सूरजमुखी उगा कर बनें सुखी


पूसा के कृषि विज्ञान मेले में किसानों की मेहनत पर गदगद हो कर कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा था कि दुनिया के भूखे लोगों का पेट हमारे किसान भर रहे हैं और यह बात सच भी है। गेहूं, चावल और कपास के मामले में हम ने पिछले 1 दशक में काफी तरक्की की है। इन चीजों को हम दूसरे देशों को निर्यात कर रहे हैं। लेकिन खाने में इस्तेमाल होने वाले तेल के मामले में अभी हम दूसरे देशों पर निर्भर हैं।
हालांकि इस मामले में सरसों पर काफी काम हो रहा है, लेकिन अकेले सरसों के भरोसे हम खाद्य तेल की मांग को पूरा नहीं कर सकते हैं। ऐसे में जरूरी है कि तेल वाली दूसरी फसलों जैसे पाम, सूरजमुखी, तिल, सोयाबीन वगैरह को भी बढ़ावा दिया जाए।
सूरजमुखी बहुत ही गुणकारी खाद्य तिलहन है। इस की पैदावार भी अधिक होती है और इस का तेल बहुत अच्छा होता है।
सूरजमुखी की कारोबारी खेती कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में होती है। यहां देश के 90 फीसदी से ज्यादा क्षेत्र में इस की फसल होती है और 80 फीसदी उत्पादन होता है। वसंत व रबी के मौसम में पंजाब, हरियाणा, बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में इस की कारोबारी खेती होती है।
साल 2012-13 में भारत में 7.20 लाख हेक्टेयर रकबे पर सूरजमुखी की फसल उगाई गई और इस की कुल पैदावार 805 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रही थी। खरीफ के मौसम में तकरीबन 33 फीसदी इलाके में सूरजमुखी की फसल होती है और बाकी रबी और बसंत के मौसम में होती है। नई तकनीकों को अपनाने से देश में 15 सौ किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से भी अधिक की उत्पादन क्षमता बढ़ने की संभावना है।
यहां हम सूरजमुखी की फसल की खेती के बारे में वैज्ञानिक जानकारी दे रहे हैं।
सूरजमुखी की खेती खरीफ, रबी और जायद तीनों ही मौसम में की जा सकती है। लेकिन खरीफ में इस पर बीमारी व कीटों का हमला ज्यादा होने के कारण फूल छोटे रह जाते हैं और दाना कम पड़ता है। जायद में सूरजमुखी की अच्छी पैदावार होती है। इस कारण ज्यादातर किसान जायद में ही इस की खेती करते हैं। चूंकि फसल पकते समय गरम मौसम की जरूरत पड़ती है, इसलिए जायद सीजन सूरजमुखी के लिए सब से मुफीद है।
इस की खेती अम्लीय और खार वाली मिट्टी को छोड़ कर सिंचाई की सहूलियत वाली सभी तरह की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन दोमट मिट्टी सब से अच्छी मानी जाती है।
इस में 2 तरह की किस्में पाई जाती हैं एक तो सामान्य या संकुल, इस में मार्डन और सूर्य किस्में हैं। दूसरी है संकर प्रजातियां इन में केबीएसएच 1, एसएच 3322 और एफएसएच 17 किस्में हैं।
खेत की तैयारी करते समय जायद के मौसम में नमी न होने पर खेत का पलेवा कर के जुताई करनी चाहिए। एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और बाद में 2-3 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से कर के मिट्टी भुरभुरी कर लेनी चाहिए।
जायद में सूरजमुखी की बोआई का सब से अच्छा समय फरवरी महीने का दूसरा पखवारा है। इस समय बोआई करने पर मई के आखिर या जून के पहले हफ्ते तक फसल पक कर तैयार हो जाती है। अगर देर से बोआई की जाती है तो फसल पकने पर बरसात शुरू हो जाती है और दानों का नुकसान हो जाता है। बोआई लाइनों में हल के पीछे 4-5 सेंटीमीटर गहराई पर करनी चाहिए। लाइन से लाइन की दूरी 45 सेंटीमीटर और पौध से पौध की दूरी 15-20 सेंटीमीटर रखनी चाहिए।
