सिनेमा के आस्वाद को अंतिम दर्शक तक पहुँचाने की कसरतें 


पहले  पहल जब सिनेमा बनना  शुरू हुआ तो उसके दिखाने के तरीके भी गढ़े जा रहे थे.1932 में दुनिया का पहला फिल्म फेस्टिवल इटली के वेनिस शहर में आयोजित हुआ। सिनेमा को अकेले अपने लैपटॉप या डेस्कटॉप में घर में गूंजती कई आवाजों के बीच देखना , सिनेमा को एक सही हाल में पर्याप्त अँधेरे और अच्छे प्रोजक्शन के जरिये  देखना और सिनेमा को फिल्म फेस्टिवल में गहमागहमी के साथ  उस फिल्म के अभिनेताओं और निर्देशक की उपस्थति में देखना, ये सब अलग -अलग अनुभव हैं.

दस्तावेज़ी सिनेमा में फ़िल्म  को देखना – दिखाना और गहरे तौर पर जुड़ा है।  इस विधा में निर्मित हो रही बहुत सारी फिल्मों का मुद्दों से सीधा जुड़ाव होने  के कारण फ़िल्म की कमेन्टरी या उसके किरदारों की बात को समझना  बहुत जरूरी हो जाता है. मैं यहाँ अपनी बात को समझाने के लिए  हिंदुस्तान में पिछले दस वर्षो से चल  रहे सिनेमा अभियान प्रतिरोध का सिनेमा से जुड़े अपने निजी अनुभवों को साझा करना चाहूंगा। 2009 में प्रतिरोध का सिनेमा का दूसरा भिलाई फ़िल्म फेस्टिवल तैयार करते हुए मुझसे  स्थानीय टीम की  तरफ से साफ़ अनुरोध किया गया कि कम से कम एक फ़िल्म ऐसी हो जो सफ़ाई कामगारों के जीवन से सम्बंधित हो।  फिर एक और अनुरोध यह भी था कि अगर महिला सफ़ाई कामगारों का जिक्र हो तो और अच्छा रहेगा।  हमारी किस्मत से तब तक मदुराई में रहते हुए दस्तावेज़ी फ़िल्मकार अमुधन  पुष्पम रामलिंगम मदुराई की  एक दलित महिला सफ़ाई कामगार पर ‘पी’ नाम से एक दस्तावेज़ी फ़िल्म बना चुके थे।  हमने इस फ़िल्म को अपने फेस्टिवल में शामिल कर लिया।  इस फ़िल्म में उस दलित महिला के साथ काम करते हुए तमिल भाषा में बात दर्ज की  गयी  थी जिसके सबटाइटल्स अंग्रेजी में लिखे गए थे।

अब दिक्कत यह थी कि इस फ़िल्म के विमर्श  को भिलाई की कामगार साथियों तक कैसे १०० प्रतिशत पहुँचाया जाय जो न तो तमिल जानती थीं और न ही अंग्रेजी . फिर अनिवार्य तौर पर हमने इस फ़िल्म की तमिल बातचीत का तर्जुमा हिंदी में करवाया। फ़िल्म के   प्रदर्शन के दिन ‘पी’ शुरू होने से ठीक पहले भिलाई के नेहरू सभागार में 30 से 40 महिला सफ़ाई कामगारों का समूह  प्रवेश कर चुका था।  हमने भी पूरी तैयारी के साथ प्रोजक्टर के बगल में रखे टेबुल लैम्प की  रोशनी में तमिल भाषा में बोली जा रही उस दलित महिला की कहानी को हिंदी में कहना शुरू किया।  इस बात का जरुर ध्यान रखा गया था कि तमिल भाषा वाला ऑडियो चैनल एकदम न बंद रखा जाय जिससे हमारे दर्शकों को फ़िल्म की लोकेशन का भी अहसास होता रहे. यहाँ यह साझा करते हुए बहुत खुशी हो रही है कि सिनेमा माध्यम की इतनी थोड़ी सी समझदारी और अपने दर्शकों को जोड़ने की चिंता की  वजह से उस दिन भिलाई फ़िल्म सोसाइटी और प्रतिरोध का सिनेमा अभियान अपने नए बने दर्शकों को सिनेमा से जोड़ने में कामयाब रहा।

शायद यही वजह थी कि उन्नीस सौ अस्सी के दशक में केरल में लोकप्रिय हुए  सिनेमा आंदोलन में विश्व सिनेमा की कालजयी फिल्में दिखाते हुए वहां का सिने एक्टिविस्ट  कई बार फिल्मों को रोककर उनके गूढ़  संवादों को सरल मलयाली भाषा में रूपांतरित करता।

यही वजह है कि वैश्विक पाइरेसी के बावजूद आज भी फ़िल्म फेस्टिवलों में दर्शकों की भीड़ और उत्साह देखा जा रहा है। फ़िल्म में दर्शाये गए सत्य को समझने का एक बड़ा मौका निर्देशक से सीधी मुलाकात से अच्छा नहीं हो सकता। बहुत से फिल्मकार भी इसीलिए फिल्म फेस्टिवलों में शिरकत करने को आतुर रहते हैं क्योंकि सच्चा दर्शक बिना लागलपेट के अपनी बात कहता है और यह किसी फ़िल्म के मूल्यांकन का एक बहुत ही विश्वसनीय तरीका है।

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संजय जोशी

संजय जोशी

स्वतंत्र फ़िल्मकार और राष्ट्रीय संयोजक, प्रतिरोध का सिनेमा

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