मिनी खजुराहो के नाम से मशहूर है मराठों का बुंदेलखंड


बुंदेलखंड  और उसके बाहर अनेक ऐसे मंदिर स्थित है, जिन पर खजुराहो के दर्शन और वास्तु का स्पष्ट प्रभाव झलकता है व मराठे भी इस प्रभाव से अछूते न रहे। जब राजा छत्रपाल से पेशवा बाजीराव प्रथम को बुंदेलखंड का तिहाई भाग उपहार में मिला तो मराठों ने यहां से अपनी जड़े जमानी शुरू कीं और बुंदेलखंड में अनेक किलों, बावडि़यों और मंदिरों का निर्माण कराया | परन्तु बुंदेलखंड में गणेश बाग के  निर्माण के लिए मराठों को हमेशा याद किया जायेगा, जो कि कर्वी मुख्यालय से पांच किमी दूर बना हुआ है । चूँकि इस मंदिर को खजुराहो की शैली में बनाने प्रयास किया गया है अत: इसे मिनी खजुराहो भी कहा जाता है।

एक खूबसूरत बावड़ी के किनारे बनाये गयी दो मंजिला मंदिर की विशेषता बाहरी दीवारों पर की गई पच्चीकारी है, जिनमे कहीं सात अश्वों के रथ पर सवार सूर्य,  तो कहीं विष्णु हैं तथा कहीं अन्य देवसमूह दर्शाये गए है । इन पच्चीकारी में मैथुन प्रतिमाएं भी दिखायी गयी है । मगर शायद वास्तुकार ने कभी भी खजुराहो की मैथुन प्रतिमाओं को नहीं देखा था,  अन्यथा वो उसकी भी नकल जरूर करता।

कुछ धार्मिक अवसरों पर भक्तगण यहाँ उपासना करते हैं अन्यथा भव्यता और आकर्षक होने के बावजूद यह मंदिर पर्यटकों से अछूता है। आसपास की हरियाली इसके सौंदर्य में चार चांद लगाती है, जैसे खेत-खलिहानों के बीच खड़े इस मंदिर से संपूर्ण परिवेश जीवंत हो गया हो |

कर्वी जिला मुख्यालय से इसकी दूरी महज 4 किलोमीटर तथा धार्मिक नगरी चित्रकूट दस किलोमीटर है व कालिंजर किला यहाँ से 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, फिर भी ना जाने क्यों कर्वी का जिला प्रशासन अभी तक इस अमूल्य धरोहर से अनजान बना हुआ है |


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