खासखबर

यहाँ पर विधवा का जीवन जीती हैं सुहागन औरतें

क्या हुआ, किस सोच में पढ़ गए आप, यही सोच रहे हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है कि एक सुहागन भला विधवा का जीवन क्यों जीने लगी । चलिए आपकी इस बात का जवाब देते हैं | ये तो हम सभी जानते हैं कि भारत में बहुत सी परम्पराए हैं और अक्सर हमे ऐसी ही कोई परम्पराए सुनने को मिल जाती है, जो बड़ी अटपटी सी लगती है | ऐसी ही एक परम्परा पूर्वी उत्तरप्रदेश के गोरखपुर,  देवरिया और इससे सटे बिहार के कुछ इलाकों में गछवाह समुदाय से जुड़ी हुई हैं, जिसके अनुसार पति की सलामती के लिए पत्नी को विधवाओं जैसा जीवन व्यतीत करना पड़ता है ।

married-widows

गछवाह समुदाय के लोगो का व्यवसाय 50 फीट से ज्यादा ऊंचे ताड़ के पेड़ों से ताड़ी निकालना है । आपको बता दें कि ताड़ के पेड़ न सिर्फ ऊंचे बल्कि एकदम सपाट भी होते है, ऐसे में इन पेड़ों पर चढ़ना और फिर इनमे से ताड़ी निकालना किसी जोखिम से कम नहीं है । चार महीने ये लोग यही काम करते है यानी कि चैत मास से सावन मास तक गछवाह समुदाय के पुरुष यही कार्य करते हैं और इनकी पत्नियां जिन्हें यहाँ तरकुलारिष्ट के नाम से भी पुकारा जाता है, इस दौरान न तो मांग में सिन्दूर भरती है और ना ही किसी प्रकार का कोई श्रृंगार ही करती है। इस वक़्त यहाँ की सभी सुहागने अपने पति के सकुशल घर लौटने के लिए तरकुलहा देवी के पास अपनी सभी सुहाग की निशानी वहां रख अपने पति के लिए प्रार्थना करती है |

tadi-drink-1459584565

अब आपके मन में सवाल आया होगा कि ये तरकुलहा देवी कौन सी देवी है | दरअसल गछवाहों कि इष्ट देवी का नाम तरकुलहा देवी है, जिसका मंदिर गोरखपुर से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सिर्फ गछवाहों ही नहीं बल्कि अन्य हिन्दु समुदाय का भी ये एक धार्मिक स्थल है। आपको बता दे कि  तरकुलारिष्ट चैत्र महीने में आने वाली राम नवमी से सावन में मनाये जानी वाली नागपंचमी तक, सुहागन होने के बावजूद विधवा जैसा जीवन यापन करती हैं ।

3333

चार माह के अन्तराल के बाद जब गछवाह वापस आते है तो सब लोग नाग पंचमी के दिन तरकुलहा देवी के मंदिर में एकत्र होते हैं और देवी की पूजा करने के बाद अपनी पत्नियों की मांग भर एक बार फिर उन्हें सुहागन कर देते हैं | इस दौरान यहाँ सामूहिक गोठ का आयोजन और पशु बलि भी दी जाती है ।

हालाँकि गछवाहों ने इस परम्परा को कब अपनाया इस बात का कोई साक्ष्य अभी तक मौजूद नहीं है |  जबकि इन लोगो के अनुसार वो अपने पूर्वजो से इस परम्परा के बारे में सुनते आये है | हिन्दू धर्म में किसी महिला के द्वारा अपने सुहाग चिह्न को छोड़ना अपशुगन की निशानी मानी जाती है मगर यहाँ के लोग इसे शुभ मानते है ।

 

यहां जलती चिताओं के बीच नृत्य करती हैं बार बालाएं

लोगों के अंधविश्वास के चलते ये सांप पहुंच गया विलुप्ति की कगार पर

एक ऐसा आश्रम जहां पत्नियों से सताए पति करते हैं निवाास

क्यों नहीं पीना चाहिए हल्दी वाला दूध

 

 

 

Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए khulasaa.in को फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें
Title: suhagan women live here widows life

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *