यात्रा

धरती पर रची खूबसूरत गजल पिन वैली

हिंदी के एक वरिष्‍ठ कवि ने लिखा है '' बर्फ में मजा है, बर्फ में सजा भी है'' ऐसा भला कैसे हो सकता है कि सजा-मजा दोनों ही साथ-साथ मिलें। यकीन नहीं होता न, लेकिन जब हम अपने देश के हिम प्रदेश हिमाचल के सीमांत जिले लाहौल-स्‍पीति में अवस्थित देश के सुंदरतम राष्‍ट्रीय उद्यान पिन वैली में पहुंचते हैं तो यहां हमें ये दोनों चीजें मिलती हैं। वर्ष के आठ महीने तक सजा के समान बर्फ की मोटी चादर और मजे के रूप में यहीं के अद्भुत वन्‍य जीव जंतु हैं। किन्‍नौर प्रदेश के इस शानदार राष्‍ट्रीय उद्यान की ऊंची पर्वत श्रेणियां पर तो लगभग पूरे वर्ष ही बर्फ पड़ी रहती है। किंतु घाटी में लगभग चार महीने का अपेक्षाकृत कुछ कम सर्द मौसम यहां के वन्‍य जीव और वनस्‍पतियों को पनपाता है। इस तरह यहां का विविधता भरा संसार धरती पर रची किसी खूबसूरत गजल से कम प्रतीत नहीं होती है।  पिन वैली में बर्फीला सन्‍नाटा है तो एक्‍लांच के गिरने का शोर भी। लगभग 675 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में पसरा यह राष्‍ट्रीय उद्यान समुद्र तल से 3,700 मीटर से 6,600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां की भौगोलिक परिस्थितियां जम्‍मू-कश्‍मीर के लद्दाख क्षेत्र से बहुत कुछ मेल खाती हैं। जैसे अर्द्ध-शुष्‍क रेगिस्‍तानी पर्वत श्रेणियां, जो यहां कम वर्षा होने का सबूत देती हैं, और शून्‍य से नीचे के तापमान पर उगने वाली अलग किस्‍म की वनस्‍पतियां एवं जीव-जंतु जो यहां एक अलग प्रकार का माहौल सृजित करते हैं। सर्दियों में यहां का तापमान शून्‍य से लगभग 30 डिग्री सेल्सिलय तक गिर जाता है। जनवरी फरवरी यहां सर्वाधिक बर्फवारी वाले दिन होते हैं। अप्रैल अपेक्षाकृत कुछ गर्म महीना होता है क्‍योंकि तब यहां का तापमान शून्‍य से दस डिग्री सेल्सियस नीचे तक आ जाता है। जनवरी फरवरी में यहां ढाई से तीन फुट बर्फ तो लगभग रोज ही पड़ती है। स्‍थानीय डोगरी जनजाति के लोगों के अनुसार कभी-कभी बर्फ की यह मोटाई पांच से आठ फुट तक जा पहुंचती है। पिन के दायरे में पड़ने वाला पर्वत शिखर-कानला ताबों तो लगभग हमेशा ही बर्फ से ढका रहता है।

अप्रैल से शुरू होता है-गर्मी का मौसम फिर मई-जून और मौसम साफ रहा तो सितंबर अक्‍तूबर तक भी यहां के रास्‍ते वन्‍य प्रेमी पर्यटकों के लिए खुले रहते हैं। इस दौरान यहां झरने फूट पड़ते हैं। पिन नदी में बर्फीले पानी का सैलाब आ जाता है। और वह भी किलोलें भरने लगती हैं। और सबसे बड़ी बात तो यह कि ऐसे अल्‍हड़-वासंती मौसम में यहां अलसाए, उनीदें और एक्‍लांचों से घबराए वन्‍य जीव भी जैसे चौंक कर जाग उठते हैं और इस अद्भुत राष्‍ट्रीय उद्यान में यहां-वहां कुलांचे भरते दिखाई पड़ने लगते हैं।

वन्‍य जीव

पिन वैली राष्‍ट्रीय उद्यान की पहचान यहां पाए जाने वाले अद्भुत जीव -आईबैक्‍स से होती है। 5 से 16 तक की संख्‍या के झुण्‍ड में विचरने वाले इस जीव की शक्‍ल कुछ-कुछ देसी बकरे या जंगली भेड़ से मिलती-जुलती है। इसके सिर पर गोलाई लिए हुए खुरदुरे सींग और चेहरे पर हल्‍की-सी दाढ़ी भी होती है। इसकी पूंछ बहुत मोटी होती है। आईबैक्‍स की खाल भूरे-कत्‍थई और लाल रंग का मिश्रण लिए होती है। यह एक बहुत शर्मीला जानवर है और झुण्‍डों में विचरने के बावजूद आदमी के सामने आने से डरता है।

