सरहदों के बीच पसरा संगीत


कुर्द फ़िल्मकार बहमन घोबादी की फ़िल्म ‘हाफ़ मून’ या ‘अधखिला चाँद’ ईरानी और इराकी नागरिकता के बीच फंसे कुर्द लोगो की त्रासदियों की कहानी है जिसमे संगीत सरहदों को तोड़ने की कोशिश करता है.

‘हाफ़ मून’ अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव में चल रहे बुजुर्ग संगीतकार मामू की कहानी है जिसका अंतिम सपना है अपने पुश्तैनी कुर्द गावं में एक संगीत सभा का आयोजन करना जिसमे एक युवती का स्वर भी जरुरी तौर पर शामिल होना है. युवती का स्वर हमारे लिए जितना सहज है ईरान में रह रहे कुर्द संगीतज्ञ के लिए उतना ही असहज क्योंकि वहां औरतों के गाना गाने पर पाबंदी है.

मामू अपनी यात्रा एक बस में शुरू करते हैं जिसमे उनके साथ उनके आठ संगीतकार बेटे भी सवार हैं. बस में बैठते ही संगीत का रियाज़ शुरू हो जाता है. सबसे पहले वे ईरान में निर्वासित एक महिला गायिका की खोज में आगे बढ़ते हैं जिसके साथ से कंसर्ट मुकम्मल तरीके से तैयार हो सकेगी. अपने महिला स्वर की खोज में मामू एक ऐसे इलाके में पहुंचते हैं जहां उनका महिला स्वर 1321 निर्वासित महिला गायिकाओं के साथ रह रहा है.एक नाटकीय दृश्य संयोजन में मामू अपनी चहेती महिला गायिका के साथ निकलते हैं और 1321 महिला गायिकाओं का हुजूम सीढ़ियों पर खड़े होकर ढपली बजाते हुए अपनी प्रतिभाशाली साथी को विदा करता है.

मामूअब बस में सवार सघन रियाज़ के साथ यात्रा शुरू करते हैं जिसमे नौ पुरुषों के साथ एक सुरीला स्वर भी जुड़ गया है. ईरान की सीमा के पहले ही एक दुस्वप्न की तरह चेकपोस्ट पर सुरों की इस सवारी की जांच होती है और महिला स्वर को गिरफ्तार करके यह सवारी फिर से महिला स्वर से मरहूम कर दीजाती है. इस बार मामू महिला स्वर की खोज में रास्ते के एक ऐसे गावं पहुंचते हैं जहां उनका बूढ़ा संगीतज्ञ दोस्त रहता है. मामू का दुर्भाग्य यहाँ भी उनका साथ नहीं छोड़ता. पता चलता है कि उसी दिन उनके दोस्त की मय्यत की तैयारी की जा रही है. दुखी मन से मामू अपने दोस्त की कब्र में मिट्टी डालते हैं. मिट्टी डालने के दौरान ही उन्हें शोक के समवेत स्वर में सुनायी पड़ती है एक तीखी महिला स्वर की आवाज़. अब मामू उस आवाज़ की खोज करते हैं और वह महिला खुद उनके समक्ष पेश हो जाती है. फिर उनके पैत्रक गाव में आख़िरी कंसर्ट करने की यात्रा शुरू होती है. किसी तरह वे कई सरहदों पर तैनात सिपाहियों को चकमा देते हुए मामू के गावं पहुँच जाते हैं. आख़िरी दृश्य में कंसर्ट अपने पूरे कसाव में है. दर्शकों की आंखें संगीत के दीवाने उस बूढ़े मामू को खोजतीहैं. एक अद्भुत दृश्य संयोजन में मामू कंसर्ट के पास खुले मैदान में ताबूत में लेटा है सुकून से अपने प्रिय महिला स्वर को सुनता हुआ और दृश्य के ऊपर के हिस्से में हर तरह की सरहदों को चुनौती देता अधखिला चांद मौजूद है अपने समूचे सौन्दर्य के साथ.

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संजय जोशी

19 जनवरी 2015


संजय जोशी

संजय जोशी

स्वतंत्र फ़िल्मकार और राष्ट्रीय संयोजक, प्रतिरोध का सिनेमा

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