रोहितवेमुला के बहाने नागेश्वर राव स्टार की कहानी


रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद दलित मुद्दे और दलित आबादी एक बार फिर से बहस के केंद्र में आ गयी. हैदराबाद सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी के एस एन कम्युनिकेशन स्कूल द्वारा निर्मित डिप्लोमा फ़िल्म ‘आई एम नागेश्वर राव स्टार’ को देखना अनुभव और यथार्थ के एकदम नए धरातल पर हमें ले जाता है. यहाँ यह भी जानना महत्वपूर्ण है कि किसी छात्र के दलित होने के अनुभव पर यह संभवत अकेली फ़िल्म है. यह शायद इसलिए भी अकेली फ़िल्म है क्योंकि तमाम प्रोफेशनल संस्थानों और आरक्षण होने के बावजूद अभी भी बहुत कम दलित छात्र ऐसे संस्थानों में प्रवेश पाते हैं.

यह एक डिप्लोमा फिल्म है जिसे नागेश्वर राव ने अपने सहपाठियों के साथ मिलकर बनाया है. फ़िल्म टाइपराइटर पर एक नतीजे के लिखने से शुरू होती है जिससे हमें पता चलता है कि नागेश्वर राव का चयन हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सटी के एस एन कम्युनिकेशनस्कूल में हुआ है इसी से पता चलता है कि वह सिर्फ नागेश्वर राव नहीं बल्कि उसके नाम के साथ स्टार भी जुड़ा है. पूरी फ़िल्म इसी स्टार के इर्द गिर्द है. नागेश्वर कहते हैं कि पहली बार इतना साफतौर पर मुझे अपने दलित होने का अहसास कराया गया है. फिर इसी बहाने वे अपनी कहानी सुनाते हैं. फिल्म में वे अपने बचपन के जगह सुन्दरू की यात्रा करते हैं. यह वही सुन्दरू जहाँ एक ध्वस्त पड़े सिनेमाहाल में उनका आवासीय स्कूल चलता है. वहां उनकी मुलाक़ात अम्बेडकर कालोनी में रहने वाले दलित छात्रों से होती है जिनसे वे अम्बेडकर के बारे में पूछते हैं.अपनी इस यात्रा में वे सुन्दरू के लोगों से उस इलाके में माला (अछूतों) लोगों पर हुए अत्याचार और उनकी हत्या के कारणों की तफ़तीश करते हैं. सुन्दरू में सवर्ण रेड्डी लोगों ने 9 मालाओं की हत्या कर दी थी. नागेश्वर राव उस हत्या से उपजी खामोशी और दुःख का जिक्र अपनी कहानी बताते हुए करते हैं. सुन्दरू की यह घटना उन्हें अपनी आपबीती ही लगती है. इस घटना के नोटिस न लिए जाने के दुःख को भी वह अपनी कमेंटरी में व्यक्त करते हैं. सुन्दरूकी इस यात्रा के बाद फिल्म का का बड़ा हिस्सा हैदराबाद युनिवर्सटी के कैम्पस में चलता है जहां नागेश्वर राव अम्बेडकर छात्र सभा के अपने मित्रों के साथ सामाजिक विमर्श में जुटे हैं. इस विमर्श से निकलती ‘दलित’ शब्द की व्याख्या गौर करने लायक है जिसमे एक लड़का जोर देकर कहता है हर कोई व्यक्ति जिसका सवर्ण और संपन्न लोगों द्वारा शोषण हो रहा है वह दलित है. फिल्म का अंतिम हिस्सा दलितएक्टिविस्ट और कवि कती पद्माराव से नागेश्वर के जुड़ाव को दर्शाता है जिसके जरिये वह दलितों के संघर्ष और सवर्णों के शोषण के सन्दर्भ को ठीक से समझ पाता है. समझने के इसी क्रम में वह डॉ अम्बेडकर के योगदान से भी परिचित होता है. फिल्म के अंत आते –आतेनागेश्वर की यह स्वीकरोक्ति बहुत ख़ास है जिसमे वह कहते हैं कि ‘मैं जोकि अपने परिवार का पहला पढ़ता हुआ व्यक्ति हूँ उसपर यह जिम्मेवारी बनती है कि मैं मजबूती से अपनीजगह बनाऊं और अपने हक़ केलिए लडूं. फिल्म के अंत में नागेश्वर जो बात कहता है वह बहुत ख़ास है. वह कहता है ‘मैं हैदराबाद सेंट्रल युनिवर्सटी की लिस्ट का दलित हूँ, असहमति में उठा हाथ हूँ, एक नरसंहार की कथा कहने वाला हूँ, मैं सभी मतभेदों का पुत्र हूँ जिनसे मैं पहले परिचित नहीं था, विभिन्नविशेषणोंमें खोया मैं वही नागेश्वर हूँ जो अभी भी मानवीय है.’

यह फिल्म इसलिए भी ख़ास है क्योंकि इसी कैम्पस में कुछ साल बाद रोहित वेमुला पढ़ने आये. रोहित को जानने का एक तरीका नागेश्वर राव स्टार की कहानी को ध्यान से देखते हुए भी पता चल सकता है.

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संजय जोशी

संजय जोशी

स्वतंत्र फ़िल्मकार और राष्ट्रीय संयोजक, प्रतिरोध का सिनेमा

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