देश में सात लाख लोगों के लिए मैला ढोना छोड़ना इतना मुश्किल क्यों है?

23 साल से गैरकानूनी होने के बावजूद आज भी देश भर में लगभग सात लाख लोग रोजाना अपने सर पर मैला ढोने को मजबूर हैं

‘इस नरक में रहना ही हमारी मजबूरी है. एक बार फैसला किया था कि दोबारा यह गंदा काम नहीं करेंगे. लेकिन हालात ऐसे बन गए कि आखिरकार हमें इसी नरक में लौटना पड़ा.’ आंखों में आंसू लिए जब टीकमगढ़ की रहने वाली माया बाई ये कहती हैं तो अपने साथ उन तमाम औरतों की भी बेबसी बयान करती हैं जिन्हें आज भी सिर पर मानव-मल ढ़ोने का अमानवीय काम करना पड़ रहा है.

मध्यप्रदेश से गुजरते आगरा–मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग पर इंदौर से करीब 50 किमी दूर टोंक कला नाम का एक गांव है. यहां रहने वाली रेखा बाई बताती हैं, ‘2004 में हमारे जिले में ‘गरिमा यात्रा’ शुरू हुई थी. तब सैकड़ों औरतों ने मैला ढोने का काम छोड़ने का फैसला कर लिया था. कुछ तो अब भी अपने उस फैसले पर कायम हैं लेकिन हम जैसी कई बदनसीबों को वापस इसी काम में लौटना पड़ा.’

इसका कारण बताते हुए वे कहती हैं, ‘काम बंद करते ही हमारे बच्चों को छात्रवृत्ति (सरकारी अस्वच्छक वृत्ति) मिलना बंद हो गई. पति ने बाहर खेतों पर मजदूरी करने नहीं जाने दिया तो आखिर घर कैसे चलता. ऐसी नौबत आ गई थी कि घर में राशन खरीदने के भी पैसे नहीं थे. कई दिनों तक सिर्फ कोरा चावल उबालकर बच्चों को दिया और खुद कई रात भूखे सोए. हमारे पास कमाने के लिए न तो कोई जमीन का टुकडा है और न ही कोई नौकरी-धंधा. काम छोड़ने पर कुछ औरतों को ऋण मिला, कुछ को आंगनवाडी में नौकरी और कुछ को जमीन का पट्टा. लेकिन कई दिनों के इंतज़ार के बाद भी जब हमें इसमें से कुछ नहीं मिला तो मजबूरन मैला ढ़ोने का काम ही दोबारा शुरू करना पड़ा.’

देवास जिले के बरोठा गांव की रहने वाली सुमित्रा बाई की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. उन्होंने यह काम छोड़ने के बाद बैंक से लोन लेकर साड़ी और बच्चों के कपड़ों की दुकान शुरू की थी. लेकिन स्थानीय लोग उनकी दुकान पर सामान खरीदने ही नहीं आते थे. तीन महीने तक इंतज़ार के बाद भी जब कोई ग्राहक नहीं आया तो हारकर उन्होंने इंदौर के एक व्यापारी को ही सारे कपड़े तीन हजार रूपये का घाटा खाकर लौटा दिए. अब सुमित्रा बाई फिर अपने पुराने काम पर लौट आई हैं.

एक तरफ देश में शौचालयों और स्वच्छता पर बातें हो रही हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार लोगों से ‘स्वच्छ भारत’ के लिए एकजुट होने का आह्वान कर रहे हैं. लेकिन दूसरी तरफ आज भी दलित वर्ग की सैकड़ों औरतें दबंग परिवारों का मानव मल अपने सिर पर ढोने को मजबूर हैं. आज भी ऐसा अमानवीय कार्य करने को अभिशप्त इन महिलाओं पर कितने अत्याचार हो रहे हैं, यह दमोह जिले के बतियागढ़ गांव की लक्ष्मी बाई की बातों से समझा जा सकता है.

