पाकिस्तान ही नही भारत में भी इनके उपन्यास ब्लैक में बिका करते थे 


1950 से 1980 तक के दौर में साहित्य के क्षेत्र में जासूसी कथा लेखन की कोई खास प्रतिष्ठा नहीं थी मगर भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे ज्यादा पढ़ी जानी वाली साहित्यिक विधा जासूसी लेखन थी, जिसका कारण इब्ने सफी को माना जाता है | इब्ने सफी के उपन्यासों के चाहने वालों की तादाद भारत और पाकिस्तान में नहीं पूरे यूरोप तक फैली हुई थी। इब्ने सफी के जासूसी उपन्यासों की दीवानगी इस हद तक थी कि उन्हें ब्लैक तक किया जाता था।

जासूसी नवल में पहचान

इब्ने सफी का जन्म 26 जुलाई,1928 को इलाहाबाद में हुआ था मगर 1952 में वो पाकिस्तान चले गए थे | ये ऐसा समय था जब वे जासूसी नोवल लिखने के लिए पहचान बना रहे थे और देखते ही देखते सफी भारतीय प्रायद्वीप में जासूसी लेखन का सबसे बड़ा नाम बनकर उभरे | सिर्फ पाकिस्तान में ही नहीं अपितु भारत में भी इनके उपन्यास का बेसब्री से इंतजार किया जाता था और तो और इनकी प्रसिद्धि यूरोप तक होने लगी थी |

शायर से लेखक तक का सफ़र

इब्ने सफी ने तकरीबन 250 उपन्यास लिखे थे | इब्ने सफी इस बात को स्वीकारते है कि उनके 8-10 की उपन्यास का आईडिया यूरोपीय उपन्यासों से लेकर उसे स्वदेशी मिट्टी से रंगा था | इब्ने सफी शायर बनना चाहते थे मगर किस्मत को कुछ और मंजूर था | एक बार सफी ने अपने दोस्त से कहा कि ऐसे उपन्यास भी लिखे जा सकते है जिनमे सेक्स न हो मगर उनकी बिक्री बहुत हो | उनके दोस्त ने सफी को चुनौती दे दी कि यदि ऐसा है तो वे ही कुछ ऐसी किताब लिखकर दिखाये | इब्ने सफी ने चुनौती को दिल से स्वीकारा और इस तरह एक शायर  जासूसी उपन्यासों की दुनिया का सरताज बन गया |

यूरोप में इनके उपन्यास के दीवाने

इब्ने सफी के कलम का ही जादू था कि यूरोप में भी इनके दीवाने पैदा होने लगे | इनकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ गयी थी कि अंग्रेजी के साहित्यकार भी इब्ने सफी के नाम-काम से परिचित हो गए थे | अंग्रेजी भाषा की प्रसिद्ध लेखिका अगाथा क्रिस्टी ने कहा था कि “मुझे भारतीय उपमहाद्वीप में लिखे जाने वाले जासूसी उपन्यासों के बारे में पता है | मैं उर्दू नहीं जानती लेकिन मुझे पता है कि वहां एक ही मौलिक लेखक है और वो है – इब्ने सफी |”  जबकि इब्ने सफी अपने सफ़र के कुछ शुरुआती उपन्यासों को पूर्णरूप से मौलिक नहीं मानते थे | उनके लिखे  तकरीबन 250 उपन्यास में से 8-10 की कहानी यूरोपीय उपन्यासों से ली गई थी, जिसे देसी मिट्टी से लिपा गया था |

किताबो का ब्लैक में बिकना

1952 में इनका पहला उपन्यास आया था जिसका नाम दिलेर मुजरिम था | उस दौर में लोकप्रियता के मामले में चंद्रकांता संतति से अगर कोई होड़ ले सकता था तो वो थे इब्ने सफी |

उनके उपन्यास इतने प्रसिद्ध हुए थे कि अपने समय में इब्ने सफी अकेले ऐसे लेखक थे जिन्हें पढ़ने के लिए पाठक किताबें ब्लैक में खरीदते थे | हाल ही में उनकी लोकप्रियता को देखते हुए  हार्पर कॉलिन्स ने उनकी 13 किताबें पुनर्प्रकाशित किया हैं |

लेखन की विशेषता

जासूसी साहित्य के नाम पहले सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन हुआ करता था, फिर वो चाहे चन्द्रकान्ता संतति हो या फिर गहमरी जी के उपन्यास, अक्सर इन उपन्यासो में कोई बडा उद्देश्य नहीं छिपा होता था, अगर कुछ होता था तो सिर्फ मनोरंजन होता था | मगर इब्ने सफी के लेखन में देशप्रेम और काले कारनामों की हार को दिखाना ही इनकी उपन्यास की विशेषता हुआ करती थी | इब्ने सफी के उपन्यास कहानी के कसे हुए प्लॉट, मनोविज्ञान की गहरी पकड़ और भाषाई रवानगी के मामलों में अन्य उपन्यासो से कहीं बेहतर हुआ करते थे |

रचनाकाल

1952 से 1980 तक को इब्ने सफी का रचनाकाल माना जाता है | ये वो समय था जब विभाजन की त्रासदी के कारण हमारे देश या फिर पाकिस्तान के लिए भी सामाजिक-राजनैतिक दृष्टियों से बड़ा ही उथल-पुथल का समय था | भारत में पैदा हुए सफी उस वक़्त पाकिस्तान में रह रहे थे | अपने लेखन की लोकप्रियता बरकरार रखना उनका मकसद था, जिसे वो किसी सरहद से बांटना नहीं चाहते थे | उनके उपन्यासों में वर्णित तमाम जगहों के नाम काल्पनिक थे और इसलिए वे किसी एक देश की संपत्ति नहीं हुए |

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