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व्हीलचेयर पर भारत भ्रमण करके मिसाल बन गए अरविंद

जहाँ कई बार मनुष्य शारीरिक रूप से स्वस्थ होने के बावजूद मानसिक चुनौतियों के सामने घुटने टेक देता है, तो क्या ऐसे में कोई कल्पना कर सकता है कि एक इन्सान शारीरिक रूप से अक्षम (Disabled) होने के बावजूद सकारात्मक जिंदगी जी रहा है और लोगो के लिए मिसाल बन रहा है। जी हां आप सही सुन रहे है, ऐसे ही एक व्यक्ति का नाम है अरविंद प्रभु, जो आज एक सफल बिजनेसमैन हैं, मगर 30 साल पहले हुए एक हादसे में उनका शरीर लकवे का शिकार हो गया था । अरविंद का केबल टीवी का कारोबर रहा है। अरविंद के साहस की जितनी दाद दी जाए वो कम है क्योंकि अरविंद ने कभी भी अक्षमता को अपनी ज़िन्दगी में आड़े नहीं आने दिया। अरविंद ने अपने ग्रुप के साथ पूरा भारत भ्रमण किया, साथ ही साथ भारत में दिव्यांगों के लिए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करवाने की दिशा में भी प्रयासरत हैं।

साल 1987, एक दुर्घटना में अरविंद की स्पाइनल कॉर्ड खराब हो गई थी, जिसके कारण आज भी उनके चेस्ट के नीचे का पूरा हिस्सा लक़वाग्रस्त (Paralytic) है। इस दुर्घटना के बाद वे इलाज के लिए अमेरिका चले गये। इतना कुछ हो जाने के बाद भी अरविंद बिलकुल निराश नहीं हुए और इलाज के दौरान भी अपने लक्ष्य को हासिल करने के बारे में सोचते रहे, जिसमे उन्हें तक़रीबन 10 वर्ष का समय लग गया। भारत वापस आने के बाद अरविंद ने केबल टीवी के कारोबार में अपने पैर ज़माने शुरू किये और ये उनकी मेहनत ही थी जिसके फलस्वरूप उन्होंने अपने इसी कारोबार से अपनी पहली कार मर्सिडीज बेंज खरीदी।

महाराष्ट्र केबल ऑपरेटर्स असोसिएशन के अध्यक्ष बनने के बाद अरविंद ने दिव्यांग लोगों के म्यूजिक बैंड ‘उड़ान’ की स्थापना में अहम भूमिका निभायी। व्हील चेयर पर होने के बावजूद घूमने के शौकीन अरविन्द ने 2011 में 19 हजार किमी की यात्रा मात्र 84 दिनों में पूरी की थी । बियॉन्ड बैरियर इनक्रेडिबल इंडिया टूर के नाम से यह यात्रा की गई थी तथा इसी दौरान उन्होंने पूरा भारत भ्रमण किया। कई बार तो ऐसे मौके भी आये जब अरविन्द की जान जोखिम में फंस गयी थी ।

अरविन्द बताते है कि,  “हम नॉर्थ ईस्ट में थे और हमें ब्रह्मपुत्र नदी को पार मजुली आइलैंड पर जाना था। इसके लिए हमें 7०० किमी का सफर तय करना था। लेकिन उसके लिए हमें अरुणाचल प्रदेश से वापस तेजपुर आकर फिर उल्टा मणिपुर जाना पड़ता। तब सोचा गया कि अरुणाचल प्रदेश से लखीमपुर क्रॉस करेंगे और वहां से मजुली आइलैंड पहुंचेंगे। इससे हमारा वक्त भी बचेगा और में 700 किमी नहीं घूमना पड़ेगा। इसके लिए उन्होंने गांव के नाविकों की मदद से छोटी नाव किराए पर ली। उस पर गाड़ियां भी लादी गईं |”

अरविन्द बताते है कि इस दौरान उन्होंने और टीम के लोगों ने कई बार फैसला वापस लेने की सोची, मगर इनका विश्वास था कि ये सब नदी पार कर ही लेंगे । इसी विश्वास के साथ वो सब  नदी में उतर गए लेकिन जैसे ही इनकी बोट नदी के बीचों बीच पहुंची तो बोट हिलने लगी। सबने अपनी मौत होना निश्चित समझ लिया था, क्योंकि गाडि़यां यदि एक इंच भी इधर-उधर होतीं तो सब के सब नदी में समा जाते। ऐसे समय में भी इन्होने हिम्मत नहीं हारी और जैसे-तैसे नदी पार कर ली। इन्हें उस समय ऐसा लग रहा था कि मानो दुनिया जीत ली हो।

 

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Title: arvind became an example by traveling to india on a wheelchair

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