परमवीर जोगिंदर सिंह चीनी सेना भी जिनका आज तक सम्मान करती है


आज कल फ़िल्मी जगत में एक खबर खूब चर्चाओ में है कि सूबेदार जोगिंदर सिंह बायोपिक के लिए गिप्पी ग्रेवाल ने पहले 10 किलो वजन कम किया तथा उसके बाद 25 किलो वजन बढ़ाया था | इस फिल्म में एक सैनिक का अदम्य साहस और एक किसान की जिंदगी देखने को मिलेगी | फिल्म अप्रैल 2018 में रिलीज होगी |

फिल्म में फीमेल लीड ‘सात उचक्के’, ‘लेडीज़ वर्सेज़ रिकी बहल’ जैसी फिल्मों में काम करने वाली अदिति शर्मा कर रही है | फिल्म के डायरेक्टर सिमरजीत सिंह के साथ फिल्म ‘अंगरेज़’ और ‘बाज़’ में अदिति उनके साथ पहले भी काम कर चुकी हैं | ‘प्यार तो होना ही था’ (1998), ‘राजू चाचा’ (2000), ‘ज़मीन’ (2003) जैसी हिंदी फिल्मों में सिमरजीत असिस्टेंट डायरेक्टर रह चुके हैं| फिल्म का फर्स्ट लुक लांच हो चुका है | फिल्म के प्रोड्यूसर सुमीत सिंह के अनुसार किसी भी पंजाबी फिल्म में इतनी बड़ी स्टारकास्ट नहीं दिखी, जितनी इस मूवी में है तथा इसका म्यूजिक भी भव्य है | फिल्म सूबेदार सिंह को ट्रिब्यूट है |

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फिल्म की शूटिंग कारगिल, द्रास, राजस्थान और असम में की गयी है | फिल्म के एक दृश्य को  14,000 फुट की ऊंचाई पर शूट किया गया, जिसके लिए एक्टर्स और क्रू को कई घंटों की पैदल या गाड़ी से यात्रा करनी पड़ती थी | मगर आज भी कई लोग ऐसे है जो शहीद सूबेदार जोगिंदर सिंह के बारे में ठीक तरीके से नहीं जानते, तो चलिए आज आपके ज्ञान में वृद्धि करते है –

इस कहानी की शुरुआत पंजाब से होती है

जिला फरीदकोट, पंजाब के एक गांव मेहला कलां में किसान शेर सिंह और बीबी कृष्ण कौर के घर में 26 सितंबर 1921 को जोगिंदर सिंह का जन्म हुआ था | मूल रूप से यह दम्पति होशियारपुर के मुनका गांव  से जुड़े हुए थे | जोगिंदर नाथू आला गांव की प्राइमरी स्कूल और फिर दरौली गांव की मिडिल स्कूल में पढ़े | बताया जाता है कि उनके पिता की ख़ुद की ज़मीन थी, फिर भी उनका परिवार बहुत समृद्ध नहीं था अत: उनकी पढ़ाई ठीक तरीके से नही हो पायी | जिसके चलते उन्होंने सोचा कि उनके लिए सेना से बेहतर स्थान कोई और नहीं हो सकता | 28 सितंबर 1936, इस दिन उन्होंने सिख रेजीमेंट में सिपाही के तौर पर अपनी जगह बना ली थी | सेना में भर्ती के बाद वे पढ़े, परीक्षाएं दीं और सम्मानित जगह बनाते हुए यूनिट के एजुकेशन इंस्ट्रक्टर के पद पर नियुक्त हुए | उनका विवाह कोट कपूरा के पास कोठे रारा सिंह गांव के सैनी सिख परिवार की बीबी गुरदयाल कौर से हुआ था |

कश्मीर की वादियों में

ब्रिटिश इंडियन आर्मी के लिए वे बर्मा जैसे मोर्चो पर लड़े तो भारत के आज़ाद होने के बाद 1948 में जब कश्मीर में पाकिस्तानी कबीलाइयों ने हमला किया तो वहां मुकाबला करने वाली सिख रेजीमेंट का हिस्सा भी रहे |

भारत-चीन युद्ध

अगस्त 1962, ये वो समय था जब चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने भारत पर हमला कर दिया और अक्साई चिन और पूर्वी सीमा (नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी) पर अपनी दावेदारी दिखाते हुए थगला रिज पर कब्जा कर लिया | 22 सितंबर, देश के रक्षा मंत्री वी. के. कृष्ण मेनन ने प्रधानमंत्री नेहरू की सहमति से थगला रिज से चीन को बाहर खदेड़ने के सेनाध्यक्ष को आदेश दिए |  भारतीय सेना की नई IV Corps ने इस असंभव काम के लिए टुकड़ियों को इकट्ठा किया, जबकि चीनी सेना ज्यादा नियंत्रण वाली स्थिति में थी |

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सिख बटालियन का चीन से आमना सामना

