कविता

क्या कहने इस ठाठ के : कैलाश गौतम

क्या कहने इस ठाठ के : कैलाश गौतम Kailash Gautam ki kavita kya kahane ish thaath ke

सिर पर आग,
पीठ पर पर्वत,
पांव में जूते काठ के

क्या कहने इस ठाठ के

यह तस्वीर नई है भाई, आज़ादी के बाद की
जितनी कीमत खेत की कल थी, उतनी कीमत खाद की
सब धोबी के कुत्ते निकले, घर के हुए न घाट के

क्या कहने इस ठाठ के

बिना रीढ़ के लोग हैं शामिल, झूठी जै-जैकार में
गूंगों की फ़रियाद खड़ी है, बहरों के दरबार में
खड़े-खड़े हम रात काटते, खटमल मालिक खाट के

क्या कहने इस ठाठ के

मुखिया, महतो और चौधरी सब मौसमी दलाल हैं
आज गांव के यही महाजन, यही आज ख़ुशहाल हैं
रोज़ भात का रोना रोते, टुकड़े साले टाट के

क्या कहने इस ठाठ के

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Title: kailash gautam ki kavita kya kahane ish thaath ke | In Category: कविता  ( kavita )

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