अगर हम दौड़ेंगे तो हर खेल में अच्छे होंगेः आशीष राॅय


भारत के मैराथन मैन के रूप में मशहूर आशीष रॉय जिन्होंने भारतीय वायुसेना से रिटायरमेंट के बाद 1985 से मैराथन में दौड़ना शुरू किया तो फिर वे कभी नहीं रुके। खुलासा में हम प्रस्तुत कर रहे हैं भारत के मैराथन मैन आशीष रॉय से शरददत्त की बातचीत

अपने परिवार और बचपन के बारे में कुछ बताइए ?
मेरा जन्म 1992 में शिलांग में हुआ था। वहीं आर्मी स्कूल में पढ़ाई हुई। स्कूल मेरे घर से तीन किलोमीटर दूर था। हम लोग दौड़कर स्कूल जाते थे, दौड़ते हुए ही स्कूल से वापस आते थे। फिर शाम को खेलने जाते थे तो वो भी दौड़ते हुए।

आज आप ‘मैराथन-मैन’ कहलाते हैं। आप भारतीय वायु सेना में भी रहे और विंग कमांडर के पद से रिटायर हुए। वहां काम करने का अनुभव कैसा रहा?
मैंने इंडिया एयर फोर्स 1957 में ज्वाइन किया था। मैं उस जमाने में 10 मील प्रति घंटे की रफ्तार से भाग सकता था। मैं सोच रहा था कि आर्मी में स्पोटर्स में भाग लेने का मौका मिलेगा लेकिन मेरी ‘एसेंशियल ड्यूटी’ होती थी। ऐसी ड्यूटी में खेल के लिए समय निकालना बहुत मुश्किल था, इसलिए मैं वहां ज्यादा दौड़ नहीं लगा सका। मैंने एक बार एथलेटिक में 400-800 मीटर की दौड़ में भाग लिया लेकिन एयरफोर्स की 21 साल की नौकरी में मुझे स्पोट्र्स में ऊपर आने का मौका नहीं मिला। मेडिसिन में एमडी करके में एयरफोर्स में मेडिकल स्पेशलिस्टि के पद था। 16-16 घंटे काम करना पड़ता था। लिहाजा मैं दौड़ को जारी नहीं रख सका।

जब आप 55 साल के हुए तो आपने मैराथन का शौक पूरा किया, जबकि लोग इस उम्र में आराम करने की सोचते हैं। इसकी प्रेरणा कहां से मिली?
21 साल नौकरी करने के बाद मैंने नौकरी छोड़ दी। तब मेरी उम्र 47 साल थी। तीन-चार साल तक मैंने प्राइवेट प्रैक्टिस की। चार साल बाद मेरे एक दोस्त ने कहा कि मेरा वजन बहुत बढ़ गया है। सचमुच मेरा वजन बढ़ गया था, कोलेस्ट्रोल बढ़ गया था। ब्लड प्रेशर बढ़ गया था। मैंने अपना स्वास्थ्य सुधारने के लिए दौड़ शुरू की। 1993 में दूसरे एशियाई खेल हुए। इसमें मैराथन रेस देखने के बाद मैंने तय किया कि अगले साल मैं भी मैराथन में दौड़ूंगा। 1985 में मैं पहली बार 42 किलोमीटर मैराथन में भागा था। इसके बाद मैं कभी रूका नहीं। दौड़ता ही रहा। अच्छा लगता था। स्वास्थ्य ठीक रहता था। मन आनंदित रहता था। मैंने 20 देशों में मैराथन में भाग लिया।

अच्छा मैराथन मैन बनने के लिए क्या-क्या जरूरी है?
बहुत ही ‘हार्ड-वर्क’ होता है। इतना किसी और स्पोट्र्स में नहीं होता। एक पूरा मैराथन यानी 42 किलोमीटर भागने के लिए मुझे हर हफ्ते 126 किलोमीटर भागना पड़ता था। हर दिन मैं लगभग 15-16 किलोमीटर भागता था और इतवार को 32 किलोमीटर। ऐसा मैंने दस साल किया।

बचपन से ही मैराथन की ट्रेनिंग लेने वालों से प्रतियोगिता करने में आपको डर नहीं लगा था?
काफी अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती थी, क्योंकि मैंने प्रौढ़ावस्था में दौड़ना शुरू किया था। सुबह 5 बजे उठकर प्रैक्टिस करनी पड़ती थी। मैं पेशे से डाॅक्टर हूं तो उसकी प्रैक्टिस के लिए भी जाना पड़ता था। मैं जितना ज्यादा दौड़ने लगा उतना ही ज्यादा मेरा ‘स्टैमिना’ बढ़ने लगा। मैंने 1985 में पहली मैराथन में भाग लिया तो वे रेस मैंने तीन घंटे 55 में पूरी की थी। फिर 1987 में दिल्ली में मैंने तीन घंटे 10 मिनट का रिकाॅर्ड बनाया, जिसे आज तक कोई तोड़ नहीं सका है।

