खुश रहना चाहती हैं तो समय के साथ खुद को बदलते रहिए


आजकल के लोगों में तो नैतिकता और संस्कार जैसी चीजें हैं ही नहीं। यह वक्तव्य आप कभी-कहीं भी सुन सकती हैं। जाने-अनजाने कई बार खुद भी बोल जाती होंगी। कुछ इस भाव से गोया आप खुद न तो आजकल वाली परिधि में हैं और न ही इस पृथ्वी पर। याद करें तो पाएंगी कि जब आप छोटी थीं, यानी जबसे आपने दुनिया को समझना शुरू किया तब से ही अपने बडे-बुजुर्गो से यह सुनती आ रही हैं। अब आप खुद यही कहने लगी हैं। आगे अगर आपकी अगली पीढी भी ऐसा कहे तो कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए। क्या कभी आपने सोचा है कि आजकल यानी अपने समय के लोगों और मान्यताओं को जब आप कोसती हैं तो किसे कोस रही होती हैं? दरअसल इस तरह आप अपने समय को कोस रही होती हैं। यह जानते हुए भी कि बीता हुआ कल अब आपके हाथ में नहीं है और आने वाला कल आपके वश में नहीं है। आपके हिस्से में जो है वह सिर्फ आज है। फिर वर्तमान को कोसने की यह प्रवृत्ति क्यों?

समय की गति को समझें

इसमें कोई दो राय नहीं कि मौजूदा दौर में जहां एक तरफ बहुत कुछ अच्छा हो रहा है, वहीं बहुत कुछ ऐसा भी हो रहा है जो नहीं होना चाहिए। लेकिन ऐसा कब नहीं होता रहा है? अच्छाई और बुराई दोनों का अस्तित्व हमेशा रहा है और दोनों के बीच जंग भी हमेशा से चली आ रही है। फिर ऐसा क्यों कहा जाता है? जाहिर है, इसके मूल में हताशा होती है। हताशा अपने समय, अपनी स्थितियों और इससे भी ज्यादा अपनी उपलब्धियों व क्षमताओं के प्रति। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि हताशा के इस घटाटोप के मूल में क्या है?

नई दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल में मनोचिकित्सक डॉ. अनु गोयल के अनुसार, ज्यादातर लोगों की विफलता की सबसे बडी वजह अपने समय को न समझ पाना होता है। अगर हम अपने समय को ढंग से समझेंगे ही नहीं, तो उसके अनुरूप कोई फैसला भी कैसे लेंगे? ऐसे ज्यादातर फैसले आउटडेटेड साबित होते हैं। फिर लोग अपनी विफलता के लिए समय को ही जिम्मेदार ठहराने लगते हैं। जबकि अगर वह अपने समय के साथ चलना सीख लें तो उन्हें कतई नकारात्मक सोच का शिकार नहीं होना पडेगा। बेहतर यही है कि अतीत के झूठे मोह में फंसे रहने के बजाय अपने समय की गति को समझें और स्वयं को उसके अनुरूप ढालें।

नए चलन से परहेज क्यों

अतीतमोह का संकट सबसे ज्यादा परंपरागत मूल्यों के संबंध में है। यह मूल्य चाहे नैतिक हों, या सामाजिक या फिर हमारे अपने-अपने घरों के सांस्कृतिक तौर-तरीके ही क्यों न हों। जहां कुछ बुजुर्ग अपने समय की मुश्किलों से तुलना करते हुए आज की जीवनशैली में आई आसानी की तारीफकरते हैं, वहीं कुछ प्रौढ और यहां तक कि जवान भी मौजूदा दौर के सिर्फ नकारात्मक तत्वों पर ही ध्यान देते हैं। उन्हें नई चाल के कपडों से लेकर नए दौर का व्यक्ति स्वातं˜य और सोच का खुलापन सब कुछ बुरा लगता है। नई चाल के कपडों की आलोचना करने वालों से यह पूछा जाना चाहिए कि प्राचीन काल में तो पेडों की छाल और पत्ते पहने जाते थे, क्या अब भी वही पहना जाए? आज के समाज में स्त्री स्वातं˜य पर व्यंग्य करने वालों से सवाल किया जाना चाहिए कि क्या वे डेढ शताब्दी पहले छोडी जा चुकी सती प्रथा को जारी रखना चाहते हैं? डॉ. गोयल के अनुसार, जैसे आपसे दो-चार पीढी पहले की रूढियां टूटी हैं, वैसे ही आपके समय के कुछ विचार या परंपराएं या तौर-तरीके अगर टूटते हैं तो उन्हें बिगडने के बजाय नए निर्माण के अर्थ में देखें। उससे परहेज करना ठीक नहीं हो सकता।

खुले मन से करें विचार

समय के साथ जैसे-जैसे आवागमन और संचार के साधन बढे हैं, वैसे ही वैसे दुनिया की तमाम संस्कृतियों के बीच निकटता बढी है। इससे दुनिया की लगभग सभी संस्कृतियां एक-दूसरे से प्रभावित हुई हैं। संक्रमण के इस क्रम में कुछ अच्छी चीजें आई हैं तो कुछ बुरी भी। खराब मूल्यों व बुरी मान्यताओं को छोडकर सिर्फ अच्छे को ग्रहण करें, यह जिम्मेदारी आपकी है। इसके लिए कोई आपको विवश नहीं कर सकता है। यही नहीं, जरूरी नहीं कि जिस बात को आप गलत समझ रही हैं वह वास्तव मे गलत ही हो।

