जो डर गया समझो मर गया


शोले जैसी ‘सिनेमेटिक मास्टरपीस’ पर किताबें लिखी गई, समाजशास्त्रीय अध्ययन हुए और शोले व इसके जैसी अन्य फिल्मों के गहरे अर्थ ढूंढ़े गए ताकि पता लग सके कैसे ये फिल्में ‘अपने समय के मिजाज’ का दर्पण हैं | एक रिसर्च इस विषय पर भी होनी चाहिए कि क्या वजह थी कि नाकामयाब शोले को हमारी सबसे कामयाब हिंदी फिल्म का रुतबा मिल गया |

मील का पत्थर माने जाने वाली फिल्म शोले में अगर कुछ विशालकाय था तो वो था डाकू गब्बर सिंह का किरदार | फिल्म के लेखक सलीम-जावेद को जब पता चला की डाकू गब्बर सिंह के लिए किसी अपरिचित कलाकार को लिया जा रहा है तो वो इस बात से खफा थे क्योंकि सलीम-जावेद इस किरदार के लिए किसी अन्य कलाकार को लेना चाहते थे मगर कही डेट्स की समस्या, तो कई कलाकारों ने इस किरदार में दिलचस्पी नही दिखायी अत: निर्देशक रमेश सिप्पी ने लेखकों का विरोध दरकिनार करते हुए एक अनजान चेहरे को डाकू गब्बर सिंह का किरदार करने का मौका दिया | ये अनजान कलाकार और कोई नही एक्टर जयन्त के सुपुत्र अमजद खान थे और उनके गजब के  आत्मविश्वास ने ही गब्बर सिंह के किरदार को सिल्वर स्क्रीन पर जीवन्त कर दिया था | परन्तु जब शोले रिलीज़ की गयी थी तो फिल्म बुरी तरह से धराशाई हो गयी थी जिसका कारण अमजद खान पर्सनेलिटी व आवाज को माना जा रहा था |

यदि आज शोले फिल्म का नाम लिया जाए तो सबसे पहले गब्बर सिंह और उनका डायलाग ‘कितने आदमी थे?’ जहन में कौंध जाते है | लेकिन ये भी सच है कि जब फिल्म लगी थी तो दर्शकों ने एक समर्थ अभिनेता को नकार दिया था जबकि ये अभिनेता  फिल्म के दोनों नायकों (अमिताभ और धर्मेंद्र) को अपने सामने फीका कर रहा था | आज गब्बर सिंह के जिन संवादों पर हमेशा तालियां पड़ती हैं, लोग जिन संवादों को कॉपी करते है, उस समय अमिताभ और धर्मेंद्र के चाहने वाले ने सन्नाटे और रिजेक्शन के साथ गब्बर सिंह का स्वागत किया था |

दर्शकों को यह समझने कई दिन लग गये कि जिनके लिए वो उत्साहित हो रहे हैं वो जय-वीरू नही, बल्कि फिल्म का असली नायक गब्बर सिंह है | अनायास ही इस फिल्म की पब्लिसिटी ‘अपनी तरह का पहला खलनायक’ कहकर प्रचारित की जाने लगी और साथ ही साथ लोगो को फिल्म की दूसरी खूबियां जैसे  सिनेमेटोग्राफी, गाने, दोनों नायकों का कूल एटीट्यूड, बेहतरीन संवाद समझ आने लगे और फिल्म बन गयी मील का पत्थर | डाकू गब्बर सिंह का बोला गया डायलॉग “कितने आदमी थे” और “ जो डर गया समझो मर गया” आज भी गब्बर सिंह की उपस्थिति दर्ज कराते है |

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