आलेख

ब्लैकएंड वाइट फिल्में जो आज भी आपका मन मोह लेंगी

युं तो बॉलीवुड में बहुत सी फिल्में आईं, मगर कुछ फिल्में ऐसी थीं कि दशकों बीत जाने के बाद भी दर्शकों पर उन फिल्मों का खुमार आज भी तारी है, ऐसी ही कुछ फिल्मोंं की लिस्ट जो हर भारतीय दर्शक को कम से कम एक बार जरूर देखनी चाहिए

आज से करीब सौ वर्ष पहले दादा साहेब फालके उर्फ (धुंडिराजगोविन्दफालके) ने 1912 में अपनी पहली ‘मूक’ फिल्म बनाई जिसका नाम था ‘हरिश्चंद्र’। यह भारत की पहली फीचर फिल्म थी। इस फिल्म को बनाने में दादा साहेब ने करीब 15 हजार रुपए खर्च किए जो उस जमाने में एक मोटी रकम मानी जाती थी। धीरे-धीरे वक्त बदलता गया और मुंबई की वो फिल्म नगरी संसार भर में आज बॉलीवुड के नाम से मशहूर हो गई। बॉलीवुड में वक्त के साथ-साथ जहां एक ओर फिल्मों का बजट बढ़ता गया वहीं फिल्मों के प्रॉडक्शन के तौर-तरीकों में भी काफी बदलाहट आई। आज कंप्यूटर के युग में जहां बेमिसाल वीएफएक्स्, शानदार थ्रीडी और 4डी सिनेमा चलन में हैं वहीं कुछ ब्लैंक एंड वाइट फिल्में ऐसी हैं जो आज भी दर्शकों का मन-मोह लेती हैं। खुलासा डॉट इन’ में हम आज ऐसी ही कुछ फिल्मों की चर्चा करेंगे, जो बीतते वक्त के साथ-साथ दर्शकों के दिलो-दिमाग पर आज भी अपना असर वैसे ही बनाए हुए हैं और कोई भी दर्शक इन फिल्मों को बार-बार देखने से अपने आप को नहीं रोक पाता।

 महल (1949) Mahal (1949)

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सन् 1949 में आई ‘महल’ पुनर्जन्म की कहानी पर बनने वाली पहली भारतीय फिल्म थी, जो उस जमाने में सुपरहिट साबित हुई। फिल्म का निर्देशन कमाल अमरोही ने किया था। फिल्म में अशोक कुमार और मधुबाला मुख्य भूमिकाओं में नजर आए। फिल्म में (अशोक कुमार) एक ऐसे युवा वकील हरिशंकर के रूप में नजर आएं हैं जो अपने पिता द्वारा खरीदी एक हवेली में रहने आता है हवेली के बारे में एक कहानी है कि ये एक असफल प्रेमी जोड़े की हवेली है जिनकी मौत चालीस साल पहले हो गई है। फिल्म के नायक हरिशंकर को एक अनजान औरत (मधुबाला) का साया अपनी ओर आकर्षित करता है। जैसे-जैसे फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है अशोक कुमार और मधुबाला की खूबसूरत अदाकारी दर्शकों का मन मोह लेती है। फिल्म का सस्पेंश और थ्रिल अंत तक दर्शकों को बांधे रखता है। कहा तो ये तक जाता है कि बॉलीवुड में सस्पेंश थ्रिलर फिल्मों  की शुरुआत इसी फिल्म से हुई। बताया जाता है कि मशहूर निर्देशक बिमल राय इस फिल्म में मुख्य एडिटर के तौर पर काम कर रहे थे। ‘महल’ के निर्माण के दौरान वो इतना प्रभावित हुए कि पुर्नजन्म को लेकर उन्होंने 1958 में ‘मधुमति’ बनाई।

फिल्म में लता मंगेशकर द्वारा गाया ‘आएगा आने वाला’ गीत बहुत प्रसिद्ध हुआ। जिसके बाद लता मंगेशकर को बॉलीवुड में खूब सफलता मिली। बताया जाता है कि जब खेमचंद प्रकाश ने इस गीत की धुन बनाई तो दोनों निर्माताओं की गीत को लेकर राय अलग अलग थी। जहां एक ओर सावक वाचा को गीत की धुन पंसद नहीं आई थी वहीं दूसरी ओर अशोक कुमार को यह धुन बहुत पंसद आई थी। बहरहाल काफी हील हुज्जत के बाद गीत को फिल्म में ले लिया गया मगर गलती से गीत के रिकॉड पर गायिका का नाम कामिनी छप गया। कामिनी फिल्म में नायिका (मधुबाला) का नाम था। जब फिल्म रिलीज हुई तो यह गीत इतना मशहूर हुआ कि रेडियो पर श्रोताओं के ढेरों पत्र कामिनी के नाम से आने लगे। इसके बाद एचएमव्ही रेडियो पर जानकारी दी गई कि गीत की गायिका कामिनी नहीं लता मंगेशकर हैं। कहा जाता है कि इस गीत के बाद लता मंगेशकर बॉलीबुड में रातों-रात प्रसिद्ध हो गईं।

