चंदू मैंने सपना देखा, मैं भी हुआ अमीर


जी हां, मैंने सपना देखा कि मैं अमीर हो गया हूं। आमतौर से अच्छे सपने किसी को बताए नहीं जाते। क्या पता किसी की नजर लग जाए। पर मुझे अपना सपना जगजाहिर करते हुए किसी प्रकार की कोई आश्ंाका नहीं है।

सपने में मैं अमीर कैसे बना, यह आपके साथ शेयर करना चाहता हूं। मुझे एक प्राइवेट कंपनी में १५ हजार रुपए मासिक के पगार पर नौकरी मिली। जब नौकरी लगी तो कुंआरा था। घर में मां-बाबूजी के अलावा एक छोटा भाई था। बाबूजी की परचून की दुकान थी और मां घर का काम संभालती थी। छोटा भाई १२वीं में पढ़ रहा था। वह दुकान पर बाबूजी का हाथ भी बंटाता था। मेरी नौकरी शहर में लगी थी। पहला वेतन मैंने अपने बाबूजी के हाथों में रख दिया था। आखिर यह उन्हीं की कमाई थी।  बाबूजी न जाने रात भर क्या विचारते रहे। सबेरे उठे, मुझे तैयार किया और अपने साथ भावेश पटेल के पास ले गए। पटेल साहब गांव के बैंक में मैनेजर थे, सब उनका आदर करते थे। मैंने उनके पांव छुए, आशीर्वाद लिया। बाबूजी ने मेरी नौकरी लगने की खुशखबरी सुनाई और बैंक में खाता खोलने का निवेदन किया। पटेल साहब ने मेरा खाता खोल दिया। मैंने पिताजी को अपना नॉमिनी बनाया। पटेल साहब ने समझाया कि बैंक खाता में नॉमिनी जरूर बनाना चाहिए।

दिन बीतते गए, बैंक खाते में रकम बढ़ती गई। जो भी बचता, खाते में जमा कर देता। जब बचत की रकम ने एक लाख का आंकड़ा पार किया तो पटेल साहब ने बुलाकर बधाई दी। उन्होंने कहा कि इस रकम का आधा निवेश कर दूं। मुझे याद है कि उन्होंने एक प्लॉट खरीदवाया था। उन्होंने कहा था कि बैंक खाते में तीन महीने के वेतन से अधिक रकम नहीं रखनी चाहिए। इसे उन्होंने आकस्मिकता निधि नाम दिया था। अगले महीने उन्होंने ताकीद की कि बचत की शुरुआत बुढ़ापे की योजना से करनी चाहिए और न्यू पेंशन स्कीम में खाता खुलवा दिया। हर महीने उस खाते में ५०० रुपए जमा करने लगा। वेतन में बढ़ोतरी की मिठाई लेकर जब पटेल साहब के पास पहुंचा तो उन्होंने हंसते हुए कहा था कि मिठाई से काम नहीं चलेगा बल्कि उन्हें बढ़ा हुआ वेतन दे दिया जाए। मैंने मुस्कराते हुए हां क्या कहा, उनका कारिंदा सिप का फार्म लेकर हाजिर हो गया था। वेतन वृद्धि की रकम सिप की किश्त बन गई। दीवाली में उन्होंने बाबूजी को पकड़ा। बाबूजी को सिप की समझ नहीं थी। उन्होंने बाबूजी के कान में न जाने क्या मंत्र फूंका कि वह सोने का सिक्का खरीदने का जिद करने लगे। फिर तो यह एक आदत सी बन गई। चार साल बाद शादी हुई। दो बच्चे भी हुए। समय बीतता रहा। बच्चे की पढ़ाई के लिए सिप से कुछ पैसे निकाले थे। जब रिटायर किया तो सबसे अधिक फायदा पहुंचाया प्लॉट ने। पैंतीस साल की अवधि में रकम ४०० गुनी हो चुकी थी। पेंशन स्कीम बनी बुढ़ापे की लाठी। सिप की रकम ने तो मालामाल ही कर दिया। सोने के ३५ सिक्कों की चमक ने आत्मविश्वास से भर दिया था। मुझे लगता है अमीर बनने का मेरा सपना सच होना न होना एक बात है और उसकी पद्धति व प्रकिया का तर्कसम्मत होना अलग बात। आप भी अपने फायनेंसियल प्लानर को यह सपना सुनाइए। देखिए वह आपको क्या राय देते हैं।

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