सफर सुहाना मैसूर से ऊटी तक


फिजा में चंदन की खूशबू लिए मैसूर अपने गौरवशाली इतिहास पर इठलाता नजर आता है। दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्‍य में बसा यह शहर अपने विशाल महलों, सिल्‍क की साडि़यों व प्राकृतिक छटा के लिए मशहूर है। लकड़ी पर की गई खूबसूरत नक्‍काशी यहां सभी को खूब लुभाती है। क्‍लॉक टावर से स्‍टेशन तक, चिडि़याघर हो या पिफर बस्‍ता लटकाए स्‍कूल जाते बच्‍चे मालगुड़ी का जादू यहां साफ दिखता है। यहां का दशहरा उत्‍सव हर साल लाखों सैलानियों को आकर्षित करता है।
मैसूर का हस्‍ताक्षर है मैसूर पैलेस। सुंदर कलाकृतियों, आकर्षक झाड़-फानूस व कीमती पत्‍थरों से सुसज्जित इस महल की खूबसूरती देखते ही बनती है। वुडेआर शासकों की इस‍ि नशानी को ब्रिटिश शिल्‍पकार हेनरी इरविन ने डिजाइन किया था। 1897 में राजकुमारी जयलक्ष्‍मी के विवाह के वक्‍त लकड़ी का बना यह महल आग में जल कर खाक हो गया था। इसे फिर से बनने में करीब 15 साल लगे। महल में एक कल्‍याण मंडप है जहां पहले शादियां हुआ करती थीं। इस मंडप की खास बात है, यहां रखा 280 किलो वजन का सोने का सिंहासन। इसे लोग सिर्फ दशहरे के उत्‍सव में ही देख सकते हैं। महल की दूसरी मंजिल में है दरबार हॉल। यहां खम्‍बों पर बारीक नक्‍काशी देखने को मिलती है। उत्‍सव के दिनों में 97,000 बल्‍बों से सजे इस महल की रौनक देखते ही बनती है। अब चलते हैं सेंट किलोमिनास चर्च। इसे 12-16वीं शताब्‍दी के बीच यूरोप में प्रचलित गोथिक शैली में बनाया गया है। दूर से देखने पर यह किसी बड़े चॉकलेअ केक की तरह लगता है। यह भारत के सबसे भव्‍य चर्चों में से एक है। इसे शाम को 5 से 8 के बीच देख सकते हैं।
अगर देश के दुर्लभ जीव-जुन्‍तुओं को एक ही स्‍थान पर देखने का मन हो, तो चलिए मैसूर चिडि़याघर। यहां बड़ी संख्‍या में वन्‍य जीव-जन्‍तु मौजूद हैं। जैसे चिंपैजी, जिराफ, जेबरा व सफेद बाघ। मंगलवार को छोड़ यह चिडि़याघर सप्‍ताह भर पर्यटकों के लिए खुला रहता है। मैसूर में ही एक और भव्‍य राजभवन है जगमोहन पैलेस। महाराजा क़ष्‍णराज वुडेआर द्वारा निर्मित यह खूबसूरत महल अब एक आर्ट गैलरी की शक्‍ल ले चुका है। 1861 में बनवाए गए इस महल में रखे तैंजोर व मैसूर शैली के पेटिंग्‍स और संगीत वाद्ययंत्र आज भी लोगों को खूब आकर्षित करते हैं।
मैसूर शहर से 13 किमी दूर है चामुण्‍डा हिल। बस से पहाड़ी के बीच बने घुमावदार रास्‍तों से गुजरते हुए यहां पहुंचने पर महिषासुर की एक विशालकाय प्रतिमा दिखती है। एक हाथ में फरसा और दूसरे हाथ में जहरीला सांप लिए यह मूर्ति कुछ डरावनी सी है। इस मूर्ति के थोड़ा आगे है चामुण्‍डा देवी के तीन विशाल मंदिर। किंवदती है कि देवी चामुण्‍डेश्‍वरी ने महिषासुर का वध कर इस समूचे क्षेत्र को उसके आतंक से मुक्‍त करवाया था। यहां से मेसूर शहर का विहंगम दृश्‍य देखने को मिलता है। रास्‍ते में पत्‍थर को तराशकर बनाई गई 16 फीट ऊंची व 25 फीट चौड़ी नंदी की मूर्ति दर्शनीय है।
इन सबके अलावा जिसके बारे में सभी पर्यटक जानते हैं और उसे देखने आते हैं वह है शहर से 19 किमी दूर वृंदावन गार्डन। डांसिग फव्‍वारों और फूलों से लकदक यह गार्डन 20 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैला है। इस गार्डन में फिल्‍मों की शूटिंग अक्‍सर होती रहती है। मैसूर से 16 किमी दूर एक और आकर्षक स्‍थान है श्रीरंगपट्टनम पर समयाभाव के कारण अब चलते है ऊंटी।
रात की बस पकड़, बांदीपुर और मुदुमलाई के जंगलों से गुजरते हुए 158 किमी का सफर तय कर हम पहुंचे नीले पर्वतों की नगरी ऊंटी। चेन्‍नई से 535 किमी दूर चाय के बागानों व फूलों से सजी वादियों के लिए मशहूर उद्यगमंडलम यानि उटी साल भर पर्यटकों को आकर्षित करती है। यहां भारत का सबसे बड़ा रेडियो टेलिस्‍कोप स्थित है। ऊटी में पहले टोडा जनजाति रहा करती थी पर यह चर्चा में आई जब अंग्रेजों ने इसे अपनी ग्रीष्‍म राजधानी घोषित की। यहां सड़कों पर टहलते हुए चाय के बागानों को देखना प्रकृति की समीपता का अहसास दिलाता है।
बॉटानिकल गार्डन : ऊंटी की सबसे खास जगह है 51 एकड़ क्षेत्र में फैला यह गार्डन लगभग 2000 प्रजातियों के पेड़-पौधों व जड़ी-बूटियों का घर है। यहां एक पेड़ का तना है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह करीब 2 करोड़ साल पुराना है। यह गार्डन अत्‍यंत मनमोहक और लुभावना है। इस गार्डन को 1847 में बनवाया गया था। गार्डन के पास ही 1877 में बनवाया गया गर्वनमेंट हाउस है। इसे अब राजभवन के नाम से जाना जाता है। पास ही है सेंट स्‍टीफन चर्च। यह केवल उटी का ही नहीं बल्कि नीलगिरि की पहाडि़यों का भी सबसे प्राचीन चर्च है।
ऊटी में एक रमणीक स्‍थान है नाम ऊंटी लेक। जॉन सुलिवन ने 1824 में इसका निर्माण करवाया था। ऊटी देखने आए पर्यटक इसे न देखें ऐसा हो ही नहीं सकता। लेक के पास है एक बोट हाउस और बच्‍चों के लिए टाय ट्रेन भी। शाम को यहां से सूर्यास्‍त का दृश्‍य अत्‍यंत मनमोहक लगता है। बच्‍चे जहां घुड़सवारी करते हुए देखे जा सकते हैं। वैसे ऊंटी की नैसर्गिक खूसूरती देखनी हो तो इसका आसान तरीका है ब्‍लूमाउंटेन एक्‍सप्रेस की सवारी। 4-5 घंटों के इस धीमे सफर में छुक-छुक की पार्श्‍व ध्‍वन‍ि में नीलगिरि के पहाड़ों और चाय के बगानों की हरियाली का भरपूर आनंद उठाया जा सकता है। एडवेंचर के शौकीनों के लिए यहां ऊंटी में फिशिंग व हैंड ग्‍लाइडिंग के पर्याप्‍त अवसर हैं।
मैसूर और ऊंटी की फैक्‍ट फाइल
मैसूर
कब जाएं – दशहरे के समय इस दौरान यहां दस दिनों तक उत्‍सव रहता है। मार्च के अंत में भी मैसूर घूमना ठीक है तब यहां नव वर्ष के स्‍वागत की तैयारियां चलती हैं।
कैसे जाएं – बैंगलूर, बैलारी, हैदराबाद तथा तिरूपति से मैसूर तक छोटे विमान आते-जाते हैं। निकटतम हवाई अड्डा बैंगलूर है 140 किमी। आप चाहें तो रेल मार्ग द्वारा भी यहां पहुंच सकते हैं। बैंगलूर व हासन से मैसूर तक रेल संपर्क है। यह सभी आसपास के प्रमुख पर्यटन स्‍थलों से सड़क मार्ग द्वारा भी जुड़ा हुआ है।
क्‍या खरीदें।
यहां आकर चंदन व मेसूर सिल्‍क साडि़यां खरीदना न भूलें। अगर आप खाने के शौकीन हैं तो यहां मसाला डोला और शुद्ध घी में डूबा मैसूर पाक आपको बेहद पंसद आएगा। इनका स्‍वाद यकीनन आप लंबे समय तक याद रखेंगे।
ऊंटी
कब जाएं : यहां मौसम हमेशा खुशगवार रहता है। हर साल मई में यहां पुष्‍प प्रदर्शनी होती है जो कि सैलानियों को खूब आकर्षित करती है। वैसे साल भर यहां मौसम सुहावना रहता है।
कैसे जाएं – यहां का निकटतम हवाई अड्डा अट्टा कोयम्‍बटूर है 100 किमी। आप चाहें तो केरल एक्‍सप्रेस से दिल्‍ली से कोयम्‍बटूर तक का सफर कर सकते हैं। आगे का सफर आप टैक्‍सी से तय कर लें।
क्‍या खरीदें – नीलगिरि की मशहूर चाय, ऊनी वस्‍त्र और नर्सरी पलांटस।

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