कोई ऐसी यादगार मैराथन है जिसके बाद आपको लगा हो कि आज आपकी तमन्ना पूरी हो गई है?
मुझे सबसे अच्छा तब लगा, जब 1996 में मैं भागा था बोस्टन में। बोस्टन मैराथन के 100 साल पूरे हो रहे थे। उसमें भाग लेने 40,000 लोग 110 देशों से आए थे। मैं वो रेस अपने देश का झंडा लेकर दौड़ा था। मुझे बहुत गर्व हुआ था। उसमें दौड़ने वाला अपने देश का मैं अकेला व्यक्ति था।

आखिर अफ्रीकी देशों के लोग ही हमेशा मैराथन क्यों जीतते हैं?
इसका कारण है कि ये देश बहुत ऊंचाई पर बसे हैं। ऊंचाई पर आक्सीजन कम होती है। ऐसे जलवायु में जो लोग प्रैक्टिस करते हैं, उनका ‘स्टैमिना’ बहुत अच्छा होता है।

भारत के लोग खेलों के प्रति ज्यादा जागरूक नहीं है। ऐसे माहौल में क्या हम विश्व स्तर के मैराथन-मैन तैयार कर पाएंगे?                         मुझे पूरा विश्वास है कि हम ऐसा कर सकेंगे। मेरे जैसा आदमी अमेरिका में 1999 में, जब मेरी उम्र 66 साल थी, एक संडे, दूसरे संडे और तीसरे संडे….यानी हर संडे मैराथन में भागा। तीनों ही रेसों में मैं प्रथम आया। जब मैं इतनी उम्र में मुकाबला कर सकता हूं तो हमारी नई पीढ़ी के लोग तो और भी अच्छा कर सकते हैं।

आज जब मैराथन होती है, तो उसमें कुछ फिल्मी सितारे भी आ जाते हैं। खेल से जुड़ी कुछ हस्तियां भी आ जाती हैं। तब सारे कैमरे उन्हीं की तरफ मुड़ जाते हैं।
यह सब हमारे देश को भूलना पड़ेगा। जिस तरह क्रिकेट के मैदान में हम क्रिकेटर को इज्जत देते हैं, वैसे ही आप यहां भी खिलाड़ी को इज्जत दें। आपको इसमें किसी सेलेब्रिटी को लाने की जरूरत नहीं है। हमारे देश के लड़के-लड़कियों को लाइए। उनको ज्यादा से ज्यादा टेलीविजन पर दिखाए। इससे हमारा देश खेल में तरक्की करेगा।

आपने एक किताब लिखी है-‘जाय आॅफ रनिंग’ इस किताब में आपने युवाओं को कुछ गुर दिए हैं या यह आपकी जीवनी है?
इस किताब के पहले तीन हिस्सों में मैने 20 देशों मंे अपनी 80 मैराथनों के बारे में लिखा है। आखिर के 100 पेजों में दौड़ने के वैज्ञानिक तरीकों पर रोशनी डाली है। इसके अलावा इसमें मैंने यह भी लिखा है कि दौड़ने की शुरुआत कैसे की जाए। मेरी यह किताब मराठी में भी अनूदित हो चुकी है। बंगाली और हिंदी में भी इसका अनुवाद होगा।

युवा पीढ़ी के लिए कोई संदेश?
मैं युवा पीढ़ी से सिर्फ एक बात कहना चाहूंगा कि जिस तरह लिखना-पढ़ना सीखने के लिए क ख ग से शुरुआत करनी पड़ती है, उसी तरह किसी भी खेल में हिस्सा लेने के लिए, खिलाड़ी बनने के लिए पैरों को हिलाना पड़ता है, मतलब हमंे दौड़ना पड़ेगा। अगर हम दौड़े तो हर खेल में अच्छे होंगे। मैंने फुटबाल और बाॅस्केटबाॅल के बहुत से खिलाड़ियों को देखा है। वे सभी सुबह दौड़ते हैं अपना फिटनेस को बेहतर बनाने के लिए।

 

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शरददत्त

शरददत्त

शरद दत्त जाने-माने फि‍ल्म-निर्माता/लेखक है। वह चार दशक से अधिक समय से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ संबद्ध हैं। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों के विशिष्ट व्यक्तियों पर 100 से अधिक वृत्तचित्रों का निर्माण कि‍या है। स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस समारोहों का 33 वर्षों तक सीधा प्रसारण प्रस्तुत किया। इनके अलावा महान संगीतकार अनिल विश्वास की ‘ऋतु आए ऋतु जाए’ शीर्षक से जीवनी। ‘कुंदन’ शीर्षक से कुंदललाल सहगल की जीवनी। और भी कई महत्वसपूर्ण पुस्तकों का लेखन-संपादन। स्वर्ण कमल पुरस्कार, सर्वोत्तम क्रिएटिव प्रोड्यूसर एवार्ड, दूरदर्शन एवार्ड, गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार, शमशेर सम्मान आदि‍ कई पुरस्कारों से सम्मा्नि‍त।

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