आईबैक्‍स को देखने के लिए पिन वैली में गेचांग और थांगो नामक स्‍थान महत्‍वपूर्ण भुमिका निभाते हैं। यहां अक्‍सर ही आईबैक्‍स के झुण्‍ड देखने को मिलते हैं। इन दोनों स्‍थानों के बीच की दूरी चार किलोमीटर है। थांगों में हिमाचल के वन विभाग ने वन्‍य प्रेमी पर्यटकों के लिए पत्‍थर और मिट्टी से कुछ बंकरनुमा कमरे बनाए हुए हैं, जहां रहकर आईबैक्‍स और दूसरे जीवों को आसानी से देखा जा सकता है। भारतीय वन्‍य जीव संस्‍थान, देहरादून ने यहां कुछ नए बंकर बनाने के लिए हिमाचल प्रदेश के वन विभाग को कुछ आर्थिक मदद भी दी है। थांगों के अतिरिक्‍त किलंग व खामिनगर नालों के आसपास के क्षेत्र पिन वैली से निवासित वन्‍य जीवों के देखने की दृष्टि से सर्वाधिक उपयुकत हैं।

आईबेक्‍स के अलावा लाल लोमड़ी की उपस्थिति पिन वैली को कुछ विशेष बनाती है। क्‍लपेस क्‍लपेस नामक यह लाल लोमड़ी अपने आपको विषम परिस्थितियों में ढालने में बहुत सक्षम होती है। इसकी पूंछ लंबी और काले रंग की होती है। जिसका अंतिम सिरा सफेद रंग लिए होता है। इसके गले और छाती पर भी सफेद रंग के धब्‍बे होते हैं। भारत में यह विशिष्‍ट लाल लोमड़ी पिन वैली के अतिरिक्‍त लद्दाख, कश्‍मीर, सिक्किम और उत्‍तर-पश्चिमी भारत के सूखे ठंडे इलाकों में ही पाई जाती है।

पिन वैली राष्‍ट्रीय उद्यान हिम चीते, यानी पैंथरा अंसिया की भी आश्रयस्‍थली है। दूसरे वन्‍य जीवों में भराल, तिब्‍बती भेड़, हिमालयी वीसेल्‍स, बर्फ का भेडि़या, स्‍नो रैबिट और छोटे मारमोट भी यहां पाएं जाते हैं। भराल, जो एक प्रकार की नीली भेड़ हे, के भी छोटे-छोटे झुण्‍ड यहां अक्‍सर ही देखने को मिलते है। पक्षियों की कुछ विशिष्‍ट प्रजातियां भी यहां पाई जाती हैं। जैसे एक दुर्लभ पक्षी- ट्रेपोगोन पिन वैली के अतिरिक्‍त अन्‍य उद्यानों में सामान्‍यत- दिखाई नहीं पड़ता है। अलबत्‍ते यहां कभी-कभी आने वाली भूरी व हरी बत्‍तखें दूसरे अभयारण्‍यों की धरोहर हैं जो पिन वैली में मुश्किल से दिखाई पड़ती हैं। लेकिन इन बत्‍तखों की यहां उपस्थिति लोगों को आश्‍चर्यचकित ही करती है क्‍योंकि ये बत्‍तखें सामान्‍यत: इतने ठंडे इलाकों में नहीं पाई जाती हैं।

पिन वैली में निवासित पशु-पक्षियों को बर्फीले मौसम में एवलांच गिरते समय उनमें दबकर मरने के खतरे से हरदम जूझना पड़ता है। हालांकि यहां के वन्‍य जीव एवलांचों के प्रति इतने सतर्क रहते हैं कि जब भी उन्‍हें इनके गिरने का आभास होता है वे तुरंत ही उद्यान के दूसरे हिस्‍सों की तरफ कूच कर जाते हैं।

वनस्‍पति

जंगल के बाशिंदों की तरह पिन वैली की वनस्‍पति भी यहां के सर्द माहौल के कारण कुछ विशिष्‍ठ ही है। सामान्‍य पेड़-पौधों से अलग ठंडे रेगिस्‍तान में उग सकने वाली वनस्‍पतियां जैसे रोजा मैक्रोफाइला, इफेड्रा जिरारडियाना, सैलिक्‍स डैफनोइड और आर्टीमिसिया, रिब्‍स व पोटेन्टिला की विभिन्‍न प्रजातियां पिन वैली की धरोहर हैं। पिन वैली में एक विशेष किस्‍म की खास सिंबोपोगोन, ज्‍वारांकुश और उसकी प्रजाति-ऑलिबेरी भी पाई जाती है। यह घास यहां के अलावा केवल ईरान, पाकिस्‍तान और पश्चिमी भारत के कुछ सूखे इलाकों में पाई जाती है। इस राष्‍ट्रीय उद्यान के सूखे क्षेत्र सेडुम, स्‍ट्राचेई, बार्गेनिया और प्रिमुला प्रजाति की लाईकेन से भरे रहते हैं। सर्दी का मौसम समाप्‍त होते ही जब पिन वैली में जंगली गुलाब और जूनीपेरूस की झाडि़यों में फूल खिलने लगते हैं तो ऐसा लगता है कि जैसे बसंत ने अपने पूरे अबीर-गुलाल छिड़क दिया हो। पिन घाटी में विश्‍व का सबसे छोटा पुष्‍पधारी पौधा- आर्केउथोबियम मिनुटीरिमुम भी पाया जाता है, लेकिन इसे देखने के लिए बहुत पारखी नजरें होनी चाहिए जो इसकी पहचान कर सकें।

पर्यटन
पर्यटन की दृष्टि से भी पिन वैली का अपना भरपूर महत्‍व है। दरअसल पर्यटकों के लिए यहां राष्‍ट्रीय उद्यान के अलावा स्‍पीति घाटी के बौद्ध मठों और यहां निवासित जन-जातियों का रहन-सहन व उनकी संस्‍कृति आकर्षण का प्रमुख केंद्र बिंदु होती है। यहां के बौद्ध मठों में लामाओं और छोमों को ध्‍यानवस्‍था में देखना एक अनूठे अनुभव से गुजरना है। डोगरी जनजाति के सीधे-सादे लोग अपनी धरती पर आए अतिथियों का स्‍वागत-सत्‍कार करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। कुछ देशी-विदेशी पर्यटक यहां आकर यहां की देसी बिसर- ''छंग'' को पीना नहीं भूलते हैं। यहां सेब के बाग, जो आमतौर पर अक्‍तूबर के महीने में सुनहरे-पीले और लाल रंग के सेब के गुच्‍छों से लद जाते हैं, देखना पर्यटकों की खास मांग होती है। यहां रहने वाले डोगरी जनजाति के लोग आमतौर पर दिसंबर के आरंभ में अधिक बर्फवारी के दौरान समलांग गांव और दूसरे निचले इलाकों की तरफ कूच कर जात हैं और प्राय:  चार महीने बाद मार्च अप्रैल के मध्‍य में वापस अपने घरों को लौट जाते हैं।

कैसे पहुंचे

पिन वैली दिल्‍ली से लगभग 975 किलोमीटर दूर है जबकि चंडीगढ़ से 600 किलोमीटर तथा शिमला से 225 किलोमीटर दूर है। निकटतम हवाई अड्डा भुंतार मनाली में है जो यहां से 235 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। शिमला या चंडीगढ़ तक रेल अथवा सड़क मार्ग से पहुंचकर आगे का सफर बस या टैक्‍सी से करना पड़ता है। शिमला से चलकर समदू नामक स्‍थान से होते हुए पिन वैली पहुंचा जा सकता है। किन्‍नौर प्रदेश के इस खूबसूरत राष्‍ट्रीय उद्यान के रास्‍ते के पड़ाव में रामपुर, अक्‍पा, ताबो, गुलिंग, गेचांग और थांगो नामक स्‍थान आते हैं। सामान्‍य पर्यटकों के लिए स्‍पीति घाटी के लिए हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम द्वारा संचालित पैकेज टूर में शामिल होकर जाना अधिक सुविधापूर्ण रहता है।

पिन वैली जाने का सर्वाधिक उपयुक्‍त मौसम वैसे तो अप्रैल के आरंभ से लेकर जून तक ही रहता है। किंतु साहसिक पर्यटन के इच्‍छुक लोग सितंबर-अक्‍तूबर में जाना पंसद करते हैं। ठहरने के लिए समलांग, काजा आदि कस्‍बों में कुछ आवासीय सुविधाएं उपलब्‍ध हैं। थांगों में बने बंकरनुमा कमरे वन्‍य जीव शोधार्थियों के लिए अत्‍यंत उपयुक्‍त हैं। इसके अतिरिक्‍त वन विभाग व लोक निर्माण विभाग के विश्राम गृह और कुछ निजी होटल यहां आवासीय सुविधाएं उपलब्‍ध कराते हैं।

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