देखिए यूट्यूब पर बॉलीवुड की मशहूर फिल्म महल 

 

बीघा जमीन (1953) Do Bigha Zameen (1953)

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बॉलीवुड की मशहूर फिल्म दो बीघा जमीन का पोस्टर

भारतीय समानांतर सिनेमा के प्रारंभ में बनने वाली महत्वपूर्ण फिल्मों में ‘दो बीघा जमीन’ का नाम भी शामिल है। फिल्म का निर्देशन जहां एक ओर मशहूर निर्देशक बिमल रॉय ने किया था वहीं दूसरी ओर उस दौर के मशहूर कलाकार बलराज साहनी और निरुपा रॉय फिल्म में मुख्य भूमिकाओं में नजर आए। बताया जाता है कि भारतीय किसानों की दुर्दशा पर बनी इस फिल्म को हिन्दी की महानतम फिल्मों में गिना जाता है। फिल्म की कहानी संगीतकार सलिल चौधरी ने लिखी थी। इटली के नव यथार्थवादी सिनेमा से प्रेरित विमल दा की ‘दो बीघा जमीन’ एक ऐसे गरीब किसान की कहानी है जो जमींदार के पास गिरवीं पड़ी अपनी जमीन को छुड़ाने के लिए अपने बेटे के साथ शहर चला जाता है, जहां शहर में वह रिक्शा खींचकर रुपए कमाता है जिससे वह गिरवीं पड़ी जमीन छुड़ा सके। गरीब किसान की भूमिका में (बलराज साहनी) ने इस फिल्म में शानदार अभिनय किया है। बताया जाता है कि पहले पहल विमल राय को इस पर भरोसा नहीं था कि लंदन से लौटे (अंग्रेज) बलराज साहनी वास्तव में किसान शम्भू की भूमिका को सही तरीके से कर पाएंगे, लेकिन बलराज साहनी ने इस फिल्म में अपने किरदार के साथ पूरी तरह से इंसाफ करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। वे कई कई दिनों तक भूखे रहे और उन्होंने बहुत सा वक्त रिकशा चालकों के बीच बिताया जिससे वे गरीब किसान शंभू के किरदार पूरी शिद्दत के साथ निभा सकें।

ये अलग बात है कि व्यावसायिक रूप से ‘दो बीघा जमीन’ बहुत सफल फिल्म नहीं रही लेकिन इस फिल्म ने बिमल राय को अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पहचान दी। दो बीघा जमीन के लिए बिमल राय को ‘कांस फिल्म महोत्सव’ और ‘कार्लोवी वैरी फिल्म महोत्सव’ में पुरस्कार मिले। इसी फिल्म ने हिन्दी सिनेमा में बिमल रॉय को एक मजबूत मुकाम पर पहुंचा दिया। दो बीघा जमीन के लिए ही पहली बार निर्देशक के तौर पर बिमल रॉय को पहला फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला।

देखिए यूट्यूब देखिए दो बीघा जमीन

 

बूटपॉलिश 1954 Boot Polish (1954)

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बूट पॉलिस फिल्म का पोसटर

1954 में बनी बूट पॉलिश दो ऐसे गरीब बच्चों की कहानी है जो अपनी जिंदगीको सम्मान से जीने के लिए बूट पॉलिश का काम अपनाते हैं। फिल्म में डेविड और बेबी नाज ने अभूतपूर्व अभिनय किया है। राजकपूर द्वारा निर्मित बूट पॉलिश का निर्देशन प्रकाश अरोड़ा ने किया था। इस फिल्म को बेस्ट फिल्म के फिल्मफेयर अवार्ड से भी नवाजा गया था। बूट पॉलिश भोला और बेलू दो ऐसे भाई बहन की कहानी है जिनकी मां की मौत हो चुकी है और पिता जेल में बंद है। मजबूरी वश इन बच्चों को अपनी चाची के पास रहना पड़ता जो इन बच्चों को भीख मांगने के लिए मजबूर करती है और उसकी बात न मानने पर बच्चों को मारती पीटती है और भला बुरा कहती है। फिल्म में डेविड जॉन चाचा के किरदार में नजर आया है। वैसे तो जॉन चाचा अवैध शराब का कारोबार करता है पर इन बच्चों का भीख मांगना उसे पंसद नहीं आता है वह बच्चों को भीख मांगना छोड़कर इज्जत से जिंदगी जीने की सलाह देता है, बच्चे जॉन चाचा की बात मानकर बूट पॉलिश का सामान खरीदते हैं और बूट पॉलिश का धंधा शुरू करते हैं। डेविड को इस फिल्म में जॉन चाचा के किरदार के लिए बेस्ट सहायक अभिनेता के फिल्म फेयर पुरस्कार से नवाजा गया। इस फिल्म का एक गीत नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है  इतना सफल हुआ कि आज भी लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है।

देखिए यूट्यूब पर ब्लैक एंड वाइट फिल्म बूट पॉलिश

 

जागते रहो (1956) Jaagte Raho (1956)

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राजकपूर अभिनीत फिल्म जागते रहो का पोस्टर

1956 में बनी जागते रहो, सभ्य समाज के मुंह पर एक जोरदार तमाचा है। जागते रहो को अगर एक कालजयी फिल्म कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।राजकपूर ने इस फिल्म में ऐसा अभिनय किया जो उनके करियर में मील का पत्थर साबित हुआ। फिल्म में राजकपूर, नर्गिस, मोतीलाल, प्रदीप कुमार सुमित्रा देवी और सुलोचना चटर्जी मुख्य भूमिका में नजर आए।  1956 में बनी इस फिल्म के निर्देशक सोम्भू मित्रा और अमित मित्रा थे। फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी थे। फिल्म एक ऐसे गरीब की कहानी है जो अच्छे जीवन की तलाश में शहर आता है और फिर प्यास से बेहाल होकर जब एक घर में घुसता है तो लोग उसे चोर समझकर मारने लगते हैं। इस फिल्म में राजकपूर का शानदार अभिनय आज तक याद किया जाता है। इस फिल्म के एक गीत में मोतीलाल शराब के नशे में जिंदगी ख्वाब है ख्वाब में गाते हुए परदे पर आते हैं मोतीलाल का इस फिल्म में यह स्टाइल दर्शकों ने खूब पंसद किया। इस फिल्म ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कार जीते और अरसा बीत जाने के बाद आज भी सिने प्रेमियों के दिलों पर राज कर रही है।

देखिए यूट्यूब पर देखिए जागते रहो

 

प्यासा (1957) Pyaasa (1957),

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गुरुदत्त की फिल्म प्यासा जो उनके जीवन में मील का पत्थर साबित हुई

गुरुदत्त द्वारा निर्मित, निर्देशित और अभिनीत प्यासा 1957 में आई एक कल्ट क्लासिक मूवी है।  समाज के छल कपट से क्रुद्ध एक नायक द्वारा अपने ही मौलिक अस्तित्व को नकार देना इस फिल्म में किसी भी आदमी की चरम हताशा को दर्शाता है।  इस फिल्म को विश्व प्रसिद्ध टाइम पत्रिका ने सर्वश्रेष्ठ रोमांटिक फिल्मों की सूची में पांचवा स्थान दिया है। इस फिल्म में माला सिन्हा, गुरुदत्त, वहीदा रहमान, रहमान, जॉनी वॉकर, कुमकुम, लीला मिश्रा, श्याम कपूर, महमूद, टुनटुन और मोनी चटर्जी मुख्य भूमिकाओं में नजर आए हैं।

फिल्म की कहानी एक संघर्षरत कवि विजय की है जो अपनी रचनाओं को सही स्थान नहीं दिला पाता। न तो कोई प्रकाशक उसकी रचनाओं को छापते हैं और न ही उसके परिवार वाले उसकी लेखनी की कद्र करते हैं और आखिर एक दिन उसकी रचनाओं को एक कबाड़ी को बेच दिया जाता है। संयोग से उसकी ये रचनाएं एक वेश्या जिसका नाम गुलाबो है खरीद लेती है। उधर अपनी गरीबी और परिवार के तानों से त्रस्त विजय घर बार छोड़कर जब सड‍़कों पर इधर उधर धक्के खाता घूम रहा होता है तो उसकी मुलाकात उसी वेश्या गुलाबो से होती है। प्यासा इसी विजय और गुलाबो की प्रेम पर आधारित एक प्रेम कहानी है। गुरुदत्त और वहीदा रहमान को प्यासा में अभूतपूर्व अभिनय के लिए हमेशा याद किया जाएगा।

देखिए यूट्यूब पर पूरी फिल्म

 

चलती का नाम गाड़ी (1958) Chalti Ka Naam Gaadi (1958)

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किशोर कुमार की फिल्म चलती का नाम गाड़ी का पोस्टर

सन 1958 में किशोर कुमार द्वारा बनाई गई फिल्म चलती का नाम गाड़ी एक कॉमेडी फिल्म थी। फिल्म में किशोर कुमार ने अपने दोनों भाइयों अशोक कुमार और अनूप कुमार के साथ जबरदस्त अभिनय किया। फिल्म की कहानी एक गाड़ी के चारों ओर घूमती है। फिल्म में ब्रजमोहन शर्मा अशोक कुमार अपने दो छोटे भाईयों मनमोहन किशोर कुमार और जगमोहन अनूप कुमार के साथ एक गैराज चलाते हैं। ब्रजमोहन शर्मा औरतों को पंसद नहीं करते यहां तक कि अपने गैराज में किसी लड‍़की की फोटो तक लगाना उन्हें गंवारा नहीं है। एक दिन जब मनमोहन रात की शिफ्ट में गैराज पर काम कर रहा होता है तभी मधुबाला गैराज पर आती हैं जिनकी गाड़ी खराब हो जाती है और थोड़ी नोंक झोंक के बाद किशोर कुमार उनकी गाड़ी तो ठीक कर देते हैं लेकिन पैसा लेना भूल जाते हैं, और जब किशोर कुमार अपना पैसा लेने मधुबाला के पास जाते हैं तो न सिर्फ मधुबाला के प्रेम में गिरफ्तार हो जाते हैं बल्कि और कई तरह की मुसीबतें मोल ले लेते हैं।

फिल्म के अधिकतर गाने खुद किशोर दा और आशा भोंसले ने गाए। फिल्म में संगीत दिया एसडी बर्मन ने और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी थे। फिल्म के सभी गाने उस दौर में खूब हिट हुए। चलती का नाम गाड़ी में अशोक कुमार, अनूप कुमार किशोर कुमार के अलावा मधुबाला, के एन सिंह, कुकु मौर्या, हेलन, वीना, मोहन चोटी, सज्जन आदि ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। बताया तो ये तक जाता है कि किशोर दा को विश्वास था कि यह फिल्म नहीं चलेगी और अपनी फिल्म् में मोटा घाटा दिखाकर इनकम टैक्स बचाने के लिए उन्होंने इस फिल्म का निर्माण किया, लेकिन उनकी आशा के विपरीत फिल्म को जबरदस्त सफलता मिली। इसलिए उन्होंने इस फिल्म् के सभी अधिकार अपने सेक्रेटरी अनूप शर्मा के नाम कर दिए थे।

देखिए यूट्यूब पर पूरी फिल्म

 

लव इन शिमला (1960) Love In Simla (1960)

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जॉय मुखर्जी की फिल्म लव इन शिमला का पोस्टर

1960 में बनी लव इन शिमला जॉय मुखर्जी और साधना द्वारा अभिनीत एक सदाबाहार रोमाटिंक फिल्म थी। फिल्म का निर्माण शशिधर मुखर्जी ने अपने बैनर फिल्मालय प्रॉडक्शन हाउस के तहत किया। फिल्म का निर्देशन आर के नायर ने किया था। फिल्म की कहानी एक ऐसी लड‍़की की कहानी है जो अपने माता पिता की मौत के बाद अपने चाचा चाची के पास रहने के लिए आती है, जहां उसे अपने सामान्य रूप रंग को लेकर चाचा चाची और उनके बच्चों का तंज सहना पड‍़ता है और इन्हीं तानों और जली कटी बातों से तंग आकर वो एक दिन अपनी चचेरी बहन को चैलेंज देती है कि वो उसके प्रेमी को अपने प्रेम में फंसा लेगी ।

बताया जाता है कि इस फिल्म में नायक की भूमिका निभाने के लिए धमेन्द्र काफी प्रयासरत थे, मगर निर्देशक ने शशिधर मुखर्जी के बेटे जॉय को ही नायक के लिए चुना। इसी फिल्म से पहली बार साधना ने फिल्म नगरी में कदम रखा और उनके साथ साथ उनकी हेयर स्टाइल साधना कट भी मशहूर हो गई।  फिल्म में जॉय मुखर्जी और साधना के अलावा अजरार, किशोर साहु, सोभा समर्थ, दुर्गा खोटे, विजयलक्ष्मी, मास्टर रमेश, रवि टंडन किरन कुमार और फौजा सिंह मुख्य भूमिकाओं में नजर आए।

देखिए यूट्यूब पर फिल्म के कुछ गीत 

 

मुगले आजम (1960)Mughal-E-Azam (1960)

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पृथ्वीराज कपूर और दिलीपकुमार अभिनीत फिल्म मुगलेआजम का पोस्टर

हिंदी सिनेमा के इतिहास में मुगले आजम अब तक की सबसे सफलतम फिल्म मानी जाती है। मुगले आजम का निर्देशन के आसिफ ने किया था। खुद के आसिफ के शब्दों में ये एक फिल्म नहीं शाहकार थी। मुगले आजम को शानदार सेटो, भव्य साज सज्जा और लाजवाब संगीत के लिए हमेशा याद किया जाता रहेगा। बताया जाता है कि इस फिल्म के निर्माण में के आसिफ को बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ा। उन्हें इस फिल्म को बनाने में करीब दस साल लगे। फिल्म के निर्माण में इतना रुपया खर्च हुआ की के आसिफ करीब करीब दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गए थे। मगर जब फिल्म प्रदर्शित हुई तो इसने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।

भारतीय सिनेमा को 100 वर्ष पूरे होने पर ब्रिटेन में कराए गए एक सर्वेक्षण में मुगले आजम को हिन्दी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ कृति माना गया।  बताया जाता है कि इस फिल्म के एक गीत मोहब्बत जिंदाबाद में मोहम्मद रफी ने करीब 100 कोरस गायकों के साथ गाना गाया था। ये भी कहा जाता है कि इस फिल्म में जो कृष्ण जी की मूर्ति इस्तेमाल की गई वो शुद्ध सोने से बनी हुई थी। फिल्म में दिलीप कुमार, मधुबाला, पृथ्वीराज कपूर, दुर्गा खोटे, निगर सुल्ताना, अजीत, एम कुमार, मुराद, जलाल आगा, विजयलक्ष्मी, एस नजीर, सुरेन्द्र, जॉनी वाकर, तबस्सुम  मुख्य भूमिका में नजर आए।

देखिए यूट्यूब पर पूरी फिल्म

 

काला बाजार (1960) Kala Bazar (1960)

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सदाबाहार अदाकार देवानंद अभिनीत फिल्म कालाबाजार का पोस्टर

1960 में नवकेतन फिल्मस के बैनर तले बनी काला बाजार का निर्माण देवानन्द ने किया था। फिल्म का लेखन और निर्देशन देवानन्द के छोटे भाई विजयान्द ने किया था। इस फिल्म में पहली बार तीनों आनन्द भाइयों ने एक साथ काम किया। फिल्म का संगीत एस डी बर्मन ने दिया था और फिल्म के गीत शैलेन्दे ने लिखे थे। इस फिल्म के बारे में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इस फिल्म में एक दृश्य में बहुत सारे कलाकारों को लिया गया। फिल्म की कहानी एक ऐसे गरीब बस कंडेक्टर की है जिसकी एक यात्री से कहासुनी होने की वजह से उसकी नौकरी चली जाती है और वो अपने परिवार का पेट पालने के लिए दर दर की ठोकरे खाता है तभी उसे एक व्यक्ति सिनेमा हॉल के बाहर फिल्म के टिकट ब्लैक करता हुआ दिखाई देता है और वो भी वही काम शुरू कर देता है। धीरे धीरे उसी ब्लैक की कमाई से वो एक दिन वो मरीन ड्राइव पर अपने परिवार के लिए एक बंगला खरीद लेता है। फिल्म में देवानंद, वहीदा रहमान, विजय आनंद, चेतन आनंद, नंदा, राशिद खान, मदन पुरी, लीला चिटनिस, हेलन और मुमताज बेगम मुख्य भूमिकाओं में नजर आए हैं।

देखिए यूट्यूब पर पूरी फिल्म

 

हम दोनों (1961) Hum Dono (1961)

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देवानंद और साधना अभिनीत फिल्म हमदोनों का पोस्टर

नवकेतन के बैनर तले बनी फिल्म हम दोनों सन् 1961 में आई। देवानंद ने इस फिल्म का निर्माण किया। जहां एक ओर इस फिल्म के निर्देशक अमरजीत बताए जाते हैं वहीं दूसरी ओर देवानंद ये दावा करते हैं कि इस फिल्म का निर्देशन और कथानंक विजयानंद ने किया था। बहरहाल जो भी हो हम दोनों उस दौर की एक जबरदस्त हिट फिल्म रही। फिल्म में देवानंद ने डबल रोल किया। इसमें वो एक फौजी के रूप में नजर आए हैं। जो उनके ही हमशक्ल की मौत की खबर के बाद उसके घर पहुंच जाता है। जहां एक ओर मृतक फौजी के घर वाले उसे जिंदा समझने लगते हैं वहीं वह उनके प्रेम में खुद को फंसा पाता है। इस फिल्म में देवानंद एक फौजी के रूप में खूब जंचे हैं, उनके साथ इस फिल्म में नंदा, साधना शिवदासानी, लीला चिटनिस, गजानन जागीरदार और राशिद खान मुख्य भूमिकाओं में नजर आए। सन 2011 में करीब पचास सालों के बाद फिल्म को एक बार फिर रंगीन करके दोबारा रिलांच किया गया।

देखिए यूट्यूब पर पूरी फिल्म

 

साहिब बीवी और गुलाम (1962) Sahib, Bibi Aur Ghulam (1962)

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गुरुदत्त् का शाहकार साहेब बीबी और गुलाम का पोस्टर

विमल मित्र के बंगाली उपन्यास शाहेबबीबीगोलाम  पर बनी साहिब बीवी और गुलाम 1962 में बनी। फिल्म का निर्माण गुरुदत्त ने किया और इसका निर्देशन अबरार अलवी द्वारा किया गया। यूं तो इससे पहले भी बहुत सी साहित्यक कृतियों पर फिल्में बन चुकी हैं लेकिन इस फिल्म में कुछ ऐसी खास बात थी जो ये हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर बन गई। साहिब बीवी और गुलाम को उस वर्ष के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का सम्मान मिला और साथ ही फिल्मफेयर पुरस्कारों में इसे चार श्रेणियों में एक साथ सम्मानित किया गया। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों की कहानी कहती यह फिल्म कलकत्ता की पृष्ठभूमि पर बनी थी। जिसमें एक बंगाली जमीदार की सामंतवादी सोच, और उसकी अकेली पत्नी और गुलाम की आदर्शवादी दोस्ती को दर्शाने का प्रयास किया गया है। फिल्म में मीना कुमार का अभिनय अभूतपूर्व है। फिल्म में मुख्य रूप से गुरुदत्त, मीना कुमारी, रहमान, वहीदा रहमान और नजीर हुसैन ने भूमिका निभाई। बताया जाता है कि कागज के फूल के बाद गुरुदत्त ने यह फैसला लिया था कि वो अब किसी और फिल्म का निर्देशन नहीं करेंगे इसलिए उन्होंने इस फिल्म के लिए नितिन बोस और फिर सत्येन बोस से बात की। जब दोनों ही लोगों से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला तब गुरुदत्त ने इस फिल्म के निर्देशन का काम अबरार अल्वी को सौप दिया था। कुछ लोगों का कहना है कि गुरुदत्त चाहते थे कि फिल्म में भूतनाथ का किरदार शशिकपूर निभाएं लेकिन शशिकपूर के मना करने पर उन्हें यह रोल खुद करना पड़ा।

देखिए यूट्यूब पर फिल्म के कुछ दृश्य

 

 हॉफ टिकट (1962) Half Ticket (1962)

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किशोर कुमार की फिल्म हाॅफ टिकट का पेास्टर

किशोर कुमार अभिनीत हॉफ टिकट 1962 में आई। जिसका निर्देशन कालिदास ने किया था। फिल्म में किशोर कुमार के अलावा मधुबाला, हेलन, प्राण, शम्मी, मनोरमा, प्रदीप कुमार, मोनी चटर्जी और टुन टुन मुख्य भूमिकाओं में नजर आए।

फिल्म में किशोर कुमार ने विजय का किरदार निभाया है जो एक बड़े उद्योगपति का बेटा है। विजय जिंदगी से लापरवाह है और अपने पिता द्वारा शादी के दबाव से तंग आकर एक दिन अपने जीवन में कुछ करने के लिए घर छोड़कर बंबई भाग जाने के निर्णय लेता है। ट्रेन में जहां उसकी मुलाकात एक डायमंड के स्मगलर प्राण से होती है वहीं दूसरी ओर ट्रेन में सफर कर रही मधुबाला से सफर के दौरान वह प्यार करने लगता है। फिल्म में किशोर कुमार और मधुबाला की अदाकारी को खूब वाहवाही मिली। बताया जाता है कि हॉफ टिकट हॉलीवुड की मूवी यूआर नेवर टू यंग से प्रेरित थी।

देखिए यूट्यूब पर फिल्म के कुछ दृश्य

 

 बंदिनी 1963 Bandini (1963)

धर्मेन्द्र, नतून और अशोक कुमार अभिनीत फिल्म बंदिनी का पोस्टर

धर्मेन्द्र, नतून और अशोक कुमार अभिनीत फिल्म बंदिनी का पोस्टर

विमल मित्र द्वारा निर्देशित आखिरी फिल्म बंदनी 1963 में आई। सुजाता की तरह बंदिनी भी एक महिला प्रधान फिल्म थी। फिल्म बंदनी की कहानी जेल में बंद एक महिला कैदी कल्याणी के चारों ओर घूमती है। इस महिला पर खून का इल्जाम है और जब जेल में एक वृद्धा को टीवी की बीमारी हो जाती है तो कल्याणी अपनी मर्जी से उसकी देखभाल करती है। जेल में वृद्धा का इलाज करने आए डाक्टर को कल्याणी से प्यार हो जाता है। कल्याणी अपने बीते हुए अतीत के चलते डाक्टर के प्यार को ठुकरा देती है। फिल्म में नूतन ने कल्याणी का किरदार निभाया है। फिल्म में नूतन के अलावा अशोक कुमार, धर्मेन्द्र, तरुण बोस, इफतेखार मुख्य भूमिकाओं में नजर आए। इस फिल्म ने जहां एक ओर बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन किया वहीं दूसरी ओर इस फिल्म को उस वर्ष फिल्मफेयर पुरस्कारों में उसे छह पुरस्कारों से नवाजा गया जिसमें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार भी शामिल था।

देखिए यूट्यूब पर पूरी फिल्म

 

दोस्ती (1964) Dosti (1964)

हिंदी फिल्म जगत की सफलत फिल्मों में से एक दोस्ती का पोस्टर

हिंदी फिल्म जगत की सफलत फिल्मों में से एक दोस्ती का पोस्टर

दोस्ती हिन्दी फिल्म जगत के इतिहास की सबसे सफलतम फिल्मों में से एक है। इसका फिल्म का निर्माण राजश्री प्रोडक्शन के बैनर तले ताराचंद बड़जात्या ने किया था और फिल्म का निर्देशन सत्येन बोस ने किया था। बताया जाता है कि इसी फिल्म से संजय खान ने अपने करियर की शुरुआत की थी। इस फिल्म में बेबी फरीदा, उमा राजू, लीला मिश्रा, नाना पालसिकर, लीला चिटनिस और अभिभट्टाचार्य जैसे कलाकार ने मुख्य भूमिका निभाई थी।

दोस्ती सन् 1964 की दस सबसे ज्यादा प्रसिद्ध फिल्मों में से एक थी। दोस्ती फिल्म की कहानी एक अपाहिज लड़के और एक अंधे लड़के की दोस्ती पर आधारित है। सुशील कुमार और सुधीर कुमार के अद्भुत अभिनय को देखकर दर्शक भाव विभोर हो गए। इस फिल्म में माउथ ऑर्गन का जबरदस्त इस्तेमाल हुआ जो आरडीबर्मन का कमाल था। फिल्म के सभी गाने आज तक दर्शकों के दिलो दिमाग पर छाए हुए हैं।  इस फ़िल्म को१९६४ के फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कारों में छ: पुरस्कारों से नवाज़ा गया जिसमें फ़िल्म फ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार भी शामिल है।

देखिए यूट्यूब पर फिल्म का एक गीत

 

अनुपमा (1966) Anupama (1966)

धर्मेन्द्र और शर्मिला टैगोर अभिनीत फिल्म अनुपमा का पोस्टर

धर्मेन्द्र और शर्मिला टैगोर अभिनीत फिल्म अनुपमा का पोस्टर

अनुपमा जैसा इसके नाम से प्रतीत होता है, यह फिल्म एक अंतमुर्खी लड़की की अद्भुत प्रेम कहानी पर आधारित है। फिल्म का निर्देशन ऋषिकेश मुखर्जी ने किया था। फिल्म में धर्मेन्द्र, शर्मिला टैगोर, तरुण बोस, शशिकला, देवेन वर्मा, दुर्गा खोटे, दुलारी, सुरेखा, ब्रहम भारद्वाज और राजदीप मुख्य भूमिका में नजर आए। अनुपमा एक ऐसी लड़की की कहानी है जिसके जन्म के समय उसकी मां का देहांत हो जाता है और उसका पिता उसे अपनी मां की मौत का जिम्मेदार मानते हुए लड़की से नफरत करने लगता है। पिता की नफरत से लड़की अंतमुर्खी हो जाती है और उसके जीवन में एक लड़का आता है जो लेखक और अध्यापक है, अनुपमा को उससे प्यार हो जाता है। अपने प्रेम और पिता की नफरत के बीच झूलती इस प्रेम कहानी में शर्मिला टैगोर ने कमाल की एक्टिंग की है।

देखिए यूटयूब पर पूरी फिल्म

 

बहारों के सपने (1967) Baharon Ke Sapne (1967)

राजेश खन्ना और आशा पारेख अभिनीत फिल्म बहारों के सपने

राजेश खन्ना और आशा पारेख अभिनीत फिल्म बहारों के सपने

बहारों के सपने निर्माता निर्देशक नासिर हुसैन की एक ऐसी फिल्म थी जो उनकी पुरानी फिल्मों से एकदम अलहदा थी। बताया जाता है कि नासिर हुसैन ने अपने कॉलेज के जमाने में लेखन प्रतियोगिता के लिए एक कहानी लिखी थी जिसको प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ था, और तभी से नासिर के मन में इस कहानी को लेकर फिल्म बनाने का कीड़ा कुलबुला रहा था।  बहारों के सपने एक छोटे बजट की फिल्म थी। उस जमाने में राजेश खन्ना नए नए फिल्मों में आए थे, नासिर ने रोजश खन्ना को फिल्म में हीरो ले लिया लेकिन हिरोईन के रूप में वो नन्दा को लेने का विचार बना रहे थे। नन्दा ने इस फिल्म में काम करने से इनकार कर दिया तो नासिर ने इस फिल्म में आशा पारेख को लिया।

