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कुलदीप पटवाल : आई डिड नॉट डू इट, काफी हद तक आम आदमी की कहानी  

जब बॉलीवुड के मंझे हुए कलाकार दीपक डोबरियाल, रायमा सेन, परवीन डबास और गुलशन देवैया जैसे कलाकार एक साथ हो तो फिल्म से उम्मीद बढ़ जाती है | ऐसे में इस हफ्ते जो फिल्म आ रही है उसका नाम है कुलदीप पटवाल : आई डिड नॉट डू इट, जिसका निर्देशन रेमी कोहली ने किया है | रोमी ने एक ऐसा विषय चुना है, जिससे अक्सर अच्छे अच्छे निर्देशक हाथ लगाने से भी कतराते है, जिसमे वो काफी हद तक कामयाब भी होते है |

भारतपुर में रहने वाला कुलदीप पटवाल एक छोटी सी दुकान चलाता है, जो बीते समय में गली-गली जाकर रेहड़ी पर सामान बेचता था । ऐसा नहीं है कि वो पढ़ा लिखा नहीं है, वो पढ़ा लिखा भी और नौकरी के लिए उसने गलियों की ख़ाक भी छानी, मगर हर बार उसकी मुलाकात नाकामियों से हुयी | फिल्म में इस वक़्त आरक्षण जैसा मुद्दा अपनी झलक दिखाता है | दूसरी तरफ बेटे की आमदनी को मद्देनजर रखते हुए उसके पिता ऑटो चलाकर परिवार में अपना सहयोग दिखाते है | मगर फिल्म कभी इतनी सीधी नहीं होती, उसमे कोई न कोई टर्निंग प्वाइंट  जरुर आता है | इस फिल्म में भी यही होता है, जब एक रैली में स्टेट के सीएम वरूण चड्डा की गोली मार कर हत्या कर दी जाती है, इस रैली में कुलदीप भी मौजूद होता है | पुलिस जांच शुरू करती है और शक के आधार पर कुलदीप को घर से उठा के ले जाती है | इस वक़्त कुलदीप की मदद के लिए एडवोकेट प्रदुमन शाहपुरी आगे आता हैं | अदालत के चौखट पर प्रदुमन शाहपुरी का आमना-सामना सिमरत चड्डा से है, जो सीएम वरूण चड्डा की पत्नी है | आखिर क्या होता है ? क्या कुलदीप बेगुनाह साबित हो पाता है या वरूण चड्डा के हत्यारों के बारे में पता चल पता है ? यही फिल्म का क्लाइमेक्स है |

रेमी कोहली ने यकीनन एक बेहतरीन कहानी के साथ साथ लाजवाब कलाकारों का चयन किया है, मगर कमजोर स्क्रीन प्ले फिल्म को ले डूबती है | बार बार फिल्म का फ़्लैश बैक जाना फिल्म को और बोझिल करता है | फिल्म में कमी और है कि फिल्म का मुख्य नायक ही फिल्म की जान था और निर्देशक ने उसी पर कुछ खास ध्यान नहीं दिया | रोमी चाहते तो इस किरदार को और पावरफुल बना सकते थे |

अदाकारी के मामले में एक बार फिर दीपक डोबरियाल साबित करते है कि वो एक बेहतरीन कलाकार है | रायमा सेन कुछ खास नहीं कर पायी, हालाँकि उनके पास ये एक अच्छा मौका था बॉलीवुड में कमबैक करने का | दीपक के बाद यदि फिल्म में जो सबसे ज्यादा प्रभावित करता है तो वो है पंजाबी लहजे में बात करता हुआ एडवोकेट प्रदुमन शाहपुरी यानि कि गुलशन देवैया, जिसके चलते वो दर्शको का ध्यान खीचने में सफल रहते है | जमील खान ने भी बेहतरीन काम किया है |

फिल्म में कोई गीत नहीं है, जो कि निर्देशक की एक अच्छी फैसला था, वरना पहले से ही धीमी गति से चल रही ये फिल्म किसी बोझ के समान हो जाती | पीड़ित आम आदमी की कहानी लगने वाली इस फिल्म का क्लाइमेक्स भी वैसा ही होता तो और मज्जा आ जाता |

 

 

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Title: kuldeep patwal i did not do it to a large extent the story of the common man in Hindi  | In Category: फिल्म समीक्षा movie_review
सुमित नैथानी

सुमित नैथानी

सुमित नैथानी पेशे से ब्लॉगर व लेखक हैं। कई क्षेत्रीय पत्र पत्रिकाओं के लिए लेखन के साथ जागरण जंक्शन (दैनिक जागरण का ब्लॉग ) पर भी लगातार लिखते रहे हैं।

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