कॉस्ट्यूम ज्यूलरी अब स्त्रियों को ज्यादा है पसंद


अपने लिए गहनों का चुनाव करते समय हर स्त्री की यही इच्छा होती है कि उसके आभूषण सबसे ज्यादा आकर्षक तो हों ही, साथ ही उसके परिधान से भी मेल खाते हों। स्त्रियों की इसी चाहत ने कॉस्टयूम ज्यूलरी को बढावा दिया है। कॉस्टयूम ज्यूलरी अर्थात 24 कैरेट के शुद्ध सोने, चांदी या प्लैटिनम से बनी ज्यूलरी के बजाय प्रेशियस और सेमी प्रेशियस स्टोन्स जडी हुई ऐसी आर्टिफिशियल ज्यूलरी, जो हर तरह के रंग, डिजाइन और आकार में उपलब्ध है, जिसे हर तरह के आउटिफट्स के साथ पहना जा सकता है।

अतीत के झरोखे से

ज्यूलरी पर अब तक जो भी किताबें लिखी गई हैं उनका अध्ययन करने के बाद विशेषज्ञों का कहना है कि 1930 ई. से पहले विश्व में कहीं भी कॉस्टयूम ज्यूलरी का उल्लेख नहीं मिलता है। बाद में जब समाज में मध्यवर्ग का उदय हो रहा था, तभी सुरक्षा और दूसरे कारणों से लोगों को इस बात की जरूरत महसूस हो रही थी कि कोई ऐसी ज्यूलरी हो, जिसे संभाल कर लॉकर में बंद रखने के बजाय स्त्रियां बेिफक्र हो कर पहन सकें, जिसमें अलग-अलग रंग और डिजाइन हों, जिसे अलग-अलग तरह के वस्त्रों के साथ पहना जा सके , साथ ही देखने में बिल्कुल असली जैसी लगे। इसी बात को ध्यान में रखते हुए कॉस्ट्यूम ज्यूलरी का प्रचलन शुरू हुआ। पहले इस तरह की ज्यूलरी, जिसे रोल्ड गोल्ड कहा जाता है, जिसे किसी दूसरे धातु पर सोने की पतली शीट (जो एल्यूमिनियम फॉयल की तरह होती है) चढा कर तैयार की गई। यह देखने में बिल्कुल सोने जैसी लगती थी और इसकी कीमत भी कम होती थी, इसलिए यह समाज की आम स्त्रियों के बीच काफी लोकप्रिय हुई। दूसरी तरह की ज्यूलरी ऐसी थी, जिसमें आर्टीफिशियलमेटल के साथ सेमी प्रेशियस स्टोन्स और ग्लास स्टोन का इस्तेमाल किया जाता था। सेमी प्रेशियस स्टोन्स देखने में बिल्कुल असली रत्नों जैसे लगते हैं। इनकी सबसे बडी खासियत यह होती है कि ये कई तरह के रंगों और आकार में उपलब्ध होते हैं और इनसे ज्यूलरी की सुंदरता में चार चांद लग जाते हैं। आज यह ज्यूलरी समाज के हर वर्ग की स्त्रियां काफी पसंद करती हैं, जिन्हें वे फैशन के अनुसार अपनाती रहती हैं।

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क्या है चलन में

आजकल कॉस्ट्यूम ज्यूलरी में शैंडलियर स्टाइल के ईयर रिंग्स, बीड्स, जेम्स स्टोन से बने नेकलेस और ब्रेसलेट, बडे आकार के पेंडेंट, बारीक डिजाइन वाले एंकलेट आदि का चलन युवा वर्ग में बहुत ज्यादा है, जिन्हें लडकियां वेस्टर्न और इंडो वेस्टर्न आउटिफट्स के साथ पहनना ज्यादा पसंद करती हैं। इसी तरह पारंपरिक भारतीय परिधानों के साथ आजकल कॉस्टयूम ज्यूलरी के क्षेत्र में खास बदलाव यह आया है कि अब मल्टी कर्लड स्टोन्स का इस्तेमाल कॉस्ट्यूम ज्यूलरी के लिए किया जाता है। इसमें यह सुविधा होती है कि इसमें हर रंग के स्टोन्स लगे होते हैं, जिन्हें स्त्रियां अपने मनपसंद आउटिफट्स के साथ पहन सकती हैं।

बढती लोकप्रियता

कॉस्ट्यूम ज्यूलरी आज की स्त्रियों की पहली पसंद बनती जा रही है। पहले स्त्रियों के पास अपने लिए ज्यूलरी चुनने के विकल्प बहुत सीमित थे। उनके पास सिर्फ असली ज्यूलरी होती थी, जिसे हर ड्रेस के साथ पहनना उनकी मजबूरी होती थी। पर अब उनके पास अपने लिए जैसी चाहें, वैसी ज्यूलरी चुनने की सुविधा है। साथ ही इनकी कीमत भी बहुत ज्यादा नहीं होती, इसलिए वे बहुत आसानी से अपनी हर ड्रेस के साथ मैचिंग ज्यूलरी खरीद या बनवा सकती हैं। आजकल ज्यूलरी डिजाइनर ड्रेस को देखकर उसकी मैचिंग की ज्यूलरी तैयार भी कर देते हैं। इस संबंध में ज्यूलरी डिजाइनर नूपुर मेहता कहती हैं, आज टीनएजर लडकियों से लेकर हर उम्र की स्त्रियों में कॉस्टयूम ज्यूलरी का बहुत क्रेज है। टीनएजर्स के लिए मैं फंकी स्टाइल की कॉस्टयूम ज्यूलरी डिजाइन करती हूं, जिसमें ड्रेस के मैचिंग रिबन में पेंडेंट को गूंथ देती हूं। इसे कॉलेज ग‌र्ल्स काफी पसंद करती हैं। मैं अलग-अलग रंगों केसेमी प्रेशियस स्टोन्स का इस्तेमाल करते हुए थोडी हैवी ज्यूलरी भी डिजाइन करती हूं, जिसमें नेकलेस, शैंडलियर ईयर रिंग, मांग टीका आदि प्रमुख हैं।

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तेजी से विकसित होता बाजार

भारत में कास्ट्यूम ज्यूलरी का बाजार अभी ज्यादा पुराना नहीं है। इस संबंध में कॉस्टयूम ज्यूलरी बनाने वाली, सुरभि आर्ट ज्यूलरी के निदेशक कमल कामरा कहते हैं, भारत में कॉस्ट्यूम ज्यूलरी का संगठित बाजार का विकास हुए अभी सिर्फ दस साल ही हुए हैं, लेकिन इसका बहुत अच्छा रेस्पॉन्स मिल रहा है। इस ज्यूलरी का प्रतिवर्ष तकरीबन 1 हजार करोड रुपये का टर्नओवर है और लाभ तो है ही, क्योंकि हर साल इसके खरीदारों की संख्या बढती जा रही है। हर वर्ष देश की युवा आबादी का एक बडा हिस्सा हमारे ग्राहकों में शामिल होता जा रहा है। युवा वर्ग में अब कोई भी गोल्ड की ट्रेडीशनल ज्यूलरी पहनना पसंद नहीं करता। इस तरह की ज्यूलरी की मांग बढने की एक वजह यह भी है कि आउटिफट्स के फैशन में तेजी से बदलाव आ रहा है। नई पीढी में साडी और सलवार सूट के बजाय वेस्टर्न और इंडो वेस्टर्न ड्रेसेज ज्यादा लोकप्रिय होती जा रही हैं। जाहिर है कि इसका प्रभाव ज्यूलरी के फैशन पर भी पडता है। ऐसे ड्रेसेज के साथ अब तक चली रही ट्रेडिशनल ज्यूलरी नहीं पहनी जा सकती। इसके अलावा भारत में त्योहार ज्यादा होते हैं और अलग-अलग अवसरों के लिए यहां नए आउटिफट्स बनवाए जाते हैं, लेकिन हर बार नए कपडों के साथ असली गहने बनना संभव नहीं होता। फिर सुरक्षा के डर से स्त्रियां असली ज्यूलरी हमेशा पहनने या घर में रखने से डरती हैं। बाजार की इन्हीं जरूरतों को ध्यान में रखते हुए भारत में कॉस्ट्यूम ज्यूलरी बनाने की शुरुआत हुई। हमारी मार्केट रिसर्च के अनुसार ज्यादातर महानगरों के मध्यवर्ग से उच्चवर्ग में इस तरह की ज्यूलरी की मांग ज्यादा है, लेकिन अब तेजी से छोटे शहरों स्त्रियों के बीच इसकी मांग बढती जा रही है। इतना ही नहीं, विदेशों रहने वाले भारतीयों के बीच भी यह ज्यूलरी काफी लोकप्रिय होती जा रही है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और साउथ अफ्रीका में कॉस्टयूम ज्यूलरी का एक्सपोर्ट किया जाता है, क्योंकि वहां इनकी मांग बहुत ज्यादा है और इससे ऐसी ज्यूलरी बनाने वाली कंपनियों को विदेशी मुद्रा के रूप में अच्छी-खासी आमदनी हो जाती है। कॉस्ट्यूम ज्यूलरी का बाजार में बहुत अच्छा रेस्पॉन्स है और कम से कम आगामी पंद्रह वर्षो तक इसके व्यापार में और अधिक वृद्धि होने की संभावना है।

 

 


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