शोध के नाम पर…


हरिपाल त्यागी मेरा दोस्त है—बहुत प्यारा और क़दीमी। उसके साथ मेरी दोस्ती की उम्र आधी सदी से ऊपर हो चुकी है। मुझे याद है, दिल्ली प्रेस की लोकप्रिय पत्रिका मुक्ता की शुरुआत 1961 में हुई थी और तभी उसमें संस्कृत-नाटककार शूद्रक की रचना मृच्छकटिकम् का हिंदी-अनुवाद भव्य रूप में प्रकाशित करने की योजना बनाई गई थी। भव्य रूप में अर्थात कलात्मक चित्रों के साथ। चित्रांकन के लिए चयन किया गया था हरिपाल त्यागी का। उन दिनों मेरे छात्र-जीवन के दोस्त भीमसेन त्यागी दिल्ली प्रेस में संपादक के पद पर कार्य कर रहे थे। यह ग़ालिबन 1962 की दूसरी तिमाही की बात है, मैं कलकत्ता से सपरिवार दिल्ली आकर उनके घर में ठहरा हुआ था। तभी एक रविवार को हरिपाल वहाँ आए और उनसे मेरा परिचय हुआ। उस पहली मुलाक़ात में ही उन्होंने मेरी पाँच-छह वर्षीय बिटिया दीपा का बहुत जीवंत रेखाचित्र बनाया था। जिस तरह पलक झपकते उन्होंने वह रेखाचित्र बनाया, उसे देखकर मैं उनकी प्रतिभा का क़ायल हो गया था। फिर तो वह दोस्ती परवान चढ़ती ही गई, यहाँ तक कि 1970 के जुलाई महीने में जब मैं कलकत्ता को हमेशा के लिए अलविदा कहकर सपरिवार दिल्ली आया, तो लगभग एक महीने तक पूरे लाव-लश्कर के साथ उनके पास ही रहा था और उन्हीं के प्रयासों से मुझे करौलबाग़ में किराए का सुविधाजनक मकान मिला था।

हरिपाल के साथ संबंधों की इस आधी सदी से ज्य़ादा के दौर में मैंने पाया कि वे मुँहफट होने की हद तक साफ़गो तथा कला के मामले में—कला ही नहीं, किसी भी मामले में—समझौतों के घोर विरोधी हैं और शायद उनके व्यक्तित्व का यह पहलू ही उन्हें धुर-साम्यवादी आंदोलन में खींच ले गया था।

इस पृष्ठभूमि में जब हरिपाल त्यागी की व्यंग्य-दृष्टि  शीर्षक लघु शोधप्रबंध मेरे सामने आया, तो मेरा उसके प्रति आकर्षण स्वाभाविक था और मैंने इसे रुचिपूर्वक पढऩा शुरू किया, लेकिन मेरी रुचि ज्य़ादा देर तक बरक़रार नहीं रह सकी, जल्दी ही मेरा मोहभंग हो गया। पूरी पुस्तक पढऩे का धैर्य मुझमें नहीं रह गया था, फिर भी इसे आद्योपांत पढ़ा यह देखने के लिए कि लघु ही सही, शोधप्रबंध के नाम पर कितना निम्नस्तरीय काम किया जा सकता है। अकसर कहा जाता है कि घटिया चीज़ों की, आलोचना के लिए भी, चर्चा करके उन्हें महत्व न दो—किसी शायर के शब्दों में, बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा। ऐसी स्थिति में सुधी जनों द्वारा घटिया चीज़ों की अनदेखी करना ही उचित ठहराया गया है। लेकिन घटिया शोधप्रबंधों के लेखन-प्रकाशन से बौद्धिक-जगत की अपूरणीय क्षति हो रही है। इस प्रवृत्ति पर कोई कारगर अंकुश लगना ही चाहिए और इसके लिए ज़रूरी है कि ऐसे शोधप्रबंधों के घटियापन की अनदेखी न करके उसे उजागर किया जाए। लिहाजा पुस्तक पढ़ते समय जो बातें खटकीं, उनका सिलसिलेवार ब्यौरा प्रस्तुत है।

सबसे पहले संदर्भ-ग्रंथ सूची, क्योंकि शोधप्रबंध का महल इसी की बुनियाद पर टिका होता है। इस सूची में हरिपाल त्यागी की तीन पुस्तकें आधार-ग्रंथों के रूप में गिनवाई गई हैं : अधूरी इबारत, महापुरुष  और आदमी से आदमी तक।  पहली दो पुस्तकों के नाम तो ठीक, लेकिन तीसरी पुस्तक के बारे में कई आपत्तियाँ हैं। बुनियादी आपत्ति तो यह कि इसे हरिपाल त्यागी एवं भीमसेन त्यागी की कृति बताया गया है, जबकि इसमें लेखन भीमसेन त्यागी का है और हरिपाल त्यागी ने केवल उन लेखों का चित्रांकन किया है। मजे की बात यह कि इस तथ्य का उल्लेख स्वयं शोधकर्ता ने अपने प्रबंध में किया है (पृ. 55), तो फिर संदर्भ-ग्रंथ सूची में घालमेल क्यों? इतना ही नहीं, इस कृति को किसी भी दृष्टि से व्यंग्य-रचना नहीं कहा जा सकता—न शब्दचित्रों की दृष्टि से और न चित्रांकन की दृष्टि से। संभवत: यही कारण है कि इस पुस्तक को आधार-ग्रंथों में गिनवाने के बावजूद इसका कोई हवाला पूरे प्रबंध में नहीं दिया गया है।

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