वो कमरा बात करता था जावेद अख्तर की नज्म

मैं जब भी ज़िंदगी की चिलचिलाती धूप में तप कर मैं जब भी दूसरों के और अपने झूट से थक

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कैफ़ी आज़मी की गजल :  शोर परिंदों ने यु ही न मचाया होगा

शोर परिंदों ने यु ही न मचाया होगा कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा पेड़ के कांटने वालो

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गुलजार की नज्म: अलाव

रात भर सर्द हवा चलती रही रात भर हमने अलाव तापा मैंने माज़ी से कई ख़ुश्क सी शाख़ें काटीं तुमने

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सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद है-अदम गोंडवी

सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद* है दिल पे रख के हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है कोठियों से

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लोग हर मोड़ पर रुक – रुक के संभलते क्यों हैं: राहत इन्दौरी

लोग हर मोड़ पर रुक – रुक के संभलते क्यों है इतना डरते है तो फिर घर से निकलते क्यों

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कैफी आज़मी की प्रसिद्ध नज़्म: दूसरा वनवास

राम बन-बास से जब लौट के घर में आए याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए रक़्स-ए-दीवानगी आँगन में

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इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है: दुष्यंत कुमार की गजल

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है एक

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आँख की ये एक हसरत थी कि बस पूरी हुई- शहरयार

आँख की ये एक हसरत थी कि बस पूरी हुई आँसुओं में भीग जाने की हवस पूरी हुई आ रही

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कैफ़ी आज़मी की नज़्म फर्ज

और फिर कृष्‍ण ने अर्जुन से कहा न कोई भाई न बेटा न भतीजा न गुरु एक ही शक्‍ल उभरती

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कैफी आज़मी की नज़्म “मकान”

  आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है आज की रात न फुटपाथ पे नींद आयेगी । सब उठो,

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तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते- वसीम बरेलवी

  तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते मुहब्बतों के दिनों की

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बात कम कीजे ज़ेहानत को छुपाए रहिए – निदा फ़ाज़ली

  बात कम कीजे ज़ेहानत को छुपाए रहिए अजनबी शहर है ये, दोस्त बनाए रहिए दुश्मनी लाख सही, ख़त्म न

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मैं अपने इख़्तियार में हूँ भी नहीं भी हूँ-निदा फ़ाज़ली

मैं अपने इख़्तियार में हूँ भी नहीं भी हूँ दुनिया के कारोबार में हूँ भी नहीं भी हूँ. तेरी ही

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नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं :  दुष्यंत कुमार

नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं जरा-सी बात है मुँह से निकल न जाए कहीं   वो देखते है तो

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तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं : दुष्यंत कुमार

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं मैं बेपनाह अँधेरों को

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अपाहिज व्यथा को सहन कर रहा हूं : दुष्यंत कुमार

अपाहिज व्यथा को सहन कर रहा हूँ, तुम्हारी कहन थी, कहन कर रहा हूँ । ये दरवाज़ा खोलो तो खुलता

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कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये : दुष्यंत कुमार

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये यहाँ दरख़्तों के

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 ज़िन्दगी तनहा सफ़र की रात है: जां निसार अख्तर

ज़िन्दगी तनहा सफ़र की रात है अपने-अपने हौसले की बात है   किस अक़ीदे की दुहाई दीजिए हर अक़ीदा  आज

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