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बाबूलाल भुइयां की कुरबानी के मायने

1980 के दशक में कई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ी फ़िल्मों का निर्माण हुआ. मंजीरा दत्ता निर्मित ‘बाबूलाल लाल भुइयां की क़ुरबानी’ इनमे से एक है. 1987 में निर्मित यह फ़िल्म धनबाद के मैलगोरा नामक कसबे में बाबूलाल नामक एक अति गरीब के अपने स्वाभिमान के खातिर शहीद हो जाने की कहानी है. बाबूलाल भुइयां की कहानी आज के समय के सबसे तेज भागने वाले टेलीविज़न चैनलों के दौर में और भी महत्वपूर्ण बन जाती है क्योंकि यह किसी ख़ास घटना को तुरंत अपने कैमरे में कैद करने की हड़बड़ी नहीं बल्कि तसल्ली के साथ उसके सभी आयामों को समझाने की कोशिश है. बाबूलाल भुइयां और उसके संगी साथी कोयलरी से निकले मैले में से कोयला छानकर कोयला बनाने का काम करते हैं. हाड़तोड़ की मेहनत के बाद वे किसी तरह अपनी गुजर बसर कर पाते हैं. मैले में काम करने की वजह से ही शायद उनकी रिहाईश का नाम भी मैलगोरा है. अपनी रोजी रोटी के चक्कर में उनकी हर रोज फैक्टरी के सुरक्षाकर्मियों से झड़प होती. हर किसी जगह की तरह यहाँ के रखवाले सुरक्षाकर्मी आदतन मैलगोरा की औरतों से बदतमीजी की छूट लेते रहते हैं. हर रोज होते अपमान को बाबूलाल बर्दाश्त नहीं कर पाता और एक दिन उनकी बदतमीजियों का प्रतिवाद करता है. जैसा कि हमारे देश के हर इलाके के गरीब के साथ होता है. गरीब बाबूलाल सुरक्षाकर्मी की गोली का शिकार होता है और अपनी माँ –बहन की इज्जत बचाने के वास्ते मारा जाता है.

इस फिल्म से ही हमें पता चलता है कि कम्युनिस्ट पार्टी की स्थानीय इकाई बाबूलाल की याद में हर बरस शहीद मेला आयोजित करते हैं. फिल्म में शुरू से ही एक सवाल निर्देशिका बार –बार मैलगोरा के लोगो से पूछती हैं ‘बाबूलाल की कुर्बानी का क्या मतलब है ? कहीं उनकी शहादत बेकार तो नहीं गयी ?’

बाबूलाल की क़ुरबानी या उनकी शहादत बेकार गई या सार्थक रही इसका अंदाजा करना थोड़ी हड़बड़ी की बात होगी लेकिन मंजीरा दत्ता का उस घटना के कुछ वर्षों बाद जाकर बाबूलाल जैसे हाशिये के हाशिये पर रह रहे आम आदमी की कहानी को एक जिम्मेवार दस्तावेज बना एक जरुरी काम है जिसके लिए उनकी जितनी तारीफ़ की जाय कम है. आज भारत सरकार के कई लुभावने आंकड़ों और रपटों के बरक्स कोयले के मैल से अपनी जिन्दगी चलाते लोगों की कहानी को बिना किसी उत्तेजना के ईमानदारी रिकार्ड कर पेश करना ही एक बढ़ी हुई समझदारी की पहचान है. ऐसी ही पहचानों की वजह से हिंदुस्तान का दस्तावेजी सिनेमा आन्दोलन मजबूत हुआ है और आगे बढ़ा है.

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संजय जोशी

संजय जोशी

स्वतंत्र फ़िल्मकार और राष्ट्रीय संयोजक, प्रतिरोध का सिनेमा

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