भूमि की उत्पादकता बढ़ाने के लिए कंपोस्ट खाद जरूरी


बचपन से हम पढ़ते आ रहे हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। यह एक वाक्य ही सिद्ध करता है कि भारत में खेती की परंपरा हजारों वर्ष पुरानी और काफी समृद्ध है। इतने प्राचीन काल से खेती करने के कारण देश में खेती का जो तौर तरीका विकसित हुआ था, वह न केवल वैज्ञानिक था, बल्कि भूमि, पशु और मनुष्य तीनों का पोषण करता था। परंतु दुर्भाग्यवश अंग्रेजों से स्वाधीनता मिलने के बाद देश में जो हरित क्रांति की गई, उसमें देश के इस पारंपरिक ज्ञान की उपेक्षा की गई। कृषि को पशुपालन से तोड़कर उसे मशीनों से जोड़ा गया और उत्पादन बढ़ाने के लिए रसायनों के उपयोग को प्रोत्साहित किया गया। परिणाम यह हुआ कि मात्र चार दशकों में ही खेतों की उत्पादकता में कमी आने लगी है और उपजाऊ खेत भी बंजरता की ओर बढ़ने लगे हैं। ऐसे में सबसे अधिक समस्या किसान को हो रही है। खेती से आय तो होना दूर कहा, कृषि अदानां यथा खाद, कीटनाशक और डीजल आदि के खर्च के लिए उसे कर्ज लेना पड़ रहा है और जिसे चुकता न कर पाने के कारण किसान-आत्महत्या की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। एक ओर सरकार बजट पर सब्सिडी के बढ़ते बोझ का रोना रो रही है, दूसरी ओर जिनके नाम पर सब्सिडी दी जा रही है, वे किसान आत्महत्या के लिए विवश हैं। फिर से भारत के उस प्राचीन ज्ञान का उपयोग किया जाए जो हजारों वर्ष से अनुभूत है।

टर्फ घास का बढ़ता कारोबार हरित उद्योग

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भारत की खेती की प्राचीन परंपरा कहती है कि किसान को खेती करने के लिए बाजार से कुछ भी खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। हालांकि आज के दौर में यह असंभव जैसा जान पड़ता है परंतु यह न केवल संभव है, बल्कि भूमि, पशु और मनुष्य तीनों के लिए लाभकारी है। अनेक सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओं ने जुताई के लिए बैल चालित ट्रैक्टर का निर्माण किया है जो न केवल बैलों की क्षमता को तीन गुणा बढ़ा देता है, बल्कि डीजल के रूप में लगने वाले ईंधन की भी बचत करता है। प्रदूषणमुक्त तो यह है ही, साथ ही किसान के पास गाय-बैलों की संख्या बढ़ने से वह अपने खेत में ही कंपोस्ट खाद बना सकता है। कंपोस्ट खाद भूमि की उत्पादकता को बढ़ाने का सर्वोत्तम ही नहीं, एक मात्र विकल्प है। यह तो आज खाद निर्माता कंपनियों ने भी स्वीकार कर लिया है कि यूरिया और डीएपी आदि मिट्टी की गुणवत्ता व उत्पादकता को नहीं बढ़ा सकते। वे केवल एकाध पोषक तत्वों की कमी पूरी कर क्षणिक तौर पर उपज बढ़ा सकते है, परंतु भूमि की उत्पादकता बढ़ाने के लिए कंपोस्ट खाद डालना ही होगा।

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कंपोस्ट खाद से लाभ
1. आर्थिकः
(क) किसान का रासायनिक खाद पर होने वाला खर्च बचेगा।
(ख) हर एक पशु से किसान को कई हजार रुपयों की खाद प्राप्त होगी।
(ग) लोगों को अतिरिक्त काम मिलने से गरीबी और बेकारी का अभिशाप मिटेगा। फसल दुगुनी तिगुनी बढ़ेगी।

2. भूमिरक्षाः भूमि को संतुलित पोषण मिलने से उसकी उर्वरा-शक्ति बढ़ेगी। जमीन का कटाव कम होगा। जमीन में पानी-संग्रह बढ़ेगा। रासायनिक प्रदूषण मिटेगा।
3. आरोग्यः मानव, पशु, भूमि, जीवाणुओं को सुरुचिपूर्ण, टिकाऊ, स्वास्थ्यदायी आहार मिलेगा। कम्पोस्ट में कूड़ा-करकट, मूलमूत्र आदि का उपयोग हो जाने से गांव में सफाई रहेगी। वायु, जल, भूमि प्रदूषणमुक्त होंगे।