20 अक्टूबर, चीनी सेना ने नमखा चू सेक्टर और लद्दाख समेत पूर्वी सीमा के अन्य हिस्सों पर एक साथ धावा (Foray) बोल दिया और तीन दिन में ही बहुत सारी जमीन पर कब्जा कर लिया, जिसके परिणामस्वरूप धोला-थगला से भारतीय उपस्थिति को बाहर कर दिया | चीन की नज़र हमेशा से तवांग पर थी और अब उसे तवांग पर ही कब्जा करना था | चीन की तवांग तक पहुंचने से रोकने की जिम्मेदारी भारतीय सेना की पहली सिख बटालियन को दिया गया |

सूबेदार जोगिंदर सिंह की भूमिका

बमला इलाके में चीन ने अपनी सेना की एक पूरी डिविजन जमा करना शुरू किया क्योंकि यहाँ से तवांग पैदल जाने का एक रास्ता सिर्फ 26 किलोमीटर का था | दूसरी तरफ चीन के चुने गए बमला वाले रास्ते से 3 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में ट्विन पीक्स नाम की एक जगह थी, जहाँ पर से मैकमोहन लाइन तक चीन की हर गतिविधि पर नज़र रखी जा सकती थी | अब जो सवाल भारतीय सेना के सामने था वो ये कि बमला से ट्विन पीक्स तक पहुंचने से कैसे रोका जाये |

बमला से ट्विन पीक्स के बीच आईबी रिज नाम की एक महत्वपूर्ण जगह थी | पहली सिख बटालियन की एक डेल्टा कंपनी ने ट्विन पीक्स से एक किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में टॉन्गपेंग ला पर अपना बेस बनाया, जिसकी कमांड लेफ्टिनेंट हरीपाल कौशिक को दी गयी | डेल्टा कंपनी की 11वीं प्लाटून आईबी रिज पर तैनात थी जिसके कमांडर सूबेदार जोगिंदर सिंह थे | जबकि इस पलटन को तोपों और गोलाबारी से कवर देने के लिए 7वीं बंगाल माउंटेन बैटरी मौजूद थी |

सुबह सुबह भारतीय बंकरो पर हमला

20 अक्टूबर, सुबह तडके तडके में असम राइफल्स की बमला आउटपोस्ट के एक जेसीओ ने देखा कि सैकड़ों की तादाद में बॉर्डर के पार चीनी फौज जमा हो रही है। जिसकी जानकारी उसने तुरंत  11वीं प्लाटून को देकर उन्हें सावधान किया और जोगिंदर सिंह ने तुंरत हलवदार सुचा सिंह के नेतृत्व ने एक सेक्शन बमला पोस्ट के लिए रवाना (depart ) कर दिया | जिसके बाद उन्होंने अपनी कंपनी हेडक्वार्टर से ‘सेकेंड लाइन’ गोला-बारूद मुहैया कराने के आदेश दिए, जिसके बाद सब अपने-अपने हथियारों के साथ तैयार बैठ गये |

आजादी के दो दीवाने जो तो एकता की मिसाल

23 अक्टूबर, सुबह 4.30 बजे भारतीय बंकर नष्ट करने के लिए चीनी सेना ने मोर्टार और एंटी-टैंक बंदूकों का मुंह खोल दिया और 6 बजे उन्होंने असम राइफल्स की पोस्ट पर हमला बोल दिया | सुचा सिंह ने उनका मुकाबला किया परन्तु जल्द ही अपनी टुकड़ी के साथ आईबी रिज की पलटन के साथ आ मिले | सुबह की पहली किरण के साथ फिर चीनी सेना ने आईबी रिज पर आक्रमण कर दिया ताकि ट्विन पीक्स को हथिया लिया जाए |

सूबेदार सिंह की रणनीति

हिस्टोरियन एमपी अनिल कुमार, जो कि इंडियन एयरफोर्स के फ्लाइंग ऑफिसर भी रहे है, ने अपने एक लेख में सूबेदार सिंह का ज़िक्र करते हुए लिखा है कि जोगिन्दर ने वहां की भौगोलिक स्थिति को बहुत अच्छे से परखा तथा स्थानीय संसाधनों का बेहतरीन इस्तेमाल करते हुए आईबी रिज पर चतुर प्लानिंग के साथ बंकर और खंदकें बनाने का कार्य किया | सूबेदार की पलटन के पास सिर्फ चार दिन का राशन होने के साथ साथ उन सभी के जूते और कपड़े, सर्दियों और लोकेशन के हिसाब से अच्छे नहीं थे | रीढ़ में सिहरन दौड़ाने वाली हिमालय की ठंड में जोगिंदर ने अपने साथियों को प्रोत्साहित करने के साथ साथ अपना ध्यान केन्द्रित करने के लिए प्रेरित करने का काम भी किया |

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जैसा कि सूबेदार जोगिंदर सिंह को जानकारी थी कि चीनी फौज बमला से तीखी चढ़ाई करके आ रही है, तो वो खुद ज्यादा मजबूत आईबी रिज पर बैठे हैं | सिख पलटन अपनी पुरानी पड़ चुकी ली-एनफील्ड 303 राइफल्स से भी दुश्मन को कुचल सकते हैं, परन्तु उनके पास गोलियां कम थीं अत: उन्होंने अपने सैनिकों से कहा कि हर गोली का हिसाब होना चाहिए. जब तक दुश्मन रेंज में न आ जाए तब तक फायर रोक कर रखो उसके बाद चलाओ |

चीनी हमले का जवाब

जल्द ही इस फ्रंट पर लड़ाई शुरू हो गई और पहले हमले में करीब 200 चीनी सैनिक सामने थे, जबकि भारतीय पलटन बहुत छोटी सी थी | मगर कहा जाता है कि संख्या में कम होने के बावजूद जोगिंदर सिंह और उनके साथियों ने चीनी सेना के इरादों को पस्त कर दिया था | उनका जवाब इतना प्रखर था कि चीनी सेना को पहले छुपना औरउसके बाद पीछे हटना पड़ गया था | हालाँकि इसमें भारतीय पलटन को भी काफी नुकसान हुआ तथा बहुत सारे सैनिक भी घायल हो गए थे | इसके बाद जोगिंदर ने टॉन्गपेंग ला के कमांड सेंटर से और गोला-बारूद भिजवाने के लिए कहा, मगर 200 की क्षमता वाली एक और चीनी टुकड़ी फिर से एकत्रित हुई और एक बार फिर से आक्रमण कर दिया |

जोगिंदर सिंह को गोली लगी

इसी दौरान भारतीय पलटन की नजरों में आये बिना एक चीनी टोली ऊपर चढ़ गई, जिसके बाद  भयंकर गोलीबारी हुई और जोगिंदर को मशीनगन से जांघ में गोली लगी | एक बंकर में घुसने के बाद जोगिंदर ने खुद को पट्टी बांधी, परन्तु विपरीत हालात होने के बावजूद वो पीछे नहीं हटे और अपने साथियों को चिल्ला-चिल्ला कर निर्देश देते रहे | अपने गनर के शहीद होने के बाद उन्होंने 2-इंच वाली मोर्टार खुद सँभालते हुए कई राउंड दुश्मन पर चलाए | उनकी पलटन ने बहुत सारे चीनी सैनिकों को मार दिया था, परन्तु उनके भी ज्यादातर लोग मारे जा चुके थे या बुरी तरह घायल थे |

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बेयोनेट लेकर चीनी सैनिकों के दांत खट्टे किये

थोड़ी देर बाद एक बार फिर चीनी फौज की 200 सैनिकों की टुकड़ी इक्कठा हुयी और इस बार उनकी नज़र आईबी रिज पर थी | हिस्टोरियन अनिल कुमार के अनुसार डेल्टा कंपनी के कमांडर लेफ्टिनेंट हरीपाल कौशिक ने आने वाला खतरा भांपते हुए रेडियो पर संदेश भेजा जिसे रिसीव करके सूबेदार जोगिंदर सिंह ने ‘जी साब’ कहा, जो अपनी पलटन को भेजे उनके आखिरी शब्द थे | ज्यादा समय नहीं लगा जब उनकी पलटन के पास बारूद खत्म हो गया, परन्तु सूबेदार सिंह ने हार नहीं मानी और अपनी पलटन के बचे-खुचे सैनिकों को तैयार करते हुए एक आखिरी धावा शत्रु पर बोल दिया | बताया जाता है कि उन्होंने अपनी-अपनी बंदूकों पर बेयोनेट यानी चाकू लगाकर, ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ के नारे लगाते हुए चीनी सैनिकों पर हमला कर दिया और कईयों को मार गिराया था | परन्तु चीनी सैनिको की तादाद इतनी ज्यादा थी कि वो आते ही गये | बुरी तरह से घायल सूबेदार जोगिंदर सिंह को युद्धबंदी बना लिया गया, जबकि वहां से तीन भारतीय सैनिक बच निकले थे जिन्होंने जाकर कई घंटों की इस लड़ाई की कहानी बताई |

परमवीर चक्र

पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के बंदी के तौर पर ही कुछ समय बाद सूबेदार जोगिंदर सिंह की मृत्यु हो गई | उनके अदम्य साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत का सबसे ऊंचा वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र प्रदान किया गया |

दुश्मन आर्मी सम्मान से भर गई

जब चीनी आर्मी को पता चला कि सूबेदार सिंह को परमवीर चक्र का अलंकरण मिला है तो वे भी सम्मान से भर गए तथा पूरे सैन्य सम्मान के साथ चीन ने 17 मई 1963 को उनकी अस्थियां उनकी बटालियन के सुपुर्द कर दीं | उनका अस्थि कलश मेरठ में सिख रेजीमेंट के सेंटर लाया गया | अगले दिन गुरुद्वारा साहिब में उनकी श्रद्धांजलि सभा हुई | फिर एक सैरेमनी आयोजित की गई जहां पर वो कलश उनकी पत्नी गुरदयाल कौर और बेटे को सौंप दिया गया |

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