड़ी) नाम की लय पायी जाती है, जो सर्कैडियन पेसमेकर से तय होती है | दिमाग के हाइपोथैलेम हिस्से में पाई जाने वाली कोशिकाओं के समूह को सर्कैडियन पेसमेकर कहा जाता है तथा यही से शरीर में भूख, प्यास और पसीने को नियंत्रित करने का कार्य होता है | शरीर की जैविक घड़ी आंखों पर पड़ने वाली रोशनी से सक्रिय होती है तथा इसका काम शरीर की कोशिकाओं को दिन या रात की सूचना देना होता है |

वैज्ञानिकों के अनुसार जैविक घड़ी से मिली सूचना के आधार पर ही शरीर इस बात को तय करता है कि बचे हुए वक्त में उसे कितनी ऊर्जा का इस्तेमाल करना है| अत्याधिक सोने पर बायोलॉजिकल क्लॉक कार्य करना बंद कर देती है या ऐसा कहे तो गलत नहीं होगा कि बायोलॉजिकल क्लॉक भ्रमित हो जाती है और यही कारण है यह शरीर को असली स्थिति के बजाय अलग सूचना भेजना शुरू कर देती है, परिणामस्वरूप व्यक्ति जब देर तक सोकर उठता है तो तरोताजा महसूस करने के बजाय थकान या सिरदर्द महसूस करता है|

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इस बात को आसान तरीके से समझते है : मान लो हफ्ते में पांच दिन आप सही वक्त पर सोते और जागते हैं, किन्तु  शनिवार के दिन 11 बजे तक सोने के बाद उठ रहे हैं, तो ऐसी स्थिति में बायोलॉजिकल क्लॉक रोज की तरह सुबह 7 बजे से अपना काम कर रही होती है और आपकी ऊर्जा भी, अपेक्षाकृत कम रेट से ही सही पर खर्च हो रही होती है अत: उठते ही आप एक साथ उतना थका हुआ महसूस करते हैं जितना 7 से 11 बजे के दौरान जागे होने पर काम करते हुए करते है | वैज्ञानिको के अनुसार रोज बहुत सोने से शरीर को यह संदेश जाता है कि व्यक्ति को काम करने के लिए ऊर्जा की जरूरत नहीं है, जिसके चलते मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है यानी शरीर में कैलोरी की खपत कम हो जाती है और धीरे-धीरे व्यक्ति मोटापे या इससे जुड़ी बीमारियों का शिकार होने लगता है |

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में हुये शोध के अनुसार 9 से 11 घंटे तक सोने वालों को याद्दाश्त से जुड़ी समस्याएं शुरू होने लगती हैं, जबकि अन्य शोधो में इसे मोटापे, डायबिटीज और उम्र के घटने से जोड़कर भी देखा हैं | अत: वीकेंड पर देर तक सोना न सिर्फ आपके एक दिन को खराब करता है, बल्कि आपकी जिंदगी से थोड़ा समय भी कम कर देता है |

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