4. स्वावलंबनः देश रासायनिक खाद कम्पनियों के चंगुल से मुक्त होगा। किसान, खाद खुद बनाने से, व्यापारी के शोषण से बचेगा। घर-घर भोजन बनने के समान ही हर खेत पर खाद बनेगी।
5. सांस्कृतिकः बूढ़े पशु भी लाभप्रद बनेंगे। हमारी बचपन से सेवा करने वाले गोवंश का कत्ल रूक सकेगा।
6. सर्वजन सुलभः कोई भी स्त्री-पुरुष कंपोस्ट खाद आसानी से बना सकती है। यंत्र या बाजारू कच्चे माल की जरूरत नहीं। पूंजी बड़े कल-कारखानों की आवश्यकता नहीं। गोबर व कचरा निरंतर मिलने से यह खाद निरंतर बन सकेगा।

कंपोस्ट खाद बनाते समय ध्यान रखने की बातें
1. जहां खेत हो वहीं पर खाद बनाये इससे ढोने के अनावश्यक श्रम और समय की बचत होगी।
2. बारिश के पानी का बहाव खाद में न आनेवाली जगह का चुनाव करें।
3. कंपोस्ट बनाने के लिए यथासंभव पेड़ की छांव वाली जगह का चुनाव करें।
4. कचरा मोटा या अधिक लंबाई वाला हो तो उसके छोटे टुकड़े करें।
5. कचरा विविध प्रजाति का हो तो खाद में विविध तत्त्व आयेंगें। उसमें कुछ सूखा, कुछ हरा हो तो खाद जल्दी बनेगी।
6. गेहूं के जैसा धाप बैठने वाला कचरा हो तो उसके साथ दूसरा कचरा मिलायें।
7. खाद बनाते समय कचरा बहुत ढीला या सख्त न रहे। उस पर हल्का दबाव डालकर उसे समस्त करें।
8 बबूल के बीज या गाजर-घास के बीज उसमें न हों। कंकड़, टीन, रबड़, प्लास्टिक के टुकड़े अलग किये जायें।
9. कंपोस्ट की क्रिया जल्द शुरू होने के लिए पुरानी अधपकी खादें भी मदद करेगी। जैसे दूध का दही जमाने में जामन काम करता है।
10. कंपोस्ट के हौद के सिर को गोबर-मिट्टी से सील करें। आठ दिन के बाद इसकी जांच करें कि उसका तापमान बढ़ा है या नहीं। इसके लिए लोहे की एक नुकीली सलाख उसमें पांच मिनट गाड़कर रखें और बाहर निकालकर देखें कि वह गरम हुई या नहीं। वह ठंडी रही तो समझना चाहिए कि कहीं गलती हुई है। फिर से उसे खोलकर नए सिरे से वैज्ञानिक ढंग से उसकी भराई करें।
11. कंपोस्ट की जमीन के उपर बनायी हौदी या टंकी या कठघरा बनाते समय उसकी चौड़ाई की बाजु हवा की दिशा में रखें। लंबाई बहने वाली हवा की दिशा में रखेंगे तो गरम हवा की मार से नमी जल्दी सूख जाएगी और बीच बीच में पानी डालने का काम बढ़ेगा।
12. खाद बनने में 105 से 120 दिन लगते हैं। खरीफ की बुवाई के समय और रबी की बुवाई के समय ताजी खाद मिले, इस तरह सालभर में दो बार खाद बनाने की समय सारिणी (टाइमटेबल) बनायें।
13. रवानुमा दाना, मिट्टी की सुंगध और भूरा- सुनहरा रंग, खाद पकने के ये तीन लक्षण हैं।
14. बीस-पच्चीस फीसदी खाद अधपकी रहती है, उसे चलनी से छान लें। अधपकी खाद का अगले समय के लिए खाद बनाने में इस्तेमाल करें।
15. छानकर निकली खाद छांव में रखें। अधिक दिन रखना हो तो नमी बने रहने के लिए ऊपर थोड़ा पानी छिड़कें।

 

 

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श्री राम शर्मा

श्री राम शर्मा

पत्रकारिता की शुरुआत दैनिक हिन्दुस्तान अख़बार से की। करीब 5 साल हिन्दुस्तान में सेवाएं देने के बाद दिल्ली प्रेस से जुड़े। यहां प्रतिष्ठित कृषि पत्रिका फार्म एन फूड में डिप्टी एडिटर के तौर पर करीब 8 साल काम किया। खेती-किसानी के मुद्दों पर देश के विभिन्न हिस्सों की यात्राएं करते हुए तमाम लेख लिखे। वे ऑल इंडिया रेडियो से भी जुड़े हुए हैं और यहां भी खेती-किसानी की बात को विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से प्रमुखता से उठाते रहते हैं। वर्तामान में डीडी न्यूज दिल्ली से जुड़े हुए हैं।

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