बीज की मात्रा किस्मों के मुताबिक अलग-अलग होती है। संकुल या सामान्य प्रजातियों में 12 से 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज लगता है और संकर प्रजातियों में 5-6 किलोग्राम बीज लगता है। अगर बीज का जमाव 70 फीसदी से कम हो तो बीज की मात्रा बढ़ा कर बोआई करनी चाहिए। बीज को ढाई ग्राम थीरम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करना चाहिए। बोआई से पहले बीज को रात में 12 घंटे भिगो कर सुबह 3-4 घंटे छाया में सुखा कर शाम 3 बजे के बाद बोआई करनी चाहिए।
उर्वरकों का इस्तेमाल मिट्टी जांच के आधार पर ही करना चाहिए। फिर भी 80 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल करें। नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बोआई के समय कूंड़ों में डालनी चाहिए, नाइट्रोजन की बाकी मात्रा बोआई के 25-30 दिन बाद देनी चाहिए। अगर सूरजमुखी को आलू की फसल के साथ बोया जाता है तो 20-25 फीसदी उर्वरक की मात्रा कम की जा सकती है। आखिरी जुताई में खेत तैयार करते समय 3 सौ क्विंटल सड़ी गोबर की खाद डालना सही रहता है।
पहली सिंचाई बोआई के 20-25 दिनों बाद करनी चाहिए, फिर जरूरत के मुताबिक 10-15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करें, इसे 5-6 सिंचाइयों की जरूरत पड़ती है। फूल निकलते समय और दाना भरते समय हल्की सिंचाई करें, ध्यान रखें कि पौधे जमीन में गिरने न पाएं, क्योंकि जब दाना पड़ जाता है तो पौधे पर वजन आ जाता है जिस से वह गिर सकता है।
बोआई के 20-25 दिनों बाद पहली सिंचाई के बाद ओट आने के बाद निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। केमिकलों द्वारा खरपतवार खत्म करने के लिए पेंडीमिथलीन 30 ईसी की 3.3 लीटर मात्रा 8 सौ लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के 2-3 दिन के अंदर छिड़काव करना फायदेमंद रहता है।
सूरजमुखी का फूल बहुत ही बड़ा होता है। इस से पौधा गिरने का डर बना रहता है। इसलिए नाइट्रोजन की टौपड्रेसिंग करने के बाद एक बार पौधों पर 10-15 सेंटीमीटर मिट्टी चढ़ाना जरूरी होता है।
सूरजमुखी एक परपरागण फसल है। इस में परपरागण बहुत जरूरी है। अगर परपरागण नहीं हो पाता तो पैदावार कम हो जाती है। इस में परपरागण भवरों, मधुमक्खियों व हवा के द्वारा होता रहता है। फिर अच्छी पैदावार के लिए फूल अच्छी तरह खिलने के बाद हाथ से दस्ताने पहन कर या रोएंदार कपड़ा ले कर फूलों पर चारों ओर धीरे से घुमा देने से परपरागण हो जाता है। यह काम सुबह 7-8 बजे के बीच में कर देना चाहिए।
अंतः फसलंेः सूरजमुखी के साथ में और फसलें उगा कर मुनाफे को बढ़ाया जा सकता है। इस को अंतः फसलों में तूर सूरजमुखी सूरजमुखी-मूंगफली, सूरजमुखी-सोयाबीन बोना बहुत ही लाभदायक होता है।

Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए khulasaa.in को फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें


श्री राम शर्मा

श्री राम शर्मा

पत्रकारिता की शुरुआत दैनिक हिन्दुस्तान अख़बार से की। करीब 5 साल हिन्दुस्तान में सेवाएं देने के बाद दिल्ली प्रेस से जुड़े। यहां प्रतिष्ठित कृषि पत्रिका फार्म एन फूड में डिप्टी एडिटर के तौर पर करीब 8 साल काम किया। खेती-किसानी के मुद्दों पर देश के विभिन्न हिस्सों की यात्राएं करते हुए तमाम लेख लिखे। वे ऑल इंडिया रेडियो से भी जुड़े हुए हैं और यहां भी खेती-किसानी की बात को विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से प्रमुखता से उठाते रहते हैं। वर्तामान में डीडी न्यूज दिल्ली से जुड़े हुए हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *