मैं फिल्मों से पैसा कमाकर फिर उसी में गंवाता हूं: सागर सरहदी


आपकी एक फिल्म थी ‘दूसरा आदमी’ जो शायद उस वक्त से कुछ पहले आ गई थी। क्योंकि इसकी कहानी थोड़ी बोल्ड थी। लेकिन वो फिल्म् आपके काफी करीब थी। तो एक लेखक के रूप में ‘दूसरा आदमी’ फिल्म के बारे में कुछ बताइए।

दूसरा आदमी के बारे में ये है कि मेरे एक भतीजे हैं रमेश तलवार। आज वो बहुत बड़े आदमी हैं। डायरेक्टर बन गए हैं। तो उस वक्त मैं एक्सेप्ट हो गया था। लेखक के तौर पर मेरा नाम भी होने लगा था। तो हम लोग कुछ ऐसा प्रोजेक्ट चाहते थे कि इनको लांच करे और इनकी इमेज बने। तो ऋषि कूपर तब तक हमारे ग्रुप का एक एक्सेप्टेबल किस्म का हीरो था। वो हमारे साथ था। मैं भी चाहता था, यश चोपड़ा भी चाहते थे कि सब्जेक्ट कुछ ऐसा हो जो बहुत ही अलग-सा हो।

आप डायरेक्टर बने ‘बाजार’ फिल्म के साथ। फिर आप प्राड्यूसर बने। आपका ‘न्यू वे’ बैनर था जिसके अंतर्गत आप चाहते थे कि सार्थक सिनेमा, एक मीनिंगफुल सिनेमा बने। तो ‘बाजार’ बहुत आपकी सुपरहिट हुई। आपने एक फिल्म बनाई ‘लोरी’। आपने एक फिल्म बनाई चैसर जो बिल्कुल दिल्ली के आसपास आपने शूट की और मुझे याद है उन दिनों आप नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामा के कुछ युवाओं के साथ काम कर रहे थे। वो आपकी कहानी-जो उस वक्त आपके जेहन में थे तो वो एक बहुत अच्छा आइडिया थी लेकिन उसमें गड़बड़ क्या हो गई?

-लोरी की बात करें जो कि मेरे दूसरे भतीजे हैं विजय तलवार साहब तो उनके लिए हमने एक अच्छा-सा मजेदार सा प्रोजेक्ट बनाया। शबाना हमारे ग्रुप में भी मेरे साथ काम करना चाहती थी तो हमने सोचा कि विजय साहब को एक चांस दिया जाए। ये फिल्म उन्होंने बहुत अच्छी बनाई, बहुत इमोशनल, बहुत खूबसूरत। लेकिन उन दिनों सीरियल शुरू हो गए थे। दिल्ली से ‘हम लोग’ और मुंबई में ‘ये जो हैं जिंदगी’ और बाद में ‘बुनियाद’, उसके बाद ‘तमस’, तो बहुत अच्छे सीरियल दिल्ली और मुंबई में शुरू हो गए थे। लोगों ने थिएटर में जाना छोड़ दिया था। आपको याद होगा बहुत से थिएटर बंद हो गए थे। तो उसकी वजह से ‘लोरी’ ज्यादा नहीं चल पाई।

आपने फिल्म ‘बाजार’, ‘लोरी’ और ‘चैसर’ में सोशल प्राॅबल्म उठाई। क्या आप समझते हैं कि ये सोशल इश्यू फिल्मों के माध्यम से हल किए जा सकते हैं ?

-जहां तक मेरी निजी जिंदगी का ताल्लुक है, तो मैं बिना मोटिवेशन के फिल्म नहीं बना सकता। अभी जैसे ‘चैसर’ का जिक्र आपने किया तो फिल्म से मैं पैसे कमाता हूं, गंवाता हूं, फिर कमाता हूं, फिर गंवा देता हूं। मुझे पैसे में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है।

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शरददत्त

शरददत्त

शरद दत्त जाने-माने फि‍ल्म-निर्माता/लेखक है। वह चार दशक से अधिक समय से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ संबद्ध हैं। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों के विशिष्ट व्यक्तियों पर 100 से अधिक वृत्तचित्रों का निर्माण कि‍या है। स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस समारोहों का 33 वर्षों तक सीधा प्रसारण प्रस्तुत किया। इनके अलावा महान संगीतकार अनिल विश्वास की ‘ऋतु आए ऋतु जाए’ शीर्षक से जीवनी। ‘कुंदन’ शीर्षक से कुंदललाल सहगल की जीवनी। और भी कई महत्वसपूर्ण पुस्तकों का लेखन-संपादन। स्वर्ण कमल पुरस्कार, सर्वोत्तम क्रिएटिव प्रोड्यूसर एवार्ड, दूरदर्शन एवार्ड, गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार, शमशेर सम्मान आदि‍ कई पुरस्कारों से सम्मा्नि‍त।

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