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एडविना माउंटबेटन और जवाहरलाल नेहरू के बीच का रहस्य

शायरों ने कहा है कि इश्क वो आतिश है, जो लगाए न लगे और बुझाये न बुझे और मानो ग़ालिब जी ने तो आशिको की परिस्थिति को हु-ब-हु लिख दिया हो “ये  इश्क  नहीं  आसां , इतना  तो  समझ  लीजिये, एक  आग  का  दरिया  है , और  डूब  के  जाना  है” सच ही तो है कोई नही जानता कि कब, किससे और कहाँ प्यार हो जाए | भारत के इतिहास में भी एक ऐसी ही प्रेम कथा दफ़न है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते है |

बात 1947 यानि के आज़ादी के बाद के हिंदुस्तान की है, जिसके मुकद्दर का फैसला लंदन में लिया जा चुका था और दूसरी तरफ पंजाब और पूर्वी बंगाल में दंगों के रूप में मानवता शर्मसार हो रही थी | महात्मा गांधी इन दंगो को रोकने की पूरी कोशिश में लगे हुए थे तो सरदार पटेल सारे राजा-महाराजाओं को आने वाली परिस्थितियों से लड़ने के लिए तैयार कर रहे थे | मगर ऐसी परिस्थितियों में भी दो दिलचस्प और समझदार लोग ऐसे भी थे जिनका प्यार इस वक़्त परवान पर था | वो दो लोग थे - आज़ाद हिंदुस्तान के पहले प्रधानमंत्री और दूसरा इस नए मुल्क के पहले गवर्नर जनरल की पत्नी एडविना माउंटबेटन थी |

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कहते है इश्क की कोई उम्र नही होती, इस प्रेम कहानी में भी कुछ ऐसा ही है | जब ये प्रेम कहानी शुरू हुयी उस वक़्त जवाहरलाल नेहरू की उम्र 58 और एडविना की उम्र 47 साल थीं | नेहरू की पत्नी कमला कौल उनका साथ जल्द ही छोड़कर स्वर्ग सिधार गयी थी | नेहरू ने खुद भी स्वीकार किया है कि वो अपने वैवाहिक जीवन से खुश नही थे जिसका एक कारण ये भी हो सकता है कि जहाँ कमला एक सीधी-सादी कश्मीरी लड़की थीं तो दूसरी तरफ नेहरू की ज़िन्दगी शान-ओ-शौकत में बीती थी, ऐसे में मानसिक मतभेद होना लाज़मी था | कमला कौल की मौत के बात जहाँ नेहरु अकेले थे तो दूसरी ओर एडविना और डिकी के बीच में भी सिर्फ दोस्ताना सम्बन्ध ही रह गये थे | नेहरु से पहले भी एडविना कुछ रिश्ते इंग्लैंड में चर्चा का विषय रहे | जब लॉर्ड माउंटबेटन उर्फ़ डिकी हिंदुस्तान के वायसराय बनकर भारत आ रहे थे तो एडविना ने साथ आने से साफ़ मना कर दिया था | मगर भाग्य ने कुछ और ही सोच रखा था |

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डिकी और एडविना दोनों ही पंडित नेहरू की शख्सियत से अत्याधिक प्रभावित थे, जिसका फायदा हिंदुस्तान के विभाजन के वक्त नेहरू को मिला | इस विभाजन में एडविना ने एक अहम भूमिका तब निभाई जब बात कश्मीर पर आकर रूकी | एडविना अपनी बात मनवाने के लिए नेहरू को मशोबरा ले गयी थी | दोनों पहले भी मशोबरा जा चुके थे मगर इनका रिश्ता इस मुलाकात के बार और गहरा हो गया | मशोबरा की सैर में डिकी और बेटी पामेला भी उनके साथ थे | ये सब लॉर्ड माउंटबेटन की नजरो के सामने ही हो रहा था, क्योंकि ये रिश्ता भारत के  विभाजन को आसान बना रहा था, जो वो चाहते ही थे | लॉर्ड माउंटबेटन का मानना था कि नेहरू के लिए एडविना उन्हें कभी छोड़ नहीं सकतीं इसलिए कहीं न कहीं वे इसे बढ़ावा भी दे रहे थे |

माउंटबेटन एडविना को हर हाल में खुश देखना चाहते थे जबकि एडविना कई बार तलाक लेने की धमकी दे चुकी थी, मगर माउंटबेटन हर बार वे कुछ ऐसा कर जाते थे कि एडविना  मान जाती | माउंटबेटन एडविना को छोड़ भी नहीं सकते थे क्योंकि उनका रिश्ता उनकी तरक़्क़ी का रास्ता भी था |

नेहरु देश- विदेश में जहां भी जाते वहां से एडविना के लिए तोहफ़े जरुर लाते थे | नेहरु ने  इजिप्ट से लायी गयी सिगरेट, सिक्किम से फ़र्न - एक तरह का पौधा, और एक बार उड़ीसा के सूर्य मंदिर में उकेरी हुई कामोत्तेजक तस्वीरों की किताब तक दी थी | माउंटबेटन जब  हिंदुस्तान छोड़कर जा रहे थे तो उससे एक दिन पहले भारत सरकार ने उनके सम्मान में डिनर का आयोजन किया था |  खाने के बाद जवाहर लाल नेहरू ने एडविना के सम्मान में एक भाषण दिया जो उनकी मोहब्बत की गहराई को साफ़ तौर पर दर्शाता है, भाषण पूरा करते वक़्त नेहरु फूट फूटकर रोने लगे तो दूसरी तरफ एडविना भी रोने लगी थी |