‘हमारी जिंदगी जानवरों से भी बदतर है. इस घृणित काम के लिए हमें सिर्फ चंद पैसे और रोज़ की एक रोटी मिलती है. यह रोटी भी हमें दूर से फेंककर दी जाती है. हमें कहीं भी छूने की अनुमति नहीं है. यहां तक कि मंदिर–मस्जिद से भी हमें दूर रखा जाता है’ लक्ष्मी बाई कहती हैं.

मानव मल ढोने का जो काम ये तमाम औरतें आज भी कर रही हैं, कानून की किताबों में उसे आज से 23 साल पहले ही प्रतिबंधित किया जा चुका है. 1993 में केंद्र सरकार ने क़ानून पारित कर हाथ से सफाई और सूखा शौचालय निषेध क़ानून बनाया था. इस कानून में ऐसा काम करवाने पर एक साल की सजा और दो हजार रूपये के जुर्माने की भी व्यवस्था है. लेकिन देशभर में कैसे इस क़ानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, वह ऊपर लिखी महिलाओं की आपबीती से स्पष्ट हो जाता है.

2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि अब भी देश के कुल 18 करोड़ घरों में से 1.86 लाख में ऐसे शौचालय हैं जिनकी सफाई दलितों को करनी पड़ रही है. इनमें सबसे ज़्यादा – 63713 – महाराष्ट्र में हैं. पंजाब में ऐसे घरों की संख्या 11949, मध्यप्रदेश में 23093 और कर्नाटक में 15375 है. इतनी बड़ी तादाद में अब भी कच्चे शौचालयों का होना यह साबित करता है कि कड़े कानूनों के बाद भी सिर पर मैला ढोने की रवायत आज भी बड़े पैमाने पर जारी है. एक अनुमान के अनुसार आज भी देशभर में सिर पर मैला ढोने वालों की संख्या लगभग सात लाख है.

विभिन्न राज्य सरकारें अपने यहां मैला ढोने की बात को कम करके आंकती रही हैं. अब इसके सही आंकड़ों की पड़ताल के लिए केंद्र सरकार एक सर्वे करवा रही है. यह सर्वे गांवों के साथ शहरी क्षेत्रों में भी होगा. इसके साथ ही मैला ढ़ोने के इस काम पर रोक लगाने के लिए भारत सरकार ने कुछ और कदम भी उठाए हैं. केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्रालय को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई है और एक निगरानी समिति का भी गठन किया गया है. इस समिति में बिहार के सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक और गरिमा अभियान से जुड़े मध्यप्रदेश के आसिफ को भी सदस्य बनाया गया है.

गैरसरकारी स्तर पर भी इस तरह के प्रयास होते रहे हैं. साल 2003-04 में देवास जिले के कुछ गांवों की औरतों ने सिर पर मैला ढोने से इनकार करना शुरू किया था. तब ‘जन साहस’ नाम की संस्था ने कुछ अन्य संगठनों के साथ मिलकर ‘गरिमा अभियान’ शुरू किया था. इसके जरिये पीढ़ियों पुराने इस काम के दलदल से लोगों को बाहर निकालने की शुरुआत हुई. मध्यप्रदेश के देवास, होशंगाबाद, हरदा, शाजापुर, मंदसौर और पन्ना सहित तेरह जिलों के गावों में ही तीन हजार से ज़्यादा औरतें इस अभियान से जुडीं. लेकिन यह काम आसान बिलकुल भी नहीं था.

‘हमारे कार्यकर्ता गांव-गांव जाते, दलित वाल्मीकि तथा मुस्लिम जाति के हैला परिवारों से बातचीत करते लेकिन कोई भी हमारे साथ आने को तैयार ही नहीं होता था. हमसे पहला ही सवाल यह पूछा जाता था कि मैला उठाना छोड़ देंगे तो खाएंगे क्या?’ आसिफ कहते हैं, ‘लोगों को यह भी लगता था कि जिन परिवारों का मैला वे पीढ़ियों से उठाते आ रहे थे, उनसे अचानक वे इनकार कैसे कर सकते हैं!’