बताया जाता है कि बहारों के सपनों के साथ ही नासिर हुसैन देवानंद को लेकर तीसरी मंजिल के निर्माण की भी तैयारी कर रहे थे। उन्होंने सोचा बहारों के सपनों के निर्देशन की जिम्मेदारी देवानंद के भाई विजयान्द को दे दी जाए। इस बात पर देवानंद भड‍़क उठे और उन्होंने ताना मारा कि छोटे बजट की और कलात्मक फिल्म मेरे भाई को दे रहे हो और खुद तीसरी मंजिल का निर्देशन कर रहे हो। यह बात नासिर हुसैन को इतनी चुभी की उन्होंने बहारों के सपनों का निर्देशन खुद किया।

बहारों के सपने पहले एक दुखांत फिल्म थी। राजेश खन्ना व आशा पारेख दोनों की फिल्म के अंत में मौत हो जाती है । फिल्म जब रिलीज हुई तो एकदम ठण्डी पड़ गई। समालोचकों की मांग पर एक बार फिर फिल्म का अंत दोबारा शूट किया गया और सुखद अंत के साथ एक बार फिर फिल्म रिलीज की गई। इस फिल्म के कुछ ‘आजा पिया तोहे प्यार दूँ’ , ‘ क्या जानूं सजन होती है क्या ग़म की शाम’, ‘चुनरी संभाल गोरी’ जैसे सदाबहार गीत आज भी दर्शकों के यादों में तरोताजा बने हुए है।

देखिए यूटयूब पर पूरी फिल्म

 

रात और दिन (1967) Raat Aur Din (1967)

फिरोज खान और नरगिस की अदाकारी से लबरेज रात और दिन का पोस्टर

फिरोज खान और नरगिस की अदाकारी से लबरेज रात और दिन का पोस्टर

 रात और दिन का निर्माण सन 1967 में जफर हुसैन ने किया था। फिल्म का निर्देशन सत्येन बोस ने किया था। इस फिल्म में नरगिस ने एक ऐसी महिला का किरदार निभाया है जो मल्टीपल पर्सनेल्टी डिसऑडर्र से पीडि़त है। इस फिल्म में नरगिस के अभूतपूर्व अभिनय के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया था। फिल्म में प्रदीप कुमार, नरगिस, फिरोज खान, के एन सिंह, लीला मिश्रा, अनूप कुमार, हरेन्द्र नाथ चटोपध्याय और अनवर हुसैन मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे। फिल्म में नरगिस एक ऐसी औरत बनी हैं जो दिन में तो अपने पति के साथ रहती हैं और शाम को वो पेग्गी बनकर क्लब में घूमती है और नए नए लोगों से मिलती है। जब उसके पति को उस पर शक होता है तो नरगिस को बीती रात को हुई किसी भी घटना के बारे में याद होने से इनकार कर देती है। फिल्म का कथानक इतना जबरदस्त है कि अंत तक दर्शकों को बांधे रखता है।

देखिए यूटयूब पर पूरी फिल्म

 

 खामोशी (1969) Khamoshi (1969)

वहीदा रहमान और राजेश खन्ना की फिल्म खामोशी का पोस्टर

वहीदा रहमान और राजेश खन्ना की फिल्म खामोशी का पोस्टर

खामोशी फिल्म एक बंगाली लघु कथा नर्स मित्रा पर आधारित थी। आशुतोष मुखर्जी और असित सेन ने इसी कहानी पर बंगाली भाषा में दीप जले जाई बनाई जिसे अपार सफलता मिली। इस फिल्म में वहीदा रहमान ने एक नर्स की भूमिका निभाई है। इस फिल्म में वहीदा रहमान, राजेश खन्ना, धर्मेद्र, नजीर हुसैन, इफ्तखार, ललिता पवार, देवेन वर्मा, अनवर हुसैन और स्नेहलता ने मुख्य भूमिका निभाई। खामोशी वहीदा रहमान के करियर की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक मानी जाती है। इस फिल्म के गुलजार के लिखे गीत तुम पुकार लो तुम्हारा इंतजार है, वो शाम कुछ अजीब थी और हमने देखी है इन आंखों की महकती खुशबू तो आज भी दर्शकों की जुबान पर तारोताजा बने हुए है।

देखिए यूटयूब पर पूरी फिल्म

 

 

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Title: black and white bollywood films that we can still watch any time | In Category: आलेख  ( bollywood_article )

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