मुक्काबाज : आँखे खोलता हुआ पंच


टोरंटो फिल्म फेस्टिवल और मुंबई के मामी फिल्म फेस्टिवल में दर्शकों और क्रिटिक्स की जमकर वाहवाही बटोरने के बावजूद फिल्म ‘मुक्काबाज’ को सिनेमाघरों तक पहुंचने में काफी समय लग गया | जहाँ तक मुझे याद है तो 2010 में फिल्म “लाहौर” और 2016 में आयी फिल्म “साला खडूस” के बाद मुक्केबाजी या बॉक्सिंग पर एक अच्छी और सार्थक फिल्म है | एक बात मैं यहाँ कहना चाहूँगा कि यदि फिल्म मुक्काबाज़ आपकी उम्मीदों पर खरी उतरती है तो एक बार 2010 में आयी फिल्म “लाहौर” जरुर देखे |

बरेली की बर्फी के बाद एक बार फिर किसी फिल्म को बरेली की तंग गलियों में फिल्माया गया है | इन्ही तंग गलियों में बड़े भाई के साथ रहता श्रवण सिंह (विनीत कुमार सिंह), जिसका एकमात्र सपना मुक्केबाजी में अपना नाम कमाना है। गरीब श्रवण मुक्केबाजी की ट्रेनिंग लेने की चाहत दिल में लिए फेडरेशन में प्रभावशाली और दबंग भगवानदास मिश्रा ( जिम्मी शेरगिल) के यहां जाता है | भगवानदास श्रवण को बॉक्सिग की ट्रेनिंग देने की बजाए घर के कामकाज में उसका उपयोग करने लगता है। मगर जब श्रवण के धैर्य का बांध टूटता है तो उसके बहाव में भगवानदास भी खुद को बहने से नहीं बचा पाटा और कसम लेता है कि वो श्रवण का करियर तबाह कर देगा | तो दूसरी तरफ भगवान दास की भतीजी सुनैना (जोया हुसैन) पर श्रवण मर मिटता है | सुनैना दिव्यांग है, जिसके चलते वो सुन तो सकती है लेकिन बोल नहीं सकती। भगवान दास की दबंगाई के चलते श्रवण को बरेली की ओर से टूर्नामेंट में बार बार खेलने से रोका जाता है, जिससे परेशान होकर वह बनारस जा कर कुछ करने का फैसला लेता है, जहाँ उसकी मुलाकात कोच (रवि किशन) से होती है । कोच को श्रवण के अंदर नैशनल चैंपियन वाली गुणवत्ता दिखायी देती है, मगर उतना ही परिश्रम भी | होता भी वही है, श्रवण जिला टूर्नामेंट जीत जाता है और साथ ही साथ उसे रेलवे में नौकरी मिल जाती है। भगवानदास की मर्जी के खिलाफ श्रवण और सुनैना शादी कर लेते है, जिसके बाद भगवानदास का उद्देश्य किसी भी तरह से नैशनल चैंपियनशिप के मुकाबले से श्रवण को बाहर करना रह जाता है | इसके बाद क्या होता है ये जानने के लिए आप सिनेमाघर की और रुख करे तो अधिक बेहतर होगा |

विनीत कुमार सिंह ने मुक्केबाज श्रवण के किरदार में जान फूंक दी है, जिसके परिणामस्वरूप बॉक्सिंग रिंग में नामी मुक्केबाजों के साथ विनीत के फाइट्स सीन बनावटी लगने के बजाय सच्चे लगते हैं। सुनैना के रोल में जोया हुसैन ने काफी मेहनत की है, जो कि फिल्म में साफ़ नज़र आता है । मगर इन सब में कोई सबसे ऊपर ई तो वो जिम्मी शेरगिल है, और इसके लिए उनकी तारीफ करना गलत नहीं होगा | फिल्म में जिम्मी का नकारात्मक किरदार है, जिसे उन्होंने इतनी बखूबी से निभाया है कि फिल्म देखते देखते दर्शकों को इस किरदार से नफरत होने लगती है | रवि किशन कोच के  किरदार में खूब फबे हैं।

तारीफ अनुराग कश्यप की भी होनी चाहिए, जिन्होंने बेहद खुबसूरत तरीके से गुंडाराज व जातिवाद पर उभरते खिलाड़ियों के संघर्ष को पेश किया हैं। फिल्म के संवादों में उत्तर प्रदेश की बोली की महक आती है अत: यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि मुक्काबाज ठेठ यूपी की कहानी है।

फिल्म का गीत-संगीत कहानी के अनुरूप होने के कारण लुभाता है। मुश्किल है अपना मेल प्रिये पहले की चर्चित हो चूका है । यदि आप अपने परिवार के साथ कोई फिल्म देखना चाहते है तो ये फिल्म आपके लिए ही है और आज ही सिनेमाघर में अपनी एंट्री बुक कराये |

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