डॉ. गोयल का मानना है, कई बार ऐसा होता है कि किसी स्थिति या फैसले को गलत घोषित करने के वर्षो बाद हम खुद ही इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि दरअसल हम ही गलत थे। इसलिए किसी बात को पूरी तरह नकारने से पहले खुद तो उस पर खुले मन से पुनर्विचार करें ही, हो सके तो अपने हितैषियों से भी सलाह कर लें। इसके बाद भी अगर कोई बात आपको गलत लगे तो बेशक उस पर अमल न करें। दूसरे लोग भी अगर उसके प्रति आकर्षित हो रहे हों तो अपने परिचितों को तो समझाने की कोशिश कर ही सकते हैं। पर अगर खुले मन से विचार के बाद भी लगे कि वह सही है तो अपने झूठे अहंकार को अलविदा कहने में देर न लगाएं। क्योंकि सही को अपना लेने में ही भलाई है।

अपनाएं वैश्विक सोच

हम यह लगातार देख रहे हैं कि आर्थिक और सांस्कृतिक उदारीकरण के इस दौर में पूरी दुनिया विश्व संस्कृति की ओर बढ रही है। संस्कृतियों के घुलने-मिलने के इस दौर में ही कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपनी क्षेत्रीय संस्कृति को खतरे में महसूस कर रहे हैं। इस भय से ग्रस्त लोग इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार पश्चिम को मानते हैं। इस संदर्भ में जरूरत यह समझने की है कि संस्कृतियों और सभ्यताओं के इस संक्रमण को कभी रोका नहीं जा सकता है। यह मनुष्यता के विकास की प्रक्रिया का हिस्सा है। सच तो यह है कि पश्चिम केवल हमें ही प्रभावित नहीं कर रहा है, पूरब भी पश्चिम को उतना ही प्रभावित कर रहा है। पश्चिम से जो मशीनी जीवन शैली यहां आई है, उसने बडे लाभ भी पहुंचाए हैं। उपग्रहों से संचार के इस दौर में कोई कहे कि हम तो हर हाल में डाक के भरोसे ही रहेंगे, तो क्या कहा जाए!

ठीक इसी तरह पश्चिम हमारे शांति-अहिंसा के संदेश और संयुक्त परिवार के भारतीय ढांचे को अपनाने की ओर तेजी से बढा है। वहां योग और ध्यान की महत्ता सबने समझी है और सभी इसे अपना रहे हैं। सच तो यह है कि अपनी ही संस्कृति के इन उदात्त तत्वों की ओर हमारी पीढी का ध्यान तब गया है जब पश्चिम ने उन्हें बडे पैमाने पर अपना लिया। तो क्या अपनी संस्कृति पर पश्चिम के इस सकारात्मक प्रभाव को हम पूरी तरह नकार सकते हैं? इसलिए अगर आपको आगे बढना है और इसके लिए अपनी सोच सकारात्मक बनाए रखनी है तो पूरब-पश्चिम का विवाद छोडकर विश्व मानवता की सोच अपनाएं। आखिर वसुधैव कुटुंबकम का दर्शन भी तो हमारा ही है।

यथार्थ से पलायन गलत

इस संदर्भ में डॉ. अन्नू गोयल की सलाह काबिले गौर है, हमारे समाज में ज्यादातर लोग नकारात्मक सोच के शिकार इसीलिए हैं, क्योंकि उनके संस्कारों की बुनियाद सही नहीं है। हमारे यहां आम तौर पर ब”ाों को यह तो बताया जाता है कि यह न करो, लेकिन यह नहीं बताया जाता कि क्या करो। दिन-रात नहीं सुनते-सुनते उसकी सोच नकारात्मक हो जाती है। सही यह है कि जब आप किसी को किसी कार्य से रोक रहे हों, तो उसे दूसरा रास्ता सुझाएं। यह बात बच्चों से लेकर बडों तक सभी पर समान रूप से लागू होती है। अगर कोई व्यक्ति अतीत में ही जीता रहे तो वह परंपरागत मूल्यों-मान्यताओं का पोषक तो बन सकता है, लेकिन वह अपने समय के साथ न्याय नहीं कर सकता है। क्योंकि दुनिया की सभी परंपराएं समय की गति के साथ अपने रूप बदलती हैं। जो नहीं बदलती वही रूढि बन जाती हैं और रूढियां तोड दी जाती हैं। डॉ. गोयल के अनुसार, यह यथार्थ से भागने जैसी बात होगी। यथार्थ से मुंह चुरा कर कोई व्यक्ति कल्पना में सुख का आनंद तो ले सकता है, लेकिन लंबे समय तक आशावादी नहीं बना रह सकता है। सच्चे अर्थो में आशावादी और सकारात्मक सोच से संपन्न बने रहने की पहली शर्त यह है कि आप सारे दुराग्रह छोड कर अपने समय से तालमेल बिठाएं। समय के साथ अपने निजी मूल्य और अपनी सोच बदलें। यह बात आपको बुढापे तक युवा भी बनाए रखती है।

 


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