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21 जून 1948 की शाम, मानो जैसे नेहरू के जीवन सबसे उदास दिन | छह घोड़े की बग्गी में सवार डिकी और एडविना भारत से विदाई ले रहे थे | मगर जैसे किसी घोड़े ने नेहरु की मनोदशा को समझ लिया हो, उसने आगे चलने से मना कर दिया | विदाई को देखने आये लोगों में से किसी ने चीख कर कहा, ‘ये घोड़े भी नहीं चाहते की आप लोग यहां से जाएं|’ मानो लोग नेहरु के मन की बात कह रहे थे, पर ऐसा हुआ नहीं | एडविना हिंदुस्तान से जाने के बाद कई बार हिंदुस्तान आयी और जब भी नेहरू जब भी इंग्लैंड गये माउंटबेटन परिवार के परिवार से जरूर मिले | डिकी कुछ ऐसे हालात पैदा कर देते थे कि नेहरु ज्यादा से ज्यादा वक़्त एडविना की सोहबत गुजार सके |

एक बार एडविना नेहरू के साथ नैनीताल (पूर्व में उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा था ) गयीं थी | एक शाम दोनों आलिंगन में बंधे हुए थे कि तभी वहां उत्तरप्रदेश के गवर्नर होमी मोदी का बेटा रुसी मोदी, जो उन्हें शाम के भोजन के लिए आमंत्रित करने आया था, पहुँच गया, उसने ये नज़ारा देखा | उसके बाद तो राजनितिक गलियारो में यह आम वाक्या हो गया कि ‘अगर राम के दिल में झांक कर देखें तो सीता मिलेंगी और नेहरू के दिल में अगर झांका तो एडविना...’

इस रिश्ते की वजह से नेहरू का तो राजनैतिक जीवन ही दांव पर लग गया था,  तब एडविना ने अपनी बुद्धि का सदप्रयोग करते हुए नेहरू को कर्तव्य को प्राथमिकता देने की सलाह दी और हमेशा के लिए नेहरु को अलविदा कह दिया |

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एक बार एडविना बहुत बीमार हुयी और उन्हें लगा कि वो नही बचेंगी, तब ऑपरेशन से पहले उन्होंने डिकी को नेहरु के लिखे सभी ख़त दे दिए और वादा लिया कि यदि उन्हें कुछ हो जाता है तो इन खतों से वो नेहरु और मेरे रिश्ते को समझ सकते है, परन्तु डिकी ने वादाख़िलाफ़ी की और ख़त पहले ही पढ़ लिए | एडविना को कुछ नहीं हुआ, वो सही-सलामत बाहर आ गयी और उन ख़तों को पढ़ने के बाद भी डिकी उऩके साथ उतने ही सौम्य और समझदार बने रहे जैसे वे हमेशा थे | लेकिन इस घटना के कुछ समय बाद ही दिल का दौरा पड़ने के कारण एडविना ने आखिरी सांस ली, वो दिन 21 फ़रवरी 1960  का था और घडी में सुबह के 7:30 बजे थे |

दुनिया की सबसे अमीर महिलाओं में से एक के पास अंतिम समय में अगर कुछ था तो बस नेहरू के लिखे हुए ख़त जो उनके लिए सबसे बड़ी दौलत थी | एडविना की अंतिम इच्छा  के अनुसार उन्हें समुद्र में दफ़नाया गया था | इंग्लैंड के जहाज़ ‘एचएम्एस वेकफुल’ ने इस काम को अंजाम दिया था और अपने प्यार को अंतिम विदाई देने के लिए नेहरू ने हिंदुस्तानी जहाज़ ‘त्रिशूल’ को गेंदे के फूलों से बने पुष्पचक्र के साथ  वहां भेजा था | भारत के इतिहास में यह एक गरिमामय प्रेम कथा थी |

ऐसा कहा जाता हैं कि उन दोनों के रिश्ते को विभाजन में अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की सलाह मोहम्मद अली जिन्ना को किसी ने दी थी, जिसका जवाब जिन्ना ने यह दिया कि यह उन दोनों का निजी मामला है और वे इसका राजनैतिक इस्तेमाल नहीं करेंगे | मगर तब की बात कुछ और ही थी, अब न तो ऐसे लोग रहे और न ऐसी राजनीति रही |

अजीब इत्तेफ़ाक है कि नेहरू का जन्म 14 नवंबर तथा एडविना का 28 नवंबर को हुआ था व दोनों की मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से हुई थी | एक सरफ़िरे ने महात्मा गाँधी जी की गोली मारकर हत्या कर दी थी और आयरलैंड की आतंकवादी पार्टी आईआरए ने लुइस माउंटबेटन की नाव को बम से उड़ा दिया था |

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Title: the secret between edwina mountbatten and jawaharlal nehru

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