अभियान को पहली बड़ी सफलता देवास जिले के भौंरासा कस्बे में मिली. 13 हजार की आबादी वाले इस कस्बे में जब किरण पथरोड़, बेबीबाई और सेवंतीबाई ने इस काम को करने से इंकार कर दिया तो इलाके में हडकंप मच गया. ऊंची जाति के लोगों ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया. पहले धमकियां और फिर प्रलोभन भी दिए गए लेकिन ये तीनों टस से मस नहीं हुई. इनका पानी बंद कर दिया गया, ताने कसे गए और तरह-तरह से इन्हें जलील करने की कोशिशें हुई. इनके परिवारों के आदमियों पर भी दबाव बनाया गया. लेकिन फिर भी ये तीनों औरतें इस धंधे में नहीं लौटी.

यह बात जब आसपास के गांवों तक पंहुची तो वहां की औरतों में भी उम्मीद जगी. गरिमा अभियान इसी उम्मीद के सहारे खड़ा हो गया. औरे गांव के चौक–चौपालों पर प्रतीक के तौर पर मैला ढोने की टोकरियां और झाड़ू जलाई जाने लगीं.

इस तरह के अभियान उस तबके के एक छोटे से हिस्से को ही प्रभावित कर पाये हैं जो आज भी इस अमानवीय काम को करने के लिए मजबूर है. आसिफ बताते हैं कि गरिमा अभियान अब तक करीब 1800 लोगों को ही मैला ढोने से मुक्ति दिला सका है. जैसा कि ऊपर दिये गये उदाहरणों से स्प्ष्ट है कि कई लोगों को मजबूरी में अपने पुराने काम की ओर लौट जाना पड़ा. इनमें से कइयों को सरकारी योजनाओं का अपेक्षित लाभ नहीं मिला तो कुछ को पुनर्वास के लिए जिन जमीनों के पट्टे आवंटित किये गए थे उनपर दबंगों का कब्जा था या वे जमीनें पथरीली थीं.

मैला ढोने के काम को समाप्त करने की मुहीम से जुड़े लोग मानते हैं कि इसे तब तक पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता जब तक इन लोगों के पुनर्वास के लिए कोई ठोस पहल नहीं की जाती. लेकिन अभी तो स्थिति यह है कि सरकार के पास इन लोगों की कुल संख्या के सटीक आंकड़े ही उपलब्ध नहीं हैं.

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसी साल जुलाई में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने विभिन्न राज्यों के साथ एक बैठक की थी. इस बैठक में राज्यों को अपने यहां के कच्चे शौचालयों और उनका मैला ढोने वालों का आंकड़ा आयोग के साथ साझा करना था. लेकिन जो आंकड़े राज्यों ने दिये उन पर भरोसा करना मुश्किल है.

उदाहरण के तौर पर तेलंगाना में कच्चे शौचालय तो 1.57 लाख थे लेकिन मैला ढोने वाला एक भी नहीं. मध्य प्रदेश की बात करें तो राज्य सरकार के दिये आंकड़े कहते हैं कि यहां कच्चे शौचालयों की संख्या 39362 है लेकिन इनका मैला ढोने का काम सिर्फ 36 लोग ही करते हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़ में 4392 कच्चे शौचालयों को साफ करने का काम सिर्फ तीन लोग ही करते हैं.

क्या ऐसा हो सकता है कि तेलंगाना में सारे कच्चे शौचालयों को लोग खुद ही साफ करते हों! या फिर मध्य प्रदेश में एक व्यक्ति दूर-दूर तक फैले 1093 कच्चे शौचालयों का मैला अकेले ढोता हो!

ऐसे में यह उम्मीद करना कि सरकार मैला ढोने का काम करने वालों का प्रभावी पुनर्वास कर सकती है, फिलहाल तो दूर की कौड़ी ही नज़र आता है.

(साभार सत्याग्रह डॉट कॉम)

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