साक्षात्कार

मेरी पांडुलिपि ने बच्चनजी को आत्मकथा लिखने के लिए प्रेरित किया-अजित कुमार

आप कविता, गद्य, आलोचना के अलावा यात्रा-संस्मरण भी लिखते हैं।

दरअसल मैं कविता, कहानी, उपन्यास पर एक ही समय में सोच सकता हूं। अपने पहले यात्रा वृतांत ‘सफर झोली में’ मैंने ऐसी ही कोशिश की कि वह आलोचना भी हो, कविता भी हो, उपन्यास भी हो, कथा भी हो और उसमें जगहों का वर्णन भी हो। यानी एक मिली-जुली विधा। हम एक ऐसे युग में रह रहे हैं , जहां विधाएं अपने अनुशासन को तोड़ रही हैं। ऐसे में कोई निरा कवि, निरा उपन्यासकार होकर नहीं रह सकता। तो मैं अब एक ऐसी विधा की तलाश में हूं, जिसमें सब कुछ एक साथ बन सके।… मेरा अब मन है कि एक पुस्तक बच्चनजी पर लिखूं। 1962 के बाद उनका और मेरा जो सपर्क रहा उस पर। किताब का नाम रखूंगा। गुरुवर बच्चन से दूर। उनसे दूर हो गया लेकिन उनके पास भी रहा।

आप सबसे ज्यादा सहज किस विधा में महसूस करते हैं, कविता में गद्य में?
सहज तो मैं महसूस करता था कविता में ही, लेकिन मैंने देखा कि मेरी कविता में बहुत से लोगों को रुचि नहीं है। मुझे महसूस होता है कि जीवन का जितना अनुभव लिखने के लिए होना चाहिए उतना अनुभव मैं कर नहीं पाया हूं। 16 साल उम्र में तो सभी कवि हो सकते हैं लेकिन अगर कोई 50 की उम्र में भी कवि बने रहना चाहता है तो उसको जीवन की और अधिक पड़ताल करनी चाहिए, अपने अनुभव को और अधिक समृद्ध बनाना चाहिए। मैं सोचता हूं कि मुझे गद्य में अधिक सुविधा होती है। कंप्यूटर आने के बाद गद्य-लेखन मुझे और भी अधिक सुविधापूर्ण मालूम होता है। कविता तो नहीं लिख सकता कंप्यूटर पर, लेकिन मैंने सुना है कि बाहर बहुत से लोग कंप्यूटर पर कविता लिखते हैं और कभी-कभार तो कंप्यूटर भी खुद ही कविता लिख देता है।

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