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बेवजह का कान फोड़ू शोर अक्सर गीतों के सार्थक शब्दों को दबा देता है

एक जमाना था जब गीतकारों को शायरी की अच्छी समझ होती थी, जो अपने गीतों में अच्छी कविताओं और शेरों का शुमार कर फिल्म की सिचुएशन के हिसाब से ऐसे गीत तैयार करते थे जो सैकड़ों सालों बाद आज भी श्रोताओं के मन पर छाए रहते हैं।

शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, कैफी आजमी, सहिर लुधयानवी, नीरज, मजरूह सुल्तानपुरी आदि बहुत उम्दा शायर थे। संगीतकार नौशाद, एसडीबर्मन, शंकर जयकिशन, मदन मोहन, जयदेव, खय्याम आदि ने कभी इनकी अच्छी कविता पर धुनों की बंदिश नहीं लगाई। बाद के दौर में गुलजार, जावेद अख्तर, सुदर्शन फाकिर, निदा फाजिली, महबूब आदि गीतकार कवियों ने इस सोच को आगे बढ़ाए रखा। आज इरशाद कामिल, अमिताभ भट्टाचार्य, राहत इंदौरी, स्वानंद किरकिरे, प्रसून जोशी, पीके मिश्रा जैसे कई नाम इसमें जुड़े हैं, मगर इनके सामने शोर-शराबे वाले संगीत ने एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है।

युवा गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य मानते हैं कि कविता को हमेशा एक समुचित लय की जरूरत पड़ती है, ‘फिल्म संगीत में बवेजह का शोर अक्सर सार्थक शब्दों के अर्थ को दबा देता है। जब तक हर शब्द का अर्थ सही ढंग से उभर कर नहीं आ पाता है, तब तक श्रोता एक अच्छी कविता को कैसे समझ पाएगा। महान संगीतकार नौशाद ने भी कहा है था कि आज के ज्यादातर संगीतकारों को अच्छी शायरी की समझ नहीं है। वह कहते थे, अच्छी शायरी को पेश करने के लिए बहुत जरूरी है कि संगीतकार पूरी शायरी को बहुत अच्छी तरह से समझ कर हर साज का इस्तेमाल करें।

अच्छी शायरी के लिए अच्छी सर रचना का होना बहुत जरूरी है। यहां अच्छी ट्यूट यानी धुन से मतलब है, गीत और संगीत-एक दूसरे को आत्मसात कर ले। इस प्रसंग पर फिल्म ‘प्यासा’ के लिए साहिर साहब के एक फिल्मी गाने ‘जिन्हें नाज है हिंद पर....’ का उदाहरण देना ही काफी होगा। साहिर साहब की इस शायरी को सचिन दा ने कितनी सुरली धुन में पिरोया था। हमारे पारंपरिक साज की एक-एक तान इस शायरी में एक मीठा रस घोलती है।

गुलजार कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि गानों को प्राथमिक तौर पर कविता की शक्ल में आना होगा। साहित्य की शर्त को कुछ हद तक पूरा करना होगा। ऐसा न होने पर एक गाना कभी सार्थक रूप में सामने नहीं आ पाएगा। सिनेमा का गाना है, इसलिए साहित्य, स्तर आदि का ज्यादा ध्यान रखना जरूरी नहीं, इस तरह की सोच जिनकी होती है, उनके साथ तालमेल बिठाने में मुझे बहुत परेशानी होती है।’ मुश्किल यह है कि आज के ज्यादातर संगीतकार इस समझ से दूर हैं। वह अपनी धुनों में तरह-तरह बीट्स और रिद्म का उपयोग कर रहे हैं। इस वजह से हाल फिलहाल अच्छी कविता फिल्मों में आ ही नहीं आ पा रही है। और जो आ रही है, उसे काफी हद तक तेज कानफोड़ू संगीत निगल लेता है। गीतकार स्वानंद किरकिरे बताते हैं, ‘‘मैं अपनी फिल्म थ्री इडियट्स के गीतों को भी कविता मानता हूं। इस फिल्म के कुछ गीतों की सुर रचना करते समय संगीतकार शांतुनु मोयत्रा ने मुझसे पूछा था कि आपके पास यदि इस सिचुएशन के मुताबिक कुछ कविताएं हां, तो बताएं। मेरी दो कविताएं फिल्म में बैठ गयीं। शांतुनु ने कुछ जोड़-घटाकर इन दोनों ही कविताओं का इस्तेमाल बहुत खूबसूरती के साथ किया।

कविता को फिल्मी गानों में रचने का साहस वक्त-वक्त पर कई संगीतकारों ने किया है। 1971 में आयी फिल्म ‘फिर भी’ का एक गीत ‘सांझ खिले, भोर झरे, फूल हरसिंगार के रात महकती रहे’ को संगीतकार रघुनाथ सेठ ने बहुत कर्णप्रिय धुन में रचा था। इसी तरह 1977 में आई हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म आलाप के एक गाने ‘कोई गाता मैं सो जाता....’ को जयदेव ने बहुत मीठी धुन दी थी। इन दोनों ही कविताओं के रचियता थे डॉ. हरिवंश राय बच्चन।

इन गानों को आज के दौर के श्रोता भले ही भूल जाएं, ये फिल्म संगीत के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो चुके हैं। शायर इरशाद कामिल मानते हैं कि हमारी शायरी का तो इस्तेमाल हो रहा है, मगर उनके अनुरूप सुर रचना नहीं हो रही है। वह अपनी बात को समझाते हुए बताते हैं, ‘‘मंच पर शायरी को पेश करना और उसका फिल्मी गीतों में ढलना दो बिल्कुल जुदा चीजे हैं, इसलिए कई बार मेरी उम्दा शायरी भी अच्छी धुन की मोहताज हो जाती है। इसके लिए यह बहुत जरूरी है कि संगीतकार को भी शायरी की गहरी समझ हो। वरना फिल्मी गानों में ढलकर उन्हें मुनासिब तेवर नहीं मिलता है।’’

शायद यह भी एक वजह है कि आज के ज्यादातर संगीतकार किसी कविता को धुन में पिरोने की बजाय पहले से बनी धुन में मीटर के मुताबिक शब्दों को फिट करते हैं। जाहिर है ऐसे में फिल्मी गीतों में कविता को ढूंढना एक बड़ी भूल होगी।

असल में धुन चोरी भी कवितामय फिल्मी गाने को लाने में बड़ी बाधक बनी है। अक्सर ऐसा होता है कि इस तरह के आरोप फिल्म के रिलीज के समय ही बहुत मुखर होकर सामने आते हैं, जिस वजह से भी फिल्मी गीतों की तरफ कम ध्यान जाता है। युवा निर्देशक आशीष कुमार के मुताबिक ऐसे आरोपों में अक्सर प्रचार का प्लान छिपा रहता है। वह बताते हैं, ‘‘जैसा कि इधर हो रहा है, फिल्म के रिलीज से पहले इसका संगीत जारी किया जा रहा है।

ऐसे में महज फिल्म के संगीत को एक हाइप देने के लिए इस तरह के गिमिक रचे जा रहे हैं। असल में हमारे ज्यादातर संगीतकारों को अपनी बनाई धुनों पर ज्यादा भरोसा नहीं रहा है, वह किसी न किसी तरीके से श्रोताओं का ध्यान खींचना चाहते हैं पर ये कोशिशें क्षणिक होती है, ऐसे हथकंडों के सहारे किसी भी गाने की उम्र लंबी नहीं हो सकती।’’ धुन चोरी के आरोप से कई बार ‘विभूषित’ हो चुके संगीतकार प्रीतम इन्हें अपने खिलाफ एक साजिश मानते हैं, ‘मैं लगातार हिट गाने दे रहा हूं, यह किसी पब्लिसिटी का नतीजा नहीं है। आपके गानों में मेलोडी होगी, तो श्रोता उसे जरूर सुनेंगे। इसके लिए मुझे कोई दूसरी कोशिश करने की जरूरत नहीं है।

मैं यह भी जानता हूं कि इन्हीं श्रोताओं ने मेरे कई गानों को खारिज भी किया है। जहां तक ट्यून चोरी का सवाल है, मैं बाहर के गाने खूब सुनता हूं, मगर वह कभी मेरे म्यूजिक बैंक का हिस्सा नहीं बनती है। मैं उनसे सिर्फ प्रभावित हूं, किसी अच्छी सुर रचना से प्रेरित होना कोई बुरी बात नहीं है।’

लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। धुन से प्रेरित होने के नाम पर धड़ल्ले से दूसरे की बनाई तर्ज चुराई जा रही है। नए दौर के ज्यादातर संगीतकारों पर यह आरोप तो अक्सर बहुत खुलकर लगता रहा है। इन दिनों अक्सर टैलेंट शो में नजर आ रहे प्रसिद्ध संगीतकार अन्नू मलिक तो इस मामले में एक चर्चित नाम बन चुके हैं। यह दीगर बात है कि इसी संगीतकार ने बार्डर, रिफ्यूजी, एलओसी, उमराव जान आदि फिल्मों में बहुत सुरीला संगीत भी दिया है, पर धुन चोरी के आरोप से वह फिर भी नहीं बचे हैं।

ताजा-ताजा फिल्म यमला पगला दीवाना के उनके एक गाने ‘टिंकू जिया...’ पर भी चोरी का आरोप लगा था। अनू के एक करीबी कहते हैं, अनु अपने गानों को प्रचार में लाने के लिए कुछ भी अंट-शंट हरकते कर बैठते हैं। उन्हें शायद पता नहीं कि इस तरह के प्रचार कई बार आपके लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।’’ अनू बताते हैं, मैं कई बार कुछ विदेशी धुनों से प्रभावित हुआ हूं, पर मैंने कभी स्वेच्छा से उनकी नकल नहीं की है।

लेकिन कई बार निर्माता इस बात पर अड़ जाते हैं कि अमुक विदेशी धुन पर ही तर्ज बनाइए, तब बात बिगड़ जाती है।’ शंकर-जयकिशन की एक फिल्म ‘झुक गया आसमान’ का वाकया है, इसके प्रोड्यूसर की जिद थी कि अंग्रेजी के आने पर ही इसका टाइटल ट्रेक बनाया जाए वह गाना था-‘कौन है जो सपनों में आया, कौन है जो दिल में समाया....’ शंकर जयकिशन ने प्रोड्यूसर के दबाव में आकर वह गाना बना तो दिया, पर वह अंग्रेजी गाने की नकल करने से साफ बच गए।

अन्नू मलिक ने फिल्म साया के लिए निर्माता महेश भट्ट के कहने पर एक फ्रेंच गाने को सीधे-सीधे उड़ाया था। मगर इस ईमानदारी से कि वह अलग देखें। प्रीतम पर तो धुन चोरी के कई आरोप लगे। उनकी कई फिल्मों (जब वी मेट, रेस, लव आज कल आदि) में धुन चोरी की बात एकदम खुलकर सामने आयी। स्पेनिश, फ्रेंच आदि उन गानों के बाकायदा लिंक पेश किये, जिनसे ये गाने प्रेरित नहीं बल्कि सीधे-सीधे चुराये गये। अब तो यह दायरा काफी बढ़ा है, जिनमें किसी म्यूजिक बैंड के गाने या जिंगल को भी शिकार बनाया जा रहा है। निश्चित तौर पर इस चोरी में फिल्म के प्रोड्यूसर का भी एक मूक समर्थन होता है। वह यह सोचकर चुप बैठ रहते हैं कि फिल्म पर ट्यून चोरी का आरोप लगेगा, तो फिल्म को बैठे-बिठाये अच्छी पब्लिसिटी मिल जाएगी।

ऐसा होता भी हे, फिल्म की रिलीज के कुछ दिनों बाद इस तरह का विवाद स्वतः ही शांत हो जाता है। पर कई बार दांव उलटा भी पड़ जाता है। यह तब होता है जब कोई मौलिक धुन का मालिक मुआवजे की रकम पर अड़ जाता है। इस मामले में अभी चार साल पहले प्रसिद्ध निर्माता निर्देश राकेश रौशन तक पिट चुके हैं।

उनके होम प्रोडक्शन की फिल्म ‘क्रेजी -4’ का एक गाना सीधे-सीधे एक जिंगल से उतारा गया था। इसके संगीतकार राजेश रौशन ने खूब बचने की कोशिश की मगर जिंगल के संगीतकार राम संपत ने उन्हें मुकदमेबाजी में घसीट लिया। और बात खत्म हुई। 1 करोड़ 77 लाख का हर्जाना चुकाने के बाद जाहिर है ऐसा महंगा पब्लिसिटी स्टंट कोई निर्माता रचना नहीं चाहेगा।

 

 

 

 

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Title: unnecessary noise suppresses meaningful words of songs | In Category: आलेख  ( bollywood_article )

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