होनहार सिंह का किस्मत कनेक्शन


मैं बेहद प्रतिभाशाली हूं। बॉस को तो बस यूं ही पड़ी रहती है। उन्हें प्रतिभा की कद्र कहां? काश मेरी जिंदगी में भी मुझे कोई कद्रदान मिलता जो मेरी प्रतिभा को परखता, मुझे तवज्जो देता, मेरा गॉडफादर बनता।  होनहार सिंह मन ही मन बुदबुदाता रहता। उसके समय का बड़ा हिस्सा अपने आपको कोसते हुए बीतता था। एक दिन की बात है। होनहार सिंह बुझे मन से मैरीन ड़्राइव पर समंदर निहार रहे थे। शायद समंदर की लहरों में अपनी तकदीर ढूंढ रहे थे। तभी पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।  वह चौंका, पलटकर देखा। एक बुजुर्ग व्यक्ति जिनके चेहरे की झुर्रियां उनकी उम्र बयां कर रही थीं उसके पास खड़े मुस्करा रहे थे।

तकदीर की खोज में निरत होनहार सिंह को हर बिल्ली में भगवती लक्ष्मी नजर आती थीं। सामने आता हर बंदा उसे किस्मत सिंह नजर आता था। उसकी इस सोच ने उसे  तहजीब का धनी बना दिया था। आप उसकी प्रतिभा से पराजित होते या नहीं किंतु उसके तहजीब से अभिभूत जरूर होते। अपने स्वभाव के अनुरूप होनहार सिंह ने बुजुर्ग का अभिवादन किया और पूछा कि क्या उन्हें सडक़ पार करने में मदद चाहिए।  बुजुर्ग ने रॉल्स रायस की ओर इशारा किया। उनका मतलब था कि वह कार से आए हैं और केवल उससे मिलने के लिए ही कार रोकी है। उन्होंने होनहार सिंह को अपना कार्ड दिया और अगले दिन मिलने के लिए कहा।

होनहार सिंह उम्मीद की गठरी लिए अगले दिन उनके पास पहुंचा। उन्होंने होनहार को हल्का सा काम दिया। होनहार फिर निराश। हल्का सा काम मतलब प्रतिभा की परख नहीं हो पाई। ऐसा उसका मानना था। किंतु उसने अध्यवसाय के साथ काम पूरा किया और भरे मन से घर वापस लौटा। अगले दिन एक नया काम, जिम्मेदारी थोड़ी बढ़ा दी गई थी। वह करता रहा। महीने के अंत में उसी बुजुर्ग सज्जन ने फिर से उसे बुलाया। उसे कंपनी का चीफ ऑपरेटिंग अफसर बनाया। वह फर्श से अर्श पर जा पहुंचा था। कोई तो था जिसने उसकी प्रतिभा को परखा, पहचाना और तवज्जो दी।

साल भर होने को आए। होनहार सिंह का किस्मत कनेक्शन उसे कंपनी का सीईओ बना चुका था। बुजर्ग सज्जन, जो कंपनी के मालिक निकले, उसे पुत्रवत मानते थे। उनका संबंध अनौपचारिक पायदान पर पहुंच चुका था। आखिर उस दिन होनहार सिंह पूछ ही बैठा। जी हां, वही सवाल जिसका उत्तर आप भी जानना चाह रहे हैं। आखिर होनहार ही क्यों? बुजुर्ग सज्जन ने भी टालमटोल नहीं किया। वह बोल पड़े। लब्बोलुआब यह था कि बुजुर्ग सज्जन एक वारिस की तलाश में थे। पिछले पांच साल से उसी मैरीन ड्राइव पर उनकी तलाश चल रही थी, जहां बैठकर कभी वह भी स्वप्र देखा करते थे। उन्हें कई ऐसे युवक मिले जो होनहार से भी ज्यादा विनम्र थे, शायद विनम्र कम चाटुकार अधिक थे। रॉल्स रायस पर नजर पडऩे के बाद वह और भी विनम्र हो जाते थे। कुछ आलसी निकले तो कुछ ने काम को छोटा समझा और उसे करना अपनी प्रतिष्ठा के खिलाफ समझा। होनहार अकेला था जिसने हर काम को उतनी ही तवज्जो दी, उसे उतनी ही जिम्मेदारी के साथ पूरा किया। यही वजह थी कि वह सीढिय़ां चढ़ता गया। इंटरनेट के इस युग में कुछेक व्यक्तियों द्वारा नकारे जाने से कुछ नहीं होता, दुनिया में कोई न कोई तो ऐसा होगा ही जो आपको पहचानेगा, आपको वेटेज देगा। आप धारा के विपरीत चलने का साहस तो जुटाइए।

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